हूल क्रांति दिवस से दूर होते आदिवासी समुदाय के लोग

Updated at : 02 Jul 2018 4:16 AM (IST)
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हूल क्रांति दिवस से दूर होते आदिवासी समुदाय के लोग

कोलकाता : झारखंड के आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ जिस दिन विद्रोह किया था, उस दिन को ‘हूल क्रांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. इस युद्ध में करीब 20 हजार आदिवासियों ने अपनी जान दे दी थी. आजादी की पहली लड़ाई हालांकि आजादी की पहली लड़ाई तो सन 1857 में मानी जाती है […]

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कोलकाता : झारखंड के आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ जिस दिन विद्रोह किया था, उस दिन को ‘हूल क्रांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. इस युद्ध में करीब 20 हजार आदिवासियों ने अपनी जान दे दी थी. आजादी की पहली लड़ाई हालांकि आजादी की पहली लड़ाई तो सन 1857 में मानी जाती है लेकिन झारखंड के आदिवासियों ने 1855 में ही विद्रोह का झंडा बुलंद कर दिया था. 30 जून, 1855 को सिद्धू और कान्हू के नेतृत्व में मौजूदा साहेबगंज जिले के भगनाडीह गांव से विद्रोह शुरू हुआ था.
इस मौके पर सिद्धू ने नारा दिया था, ‘करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़. ऐसे के विभिन्न प्रांतों में रहने वाले आदि वासियों के लिए हूल दिवस का अलग ही महत्व है. शनिवार हूल दिवस के मौके पर शनिवार राज्य सरकार की ओर से पुरुलिया जिलों में विशेष कार्यक्रम किया गया था. वहीं कई नेता मंत्री ट्वीट कर आदीवासी समुदाय के लोगों को हुल दिवस की शुभकामनाएं दी.
जहां हूल दिवस के मौरे पर पुरूलिया के आदिवासी कोलकाता पहुंचे ,तो वहीं दूसरी ओर महानगर में रहने वाले आदिवासी समुदाय को लोगों में हूल दिवस को लेकर किसी प्रकार की उत्साह नहीं दिखा. महानगर के 58 नंबर वार्ड के मुंडापाड़ा में करीब 300 आदिवासी समुदाय के लोग रहते हैं, लेकिन यहां‍ रहने वाले अधिकांश आदिवासी झारखंड से हैं, लेकिन मुंडापाड़ा में रहने वाले युवा वर्ग के लोग हूल दिवस के जानते तक नहीं.
विदित हो कि मौजूदा संथाल परगना का इलाका बंगाल प्रेसिडेंसी के अधीन पहाड़ियों एवं जंगलों से घिरा क्षेत्र था. इस इलाके में रहने वाले पहाड़िया, संथाल और अन्य निवासी खेती-बाड़ी करके जीवन-यापन करते थे और जमीन का किसी को राजस्व नहीं देते थे. ईस्ट इंडिया कंपनी ने राजस्व बढ़ाने के मकसद से जमींदार की फौज तैयार की जो पहाड़िया, संथाल और अन्य निवासियों से जबरन लगान वसूलने लगे. लगान देने के लिए उनलोगों को साहूकारों से कर्ज लेना पड़ता और साहूकार के भी अत्याचार का सामना करना पड़ता था.
इससे लोगों में असंतोष की भावना मजबूत होती गयी. सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव चारों भाइयों ने लोगों के असंतोष को आंदोलन में बदल दिया, लेकिन मुंडापाड़ा के आदिवासियों के बीच उक्त चार भाई अपरिचित हैं. स्थानीय निवासी प्रशांत नस्कर व सपन महाली ने बताया मुंडा पाड़ा में आदीवासी शांति संघ क्लब की स्थापना की गयी है. इस क्लब की ओर से बिरसा मुंडा शहादत दिवस पालन किये जाने की योजना पर हम कार्य कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय के युवा वर्ग के लोग आजादी की लड़ाई में आदिवासियों की शहादत को भूलते जा रहे हैं. इसकी बड़ी बजह है शिक्षा. हमारे देश की शिक्षकों को इन विषय को विस्तार से जानकारी देने की जरूरत है, ताकि बच्चे भारत के इतिहास को समझ सके.
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