मेले में मानसिक रोगियों को लेकर लगाये गये स्टॉल विवादों के घेरे में
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :06 Jan 2020 6:31 AM (IST)
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दुर्गापुर : शहर के गैमन इलाके में आयोजित कल्पतरु मेले में मानसिक रोगियों को लेकर लगाए गए स्टॉल विवादों में घिरता नजर आ रहा है. मानसिक रोगियों के लिए जागरूकता लाने के उद्देश्य से लगाये गये स्टॉल को लेकर लोग अब सवाल उठाने लगे हैं. कई लोग इसे अमानवीय कृत्य मान रहे है. ज्ञात हो […]
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दुर्गापुर : शहर के गैमन इलाके में आयोजित कल्पतरु मेले में मानसिक रोगियों को लेकर लगाए गए स्टॉल विवादों में घिरता नजर आ रहा है. मानसिक रोगियों के लिए जागरूकता लाने के उद्देश्य से लगाये गये स्टॉल को लेकर लोग अब सवाल उठाने लगे हैं. कई लोग इसे अमानवीय कृत्य मान रहे है. ज्ञात हो कि मेला परिसर में पागल गार्ड नाम से एक स्टॉल लगाया गया है. जिसे गोपीबाघा नाट्य संस्थान की ओर से लगाया गया है.
जहां पिंजरे मे बंदी नाटककार विभिन्न प्रकार के पागलपन का प्रदर्शन करके दर्शकों को आकर्षित कर रहे हैं. जिसके लिए दर्शकों से बीस रुपये वसूला जा रहा है. आयोजकों की ओर से दर्शकों को आकर्षित करने के लिए अजीब तरह से पिंजरे में विभिन्न प्रकार के पागल देखने की माइक से घोषणा की जा रही है. जिसे लेकर शहर के मानवीय लोगों द्वारा आपत्ति की जा रही है.
इसे लेकर शहर के कई नागरिकों ने रोष व्यक्त किया. हालांकि, ड्रामा इंस्टीट्यूट का कहना है कि यह मानसिक बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए दिखाया जा रहा है. लेकिन कई नागरिक संस्था इस विचार से सहमत नहीं दिख रहे हैं. समाज शास्त्र की शिक्षिका तनुश्री सान्याल कहती हैं कि मानसिक रोगियों के साथ मौज-मस्ती करने की कई लोगों में एक सरल प्रवृत्ति है.
इसके अलावा कई लोग मानते हैं कि मानसिक बीमारी एक अभिशाप है. मानसिक बीमारियों वाले परिवार समाज में कई समस्याओं का सामना करते हैं. इस तरह के विषय के साथ जागरूकता बढ़ाने के लिए कितना जाना जा सकता है, इस बारे में बहस चल रही है, लेकिन अर्थ अच्छा है.
जादवपुर में राजनीति विज्ञान की पढ़ाई कर रही उर्मि मुखोपाध्याय ने आयोजकों के लोगों को आकर्षित करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए इसे गैर मानवीय करार दिया. उन्होंने कहा कि इस पर मेला कमेटी से सवाल किया जाना चाहिए. दुर्गापुर अदालत के वकील और कंकासा पंचायत समिति के सदस्य बैशाखी बंद्योपाध्याय ने कहा कि अभी तक कल्पतरु मेला में जाना नहीं हुआ है.
लेकिन लोगों से जो जानकरी मिल रही है.उससे लगता है कि मानसिक रोगियों के परिवार को इसे दुख लग सकता है. सरकरी स्कूल के एक शिक्षक ने नाम नहीं बताते हुए कहा कि मेरी मां मानसिक रोगी हैं. कभी-कभी यह असहनीय हो जाता है. जिसके परिवार में इस प्रकर के रोगी होते हैं, उन्हें ही इसका दर्द पता है.
इसलिए इस प्रकार के रोगियों को तमाशा बनाकर पेश करना सही नहीं है. भौतिक विज्ञान की शिक्षिका सुचेता रॉय का कहना है कि बहुत से लोग इसे बच्चों के साथ देख रहे हैं, जो बच्चों के मन में विकृत मानसिकता पैदा कर सकती है. वस्तुतः कई लोगों को लगता है कि मेले में इस प्रकार के आयोजन की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए थी.
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