आखिर हवाई जहाजों को किसकी लगी नजर, जानिए जरूरी बातें
Published by : Rajneesh Anand Updated At : 25 Jul 2025 6:19 PM
अहमदाबाद विमान दुर्घटना
Russian Plane Crash : भारत में एविएशन उद्योग लगातार बढ़ रहा है. सभी कंपनियां उड़ानों की संख्या बढ़ा रही हैं, लेकिन उस अनुपात में ना तो विमानों की संख्या बढ़ाई जा रही है और ना ही उनका मेंटेनेंस हो रहा है, जिसकी वजह से चूक हो रही है और दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ रही है. एयर इंडिया के पास लगभग 198 विमान हैं और इंडिगों के पास 450 के आसपास विमान हैं, जबकि उड़ानों की बात करें तो एयर इंडिया का विमान 600 उड़ान प्रतिदिन और इंडिगो का 2000 से अधिक उड़ान एक दिन में भरता है. अहमदाबाद विमान दुर्घटना के बाद से जिस तरह दुर्घटनाओं की लिस्ट लंबी हो रही है, यात्री यह जानना चाहते हैं कि इसकी वजह क्या है.
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Russian Plane Crash : रूस का एक विमान गुरुवार को दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें यात्रियों सहित सभी क्रू मेंबर की मौत हो गई. कुल 50 लोग इस दुर्घटना में मारे गए. 12 जून को एयर इंडिया का 787-8 विमान अहमदाबाद हवाईअड्डे से उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गया था, इस दुर्घटना में कुल 241 यात्री सहित 270 से अधिक लोगों की मौत हुई थी. अहमदाबाद विमान दुर्घटना के बाद से देश में और विदेश में भी विमान दुर्घटनाओं की कई खबरें आईं. इमरजेंसी लैंडिंग की तो जैसे बाढ़ सी आ गई. तकनीकी खराबी की वजह से विमान लौटा, इमरजेंसी लैंडिंग हुई. इस तरह की सूचनाओं से आम आदमी डर सा गया है. सब यह जानना चाहते हैं कि आखिर ऐसा क्या हुआ है कि अचानक एविशन इंडस्ट्री में दुर्घटनाओं की बाढ़ आ गई है.
एविएशन इंडस्ट्री में चल क्या रहा है?
एविशन इंडस्ट्री में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वो निराश करने वाला है. दुर्घटनाएं बढ़ी हैं, जिसकी वजह से कहीं ना कहीं आम आदमी हवाई जहाज की यात्रा करने में हिचक रहा है. उनके अंदर एक डर का भाव है, जबकि हवाई यात्रा को सबसे सुरक्षित माना जाता है. आम आदमी के इस डर से एविशन इंडस्ट्री में काम करने वाले लोग भी परेशान हैं, वे यह बताना चाह रहे हैं कि लोगों को यह समझना होगा कि कोई भी दुर्घटना जान-बूझकर नहीं होती है. फ्लाइट अगर डिले होती होती है और उससे आम आदमी का समय खराब होता है, तो इसकी वजह सिर्फ यह है कि एविशन इंडस्ट्री लोगों को सुरक्षित यात्रा मुहैया कराना चाहती है. उनका उद्देश्य कतई यात्रियों को परेशान करना नहीं होता है. एविशन इंडस्ट्री काफी तेजी से बढ़ रही है, विमानों का ट्रैफिक काफी बढ़ गया है, जिसकी वजह से उसके परिचालन में लगे लोग दबाव में हैं. उन्हें कम समय में सारा काम निपटाना होता है.
दुर्घटनाओं की वजह क्या है?
विमान दुर्घटनाओं के कई कारण हैं, लेकिन कुछ बातें हैं जिनकी भूमिका ज्यादा होती है. इनमें सर्वप्रमुख है विमानों का रखरखाव यानी मेंटेनेंस. भारत की अधिकतर विमानन कंपनियां विमानों के रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही हैं, जिसकी वजह से दुर्घटनाएं हो रही हैं. रूस का जो विमान गुरुवार को दुर्घटनाग्रस्त हुआ, वह 50 साल पुराना था. अहमदाबाद में जो दुर्घटना हुई उसका विमान बहुत पुराना तो नहीं था, लेकिन उसका माॅडल पुराना हो चुका है. वह बोइंग 787-8 था, जबकि इस सीरीज के नए माॅडल 787-10 तक आ चुके हैं. वहीं एविशन इंडस्ट्री के बढ़तें आकार की तुलना में यहां कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं हो रही है, चाहे वो पायलट हों, इंजीनियर हों या फिर कोई और ग्राउंड स्टाॅफ. इस वजह से काम का प्रेशर बहुत ज्यादा हो गया है और दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं.

