एसडीओ कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रहे गोसेवक
Updated at : 09 Jul 2018 2:07 AM (IST)
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सिलीगुड़ी : सिलीगुड़ी के सालबाड़ी स्थित श्री दार्जिलिंग-सिलीगुड़ी गोशाला की जमीन बचाने हेतु अब गोशाला कमेटी के अलावा अन्य सामाजिक संगठन भी एकजुट होने लगे हैं. पूरा मामला अभी एसडीओ कोर्ट में चले जाने की वजह से सभी गोसेवक और दो दिनों तक एसडीओ कोर्ट के फैसले का इंतजार करेंगे. गोशाला कमेटी के अध्यक्ष सांवरमल […]
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सिलीगुड़ी : सिलीगुड़ी के सालबाड़ी स्थित श्री दार्जिलिंग-सिलीगुड़ी गोशाला की जमीन बचाने हेतु अब गोशाला कमेटी के अलावा अन्य सामाजिक संगठन भी एकजुट होने लगे हैं. पूरा मामला अभी एसडीओ कोर्ट में चले जाने की वजह से सभी गोसेवक और दो दिनों तक एसडीओ कोर्ट के फैसले का इंतजार करेंगे.
गोशाला कमेटी के अध्यक्ष सांवरमल आलमपुरिया व सचिव बनवारी लाल करनानी ने पूरे समाज से आह्वान किया है कि गोशाला की जमीन बचाने के लिए आगे आने की जरुरत है. श्री करनानी का कहना है कि पूरे मामले पर 11 सदस्यों की गठित कानूनी सलाहकार कमेटी निगरानी रख रही है. वहीं, गौरीशंकर गोयल का कहना है कि एसडीओ कोर्ट के फैसले के अनुसार ही भावी आंदोलन की रूपरेखा बनेगी.
श्री दार्जिलिंग-सिलीगुड़ी गोशाला 1898 में बाबूपाड़ा-मिलनपल्ली में स्थापित हुई थी. बाद में सालबाड़ी में गोशाला स्थापित की गयी. यह फैसला गोशाला कमेटी के तत्कालीन सचिव विश्वनाथ गोयल उर्फ बिशू बाबू ने 1974-76 में लिया था. दूरदर्शी बिशू बाबू ने तत्कालीन कमेटी के सामने प्रस्ताव रखा था कि बाबूपाड़ा-मिलनपल्ली स्थित गोशाला शहर के बीचोबीच है. भविष्य में यहां गोपालन करने में काफी असुविधाओं की संभावना है. इन्हीं कारणों से 1974-76 के बीच में सालबाड़ी में एक और गोशाला के लिए जमीन खरीदी गयी. जिसका रिकॉर्ड आज भी तत्कालिन सचिव बिशू बाबू के नाम से ही है.
उस दौरान सालबाड़ी गोशाला के नवनिर्माण में बिशू बाबू के अलावा हंसराज जाजोदिया व अन्य गोसेवकों का भी सक्रिय भूमिका रही. गोशाला के इतिहास को लेकर बिशू बाबू के उत्तराधिकारी ओमप्रकाश अग्रवाल व संजय टिबड़ेवाल से प्रभात खबर ने संपर्क साधा तो और भी कई तथ्य सामने आये. ओमप्रकाश की मानें तो जलपाईमोड़ स्थित गोशाला की जमीन बचाने में भी उनके पिता बिशू बाबू का ही योगदान रहा है. उन्होंने एक घटना को स्मरण करते हुए कहा कि जलपाईमोड़ वाली गोशाला की जमीन पर भी उस दौरान भू-माफिया ने दखल करने की कोशिश की थी. एक दबंग की मौत के बाद वहां पर उसके नाम से भू-माफिया ने समाधि बना दी थी.
बिशू बाबू ने समाज को एकजुट कर भू-माफिया से सीधे भिड़ गये और समाधि को हटवाकर ही दम लिया. श्री अग्रवाल का कहना है कि सालबाड़ी की गोशाला को जिस बिशू बाबू और अन्य गोसेवकों ने अपने सामर्थ्य, समर्पण, क्षमता और लगन से सींचा, उस गोशाला को बचाने के लिए आज पूरा समाज एकजुट हो रहा है, जो सराहनीय है.
ओमप्रकाश जी का कहना है कि 42 वर्ष पहले सालबाड़ी में गोशाला की नींव रखी गयी थी. तभी से वह जमीन गोशाला प्रबंधक के कब्जे में है और उसका इस्तेमाल गोपालन के लिए हो रहा है. उक्त गोशाला में होली, दीपावली व अन्य त्योहारों के अलावा कई सामूहिक सामाजिक कार्यक्रम भी आयोजित होते रहे हैं.
आज समाज की उस करोड़ों की संपत्ति को विवादित बताकर कुछ कथित भू-माफिया व अन्य असामाजिक तत्व जबरन दखल करने का जो प्रयास कर रहे हैं, वह निंदनीय और आपराधिक कृत्य है. इस अनैतिक घटना के विरोध में सबका एकजुट होना और आवाज बुलंद करना जरूरी है. अन्यथा आज गोशाला की जमीन पर जबरन दखल का प्रयास हो रहा है, कल अन्य सामाजिक संगठनों की चल-अचल संपत्ति व जमीनों पर भी अनाधिकृत चेष्टा शुरू हो जायेगी.
संजय टिबड़ेवाल का भी कहना है कि हम केवल गोप्रेमियों से ही नहीं, बल्कि सिलीगड़ी समेत पूरे उत्तर बंगाल के समस्त वर्ग के लोगों से अनुरोध करते हैं कि गोरक्षा के लिए गोशाला की जमीन बचाने में सभी एकजुट हों और गैरकानूनी कार्य का विरोध करें. साथ ही शासन-प्रशासन से भी हम अपील करते हैं कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच-पड़ताल कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो.
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