जज्बा: गरीब बच्चों के तारणहार बने गुरुजी

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 11 Dec 2016 8:56 AM

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बालुरघाट : घर से 15 किलोमीटर दूर ग्रामीण पाठशाला में सिर्फ बच्चों को शिक्षा देने के उद्देश्य से गये थे. धीरे-धीरे जीवन के साथ एक नया अध्याय जुड़ गया और फिर वापस घर लौट नहीं पाये. ग्राणीण पाठशाला में पढ़ाने के साथ-साथ वह गरीब बच्चों की सहायता में ऐसे लीन हुए कि अपने परिवार तक […]

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बालुरघाट : घर से 15 किलोमीटर दूर ग्रामीण पाठशाला में सिर्फ बच्चों को शिक्षा देने के उद्देश्य से गये थे. धीरे-धीरे जीवन के साथ एक नया अध्याय जुड़ गया और फिर वापस घर लौट नहीं पाये. ग्राणीण पाठशाला में पढ़ाने के साथ-साथ वह गरीब बच्चों की सहायता में ऐसे लीन हुए कि अपने परिवार तक को भूला बैठे.
बालुरघाट शहर के उत्तर चकभवानी इलाका निवासी पेशे से शिक्षक रणजीत दत्त की कुछ ऐसी ही कहानी है. उनका आश्रम ही कुशमंडी ब्लॉक के वागडूमा गांव के लोगों का सहारा है. वे अपनी आय का सत्तर प्रतिशत हिस्सा आश्रम के गरीब व असहाय बच्चों में लगाते हैं. पिछले बीस वर्षों से तिल-तिल जोड़कर उन्होंने एक आश्रम तैयार किया है. इन्हें किसी भी प्रकार की कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती है. हांलाकि उन्हें इसकी कोइ शिकायत भी नहीं है.
गांव के गरीब व असहाय बच्चों को शिक्षा देने की उनकी यह कोशिश आज से करीब बीस वर्ष पहले शुरू हुयी थी. बालुरघाट के उत्तर चकभवानी इलाका निवासी रणजीत दत्त कुशमंडी ब्लॉक के वागडूमा इलाके मे स्थित एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक बनकर जाते हैं. उन्होंने पाया कि गांव का प्रत्येक परिवार काफी गरीब है. दूसरे के जमीन में मजदूरी कर किसी तरह दो वक्त की रोटी जुटा पाते हैं.
इलाके के कई लोग तो काम की तालाश में गांव से दूसरे राज्यों की ओर पलायन भी कर रहे हैं. अपने बच्चों को शिक्षित करने की विचारधारा किसी में नहीं है. पेट की आगे बच्चों को शिक्षा दिखाई भी नहीं देती थी. इलाके के बच्चों को शिक्षित करने के लिये शिक्षक रणजीत दत्त ने वर्ष 1998 में एक आश्रम खोला. अपने वेतन से प्रतिमाह कुछ बचाकर उन्होंने सरकारी प्राथमिक विद्यालय के पास एक जमीन खरीदी और सुदर्शनपुर नील कंठ अनाथ आश्रम बनाया. इस आश्रम को खोलने के पीछे मुख्य उद्देश्य गरीब व असहाय बच्चों को शिक्षा देना था. अपने वेतन का सत्तर प्रतिशत खर्च कर वह इलाके के तीस बच्चों को आश्रम में रखकर पढ़ा रहे हैं. आश्रम के बच्चों की सहायता के लिये उन्होंने कई सरकारी दरवाजे पर भी दस्तक दी, लेकिन निराश रहे.
शिक्षक रणजीत दत्त ने बताया कि इस काम में उनकी पत्नी का बड़ा योगदान है. पत्नी का साथ ना मिलने पर यह कार्य कठिन होता. उन्होंने बताया कि प्राथमिक विद्यालय में सरकारी शिक्षक होने के एवज में मिलने वाले वेतन का लगभग तीस प्रतिशत अपने परिवार के खर्च के लिये रखते हैं.
बचे पैसे आश्रम के बच्चों पर खर्च होता है. इलाके के बच्चों को शिक्षित कर एक शिक्षित समाज तैयार करना उनका प्रमुख उद्देश्य है. घर-घर जाकर माता-पिता को समझाकर बच्चों को स्कूल तक लाये हैं. उसके बाद इलाके के गरीब और असहाय बच्चों को अपने आश्रम में लाकर पढ़ाने का काम शुरू किया. सरकारी सहायता नहीं मिलने से उन्हें कोई दुख नहीं है.
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