बर्दवान राजबाड़ी में होती थी पट-दुर्गापूजा
Updated at : 19 Sep 2019 1:54 AM (IST)
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कालना के दाईहाट से कलाकार बुलाकर कैनवस पर होता था चित्रण राज पुरोहित की सलाह से तत्कालीन राजा तेजचांद ने की थी शुरुआत बर्दवान : कहावत है कि दोल-दुर्गोत्सव राजबाड़ी में शानदार होता है. लेकिन बिडम्बना ही है कि राजबाड़ी है, पर दुर्गापूजा आयोजित नहीं होगी. तीन सौ साल पहले तत्कालीन राजा तेजचांद ने बर्दवान […]
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कालना के दाईहाट से कलाकार बुलाकर कैनवस पर होता था चित्रण
राज पुरोहित की सलाह से तत्कालीन राजा तेजचांद ने की थी शुरुआत
बर्दवान : कहावत है कि दोल-दुर्गोत्सव राजबाड़ी में शानदार होता है. लेकिन बिडम्बना ही है कि राजबाड़ी है, पर दुर्गापूजा आयोजित नहीं होगी. तीन सौ साल पहले तत्कालीन राजा तेजचांद ने बर्दवान राजबाड़ी में दुर्गापुजा शुरू की. राजघरानों का जमाना भले ही नहीं रहा हो, राजा के स्टेट से दुर्गापूजा का आयोजन.होता है. महाराज तेजचांद की दुर्गापूजा के बाद राज पुरोहित ने कहा कि राज परिवार के कुलदेवता लक्ष्मीनारायण है. बाध्य होकर महाराज ने पटेश्वरी देवी दुर्गापूजा का आयोजन किया. महारानी विषण कुमारी ने पटेश्वरी दुर्गापुजा का आयोजन शुरू की.
सनद रहे कि बर्दवान के महाराज त्रिलोकचांद के जमाने में मराठों तथा ब्रिटिशो का आक्रमण हुआ. दोनों से लड़ाई के कारण राज परिवार की स्थिति खराब हो गई तथा महाराज त्रिलोकचांद का निधन हो गया. उनके बेटे तेजचांद की स्टेट संचालन में कोई रूचि नहीं थी. रानी बिषणकुमारी ने राजबाड़ी में देवी दुर्गा का आराधना करने का निर्णय लिया, शुरूआत में पट में अंकन किया और दुर्गादेवी का पूजा की.
इसी परंपरा के अनुसार राजबाड़ी में पटेश्वरी देवी दुर्गा का पूजा होती है. कपड़े के कैनवास में पटेश्वरी का चित्रण किया जाता है. शुरूआती वर्षों में हर साल नया चित्रण किया जाता था, फिलहाल 12-12 साल पर कैनवास में पटेश्वरी का प्रतिमा का चित्रण किया जाता है.
बर्दवान राजबाड़ी स्थित लक्ष्मीनारायन जिउ मंदिर में पटेश्वरी देवी की पूजा होती है. दीवारों से पलस्टर उखड़ रहे हैं. दिन में भी अकेले जाने में डर लगता है. मंदिर में सिर्फ कबूतरों की आवाज सुनाई देती है. शाम के बाद यहां भूतों का डेरा लगता है. महाराज के जमाने में कटवा के दांईहाट से पट कलाकारो को बर्दवान राजबाड़ी में लाकर देवी दुर्गा की प्रतिमा कैनवास में चित्रित होती थी.
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