राजभाषा होने के बावजूद अपने ही देश में हिंदी उपेक्षित
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 19 Nov 2016 1:30 AM
सिलीगुड़ी. हिंदी राजभाषा होने के बावजूद अपने ही देश में उपेक्षित है. हिंदी भाषा और संस्कृति का विकास नहीं हो रहा है. इसे लेकर केंद्र और राज्य सरकार दोनों ही गंभीर नहीं है. इसका खामियाजा हिंदी भाषी समाज के लोग भुगत रहे हैं. यह कहना है सामाजिक संस्था पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज के दार्जिलिंग […]
वह शुक्रवार को सिलीगुड़ी जर्नलिस्ट क्लब में आयोजित प्रेस-वार्ता के दौरान मीडिया को संबोधित कर रहे थे. श्री राय ने भाषा और संस्कृति के विकास को लेकर केंद्र सरकार के साथ-साथ राज्य सरकार पर नाराजगी प्रकट करते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल सरकार राज्य की सरकारी इकाईयां, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, स्थानीय प्रशासन, न्यायालय, पर्यटन, कारोबार, नगर निगम, अस्पताल के अन्य सभी सरकारी, गैर-सरकारी इकाईयों में धड़ेल्ले से अंग्रेजी का इस्तेमाल किया जाता है और हिंदी को संकुचित कर बंगाल में लोकशाही खत्म किया जा रहा है.
महासचिव हीरालाल पासवान ने भी मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि बंगाल से लोकशाही खत्म न हो इसके लिए हिंदी भाषी समाज को एकजुट होने की जरूरत है. अगर हम लोग पूरी शक्ति के साथ अपनी बातें सरकारी दफ्तरों में हिंदी में रखें तो सरकारी कर्मचारियों की हैसियत नहीं है कि हमारी बातों को अनसुनी कर दें. श्री पासवान ने कहा कि पश्चिम बंगाल में हिंदी भाषी अपनी प्रगति व पहचान के लिए कई समस्याओं को लेकर मुखर हैं. सहानुभूति और सांत्वना से अधिक कुछ नहीं मिला. उन्होंने कहा कि हिंदी भाषी शहर, कस्बों व गांवों में बिखरे हुए हैं बस उन्हें माला में गूंथने की जरूरत है. आइबी से सेवानिवृत व संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष एनबी उपाध्याय ने कहा कि हिंदी भाषा और संस्कृति के विकास हेतु शिक्षा नीति में बड़े स्तर पर बदलाव की जरूरत है. श्री उपाध्याय का कहना है कि बंगाल सरकार की हिंदी को लेकर एक अलग ही शिक्षा नीति है. इसका खामियाजा हिंदी भाषी छात्र-छात्राओं को भुगतना पड़ रहा है.
समय से पहले ही उनकी पढ़ाई रूक जाती है. गरीब व असहाय हिंदी भाषी बच्चों की स्थिति और भी दयनीय है. अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिये जाने की वजह से हिंदी भाषी छात्र-छात्राओं के शिक्षा का दायरा सीमित हो गया है. प्राथमिक विद्यालयों की जो संख्या है उस अनुपात में उच्चविद्यालय व उच्चतर विद्यालय नहीं है. महाविद्यालयों (कॉलेजों) में हिंदी माध्यम में पढ़ाई करना हिंदी भाषियों के लिए एक विडंबना ही है. आज बंगाल के सभी सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की जो अवस्था है उससे भी बदतर स्थिति हिंदी सरकारी विद्यालयों की है. आज अगर निरक्षर लोगों की बात की जाये तो सबसे ज्यादा हिंदी भाषियों की संख्या होगी. संस्था के संयोजक सुरेंद्र महतो ने कहा कि आज हिंदी भाषी समाज को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए खुद उठ खड़े होने की जरूरत है और यहीं वजह है कि पश्चिम बंग हिंदी भाषी समाज का गठन किया गया है.
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