मेंटेनेंस की कमी दिख रही है
दिल्ली में कस्मटर सर्विस एक्जीक्यूटिव के पद पर कार्यरत अधिकारी बताते हैं कि दुर्घटनाएं निश्चित तौर पर बढ़ी हैं, इसके पीछे कई वजहें हैं. मेंटेनेंस की वजह से संभवत: दुर्घटनाएं सबसे अधिक हो रही हैं. अगर एयर इंडिया की बात करें, तो उनके पास विमानों की कमी है, जो विमान हैं, वो बहुत पुराने हैं. पुराने विमानों के साथ परेशानी यह होती है कि आप कितना भी मेंटेनेंस करें, वो नए जहाजों की तरह काम नहीं करेंगे. कई बार मेंटेनेंस के बावजूद परेशानी रह जाती है. लापरवाही यह होती है कि अगर विमान सुरक्षित उड़ गया, तो मान लिया जाता है कि सबकुछ ठीक है. लेकिन यह स्थिति सही नहीं है. कई बार हमें टर्न अराउंड टाइम इतना कम मिलता है कि जल्दी-जल्दी सबकुछ निपटाना होता है, इसकी वजह से भी कई बार चूक हो सकती है. पैसेंजर्स का दबाव यह रहता है कि उन्हें अपनी फ्लाइट समय पर चाहिए, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि एक फ्लाइट को रेडी करने में समय लगता है. अगर उस समय को कब किया कि तो उनकी सुरक्षा पर खतरा हो सकता है. कई बार पायलट की कमी अचानक हो जाती है, उस समय ट्रेंड पायलट नहीं मिलते, तब एक पायलट को पर्याप्त रेस्ट दिए बिना ड्यूटी पर बुला लिया जाता है, यह स्थिति भी अच्छी नहीं है.
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विमान दुर्घटनाओं की बड़ी वजह
विमान दुर्घटनाओं की वजहों को तलाशते हुए हमारी बात लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी (रिटायर्ड) से हुई. उन्होंने बताया कि सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि कोई भी मशीन कभी भी खराब हो सकती है, चाहे वो कितनी भी नई या पुरानी हो या उसका कितना भी मेंटेनेंस किया गया हो. सभी विमानों का परिचालन प्रोटोकाॅल के अनुसार ही होता है, उसके बिना हवाई जहाज नहीं उड़ते हैं. इसके बावजूद यह बात सच है कि विगत कुछ महीनों से विमान दुर्घटनाओं की खबरें ज्यादा सामने आ रही हैं. एविएशन कंपनिया इन दिनों अपने मुनाफे पर ज्यादा फोकस कर रही हैं, जो कहीं से भी गलत नहीं है. परेशानी तब हो जाती है जब मुनाफे के चक्कर में सुरक्षा और मेंटेनेंस से समझौता कर लिया जाता है. जैसे इसको ऐसे समझिए कि एक विमान के मेंटेनेंस में 10 इंजीनियर्स की जरूरत है, लेकिन कंपनियां अपना पैसा बचाने के लिए 8 इंजीनियर से काम चला रही हैं. ऐसे में दो इंजीनियर्स के काम का दबाव उन 8 इंजीनियर पर पड़ेगा. ऐसे में चूक की आशंका बनती है. किसी विमान के मैनुअल के हिसाब से जितने इंजीनियर की जरूरत उसके मेंटेनेंस के लिए चाहिए उतने लोगों की नियुक्ति जरूरी है, वरना मेंटेनेंस में कमी आएगी ही. लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी (रिटायर्ड) यह भी बताते हैं कि जब कोई विमान लैंड करता है और जब टेकआॅफ करता है उसके बीच में एक समय सीमा निर्धारित होती है. ऐसा इसलिए होता है ताकि विमानों की सही से जांच हो सके और उसमें किसी तरह की कोई तकनीकी खराबी ना हो. लेकिन आजकल एयर ट्रैफिक इतना बढ़ गया कि लैंडिंग और टेकआॅफ के बीच के समय को घटा दिया गया है, जिसकी वजह से जल्दी-जल्दी सुरक्षा जांच होते हैं, जो दुर्घटना की वजह बनते हैं.
पायलटों से कराया जा रहा है अतिरिक्त काम
लेफ्टिनेंट कर्नल जेएस सोढ़ी (रिटायर्ड) यह मानते हैं कि हमारे देश में जिस हिसाब से एयर ट्रैफिक बढ़ा है, उस हिसाब से पायलट नहीं बढ़े हैं. कंपनियां कास्ट कटिंग के तहत नई नियुक्ति नहीं करती हैं, जिसकी वजह से पायलटों की कमी है. एक फ्लाइट के बाद जितना आराम पायलट को करना चाहिए वो करता नहीं है, परिणाम यह होता है कि उसकी ऊर्जा कम हो जाती है और वह उस फुर्ती से काम नहीं कर पाता है, जैसे कि शुरुआती घंटों में कर रहा था.दिल्ली के कस्मटर सर्विस एक्जीक्यूटिव भी इस बात से सहमत हैं कि पायलटों को कई बार बिना रेस्ट के विमान उड़ाना पड़ता है. उनसे अतिरिक्त काम लिया जाता है, लेकिन पायलट की बहुत कमी हो यह भी सच नहीं है. कंपनियां पायलटों की नियुक्ति लगातार करती हैं. हां, यह जरूर है कि कई बार कुछ चूक हो जाती है.
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By Rajneesh Anand
रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.
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