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प्रतिवर्ष ढाई लाख बांग्लादेशी आते हैं भारत में

Updated at : 13 Dec 2019 12:41 AM (IST)
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प्रतिवर्ष ढाई लाख बांग्लादेशी आते हैं भारत में

3.9 मिलियन बांग्लादेशियों का घर बना भारत देश के नागरिकों के लिए बड़ी चुनौती आसनसोल : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में दक्षिण एशियाई देशों के अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार भारद्वाज ने कहा कि प्रवासी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं. काजी नजरूल विश्वविद्यालय के विद्याचर्चा भवन स्थित सभागार […]

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3.9 मिलियन बांग्लादेशियों का घर बना भारत

देश के नागरिकों के लिए बड़ी चुनौती
आसनसोल : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में दक्षिण एशियाई देशों के अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार भारद्वाज ने कहा कि प्रवासी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं. काजी नजरूल विश्वविद्यालय के विद्याचर्चा भवन स्थित सभागार में गुरुवार को “ सुरक्षा, विस्थापन एवं पर्यावरण : दक्षिण एशियाई देशों के परिपेक्ष्य में “ विषय पर आयोजित एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में उन्होंने प्रवासियों द्वारा किसी देश के सामाजिक संरचना, आर्थिक एवं राजनीतिक क्षेत्र में बढते दखल, संस्कृति पर मंडराता खतरा, देश के मौजूदा संसाधनों का दोहन एवं अन्य पहलूओं पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा की.
संगोष्ठी में थामसन विश्वविद्यालय थाईलेंड के प्रोफेसर डॉ. क्रिस्टोफर प्लॉबर्जर, केएनयू में दक्षिण एशियाई देशों के अध्ययन केंद्र के समन्वयक डॉ. देबाशिष नंदी, रजिस्ट्रार (अतिरिक्त प्रभार ) डॉ. एसके घोष, कला संकाय के डीन सह केएनयू में हिंदी के विभागाध्यक्ष डॉ. बिजय कुमार भारती, बर्दवान विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यापक सह अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग जादवपुर विश्वविद्यालय के अध्यापक डॉ. अनिल कुमार विश्वास, एचएमएमसीडब्लू कोलकाता में राजनीति विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर प्रदीप मुखर्जी आदि उपस्थित थे.
संगोष्ठी में प्रवासन की समस्या झेल रहे दक्षिण एशियाई देशों में बढती चुनौतियों, अमेरिका, चीन, कोरिया, फ्रांस की सरकारों की प्रवासियों को लेकर नीतियां, भारत में प्रवासन के बढते मामलों एवं इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को मिल रही चुनौतियों पर अपने विचार रखे.
भारत में प्रवासन को लेकर नये ढंग से नीति बनाने की सलाह दी. वर्ष 1947 से प्रवासन की समस्या झेल रहे भारत में प्रवासन को एक बड़ी समस्या बताते हुए प्रोफेसर मुखर्जी ने कहा कि इसे लेकर भारत को अपनी मौजूदा नीतियों में बड़े बदलाव करने की जरूरत है.
साल 1951 से 2000 तक भारत में प्रवासन के आंकड़ों के ब्यौरों को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रति वर्ष 2.5 लाख बांग्लादेशी भारत में आते हैं. विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार साल 2010 में बांग्लादेश से भारत में 31,90,769 श्रमिक बतौर प्रवासी आये और शरण लिये. साल 2017 के यूनाइटेड नेशन के डेसा से जारी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि भारत 3.9 मिलियन बांग्लादेशियों का घर बना हुआ है. जो वहां के मूल नागरिकों एवं उनके अधिकारों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं.
इन सबके उलट बांग्लादेश से आने वाले लोगों द्वारा किये जा रहे सस्ते श्रम को उन्होंने यहां के लोगों के लिए लाभकारी बताया. उन्होंने कहा कि किसी भी देश में आने वाले प्रवासी कम शिक्षित, अकुशल होते हैं, जो उस देश में सस्ते श्रम दर पर काम करते हैं. डॉ. क्रिस्टोफर प्लोबर्जर ने दक्षिण एशियाई देशों को चीन के बढते प्रभाव एवं चुनौतियों के लिए तैयार रहने को कहा.
चीन की विदेश नीतियों एवं सस्ते सामानों के बल पर अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रभुत्व बढाने की नीतियों को घातक बताया. डॉ. जेके भारती ने कहा कि दक्षिण एशिया देशों में भारत विस्थापितों के लिए सबसे पसंदीदा देश बन गया है. उन्होंने दुनिया भर के देशों में विस्थापन को रोकने को लेकर बन रहे कानूनों का समर्थन करते हुए कहा कि विस्थापित किसी भी देश के रोजगार, आर्थिक विकास के लिए चुनौती है.
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