महंगाई ने बढ़ायी शहर के मूर्तिकारों की परेशानी
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :12 Aug 2017 11:52 AM (IST)
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राज्य सरकार की ओर से कोई मदद नहीं शेड नहीं होने से बारिश में काम करने में दिक्कत कुम्हारटोली की हालत भी काफी खराब सिलीगुड़ी : हमारा देश त्योहारों के देश के रुप में विश्व में जाना जाता है. इन दिनों दुर्गा पूजा को लेकर अभी से तैयारियां शुरु हो गई हैं. हालांकि अभी भी […]
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राज्य सरकार की ओर से कोई मदद नहीं
शेड नहीं होने से बारिश में काम करने में दिक्कत
कुम्हारटोली की हालत भी काफी खराब
सिलीगुड़ी : हमारा देश त्योहारों के देश के रुप में विश्व में जाना जाता है. इन दिनों दुर्गा पूजा को लेकर अभी से तैयारियां शुरु हो गई हैं. हालांकि अभी भी दुर्गोत्सव में एक माह से कुछ अधिक शेष हैं. श्रद्धालुओं से लेकर व्यवसायी और मूर्तिकार तक इस त्योहार का लाभ व लुत्फ उठाने के लिये तैयारी में जुट गये हैं.
खास तौर से मां दुर्गा और अन्य देवी देवताओं की प्रतिमाओं का निर्माण करने वाले मूर्तिकार भी आजकल कम व्यस्त नहीं हैं. कुम्हारटोली में अपने टूटे-फूटे शेड में ये मूर्तिकार अपने परिवार सहित अपनी कला को मूर्त रुप देने का प्रयास कर रहे हैं. तकरीबन यह काम साल भर चलता रहता है.
इन हूनरमंद मूर्तिकारों और उनके परिवार का जीवन यापन कम चुनौतीपूर्ण नहीं है. इस काम में हालांकि आर्थिक लाभ अब पहले जैसा नहीं रहा लेकिन फिर भी अपनी वंश परंपरा को बनाये रखने के लिये वे इस पेशे से जुड़े हुए हैं तो इसकी कई वजह भी है.
मसलन कला और अपने कर्म के प्रति लगाव और ठोस विकल्प का अभाव आदि. उल्लेखनीय है कि पहले की तुलना में शहर में दुर्गा पूजाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है. उसके बावजूद सामग्रियों की ज्यादा लागत और मुनाफा कम होने से यह व्यवसाय पहले की तरह लाभजनक नहीं रह गया है.
स्थानीय कुम्हारटोली के एक मूर्तिकार अजीत पाल ने बताया, पूरे साल वे 100-200 मूर्तियां बेच पाते हैं. एक छोटी मूर्ति बनाने में कम से कम दो चार दिन लग ही जाते हैं. जबकि बड़ी मूर्तियों के निर्माण में हफ्ते भर का समय तो लग ही जाता है.
उन्होंने बताया, दुर्गा पूजा की मूर्तियों के लिये उन्हें मार्च-अप्रैल में ही ऑर्डर मिल जाते हैं. देवी की प्रतिमा बनाने में उन्हें 6-7 माह का समय लगता है. एक अन्य मूर्तिकार ने बताया, मूर्तियों के लिये सबसे पहले उन्हें मिट्टी खरीदनी पड़ती है. एक टेम्पो मिट्टी की कीमत 3,000 रुपए है. इस मिट्टी से देवी की केवल दो ही बड़ी बड़ी मूर्तियां बन पाती हैं. उन्होंने बताया, छोटी मूर्तियों की कीमत न्यूनतम 10 हजार रुपए होती है जबकि बड़ी प्रतिमाओं की कीमत 50 हजार रुपए या कभी कभी उससे भी अधिक हो जाती है.
इन मूर्तिकारों की सबसे बड़ी शिकायत राज्य सरकार से है जिसने उनके लिये अभी तक कुछ भी ठोस बंदोबस्त नहीं किया है. कम से कम एक बड़ा सा शेड जहां ये मूर्तिकार आराम से बिना बारिश के डर के अपनी कला को मूर्त रुप दे सकें. कहा कि समय समय पर प्रशासन का ध्यान इस ओर खींचा गया है. लेकिन कोई सकारात्मक पहल नहीं दिख रही है.
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