सर! ‘सावधान नीचे आग है’ में किन सावधानियों की ओर इशारा है

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रानीगंज : रानीगंज मारवाड़ी सनातन विद्यालय के सभागार में कथाकार संजीव के साथ िशक्षकों, छात्र-छात्राओं ने लंबी बातचीत की. उनकी कहानियों, ‌उपन्यासों से संबंधित कई सवाल पूछे गये. प्रधानाध्यापक दीपक कुमार सिंह ने स्तबक और प्रतीक चिन्ह से सम्मािनत करते हुये उनसे पूछा कि ‘सावधान नीचे आग है’ उपन्यास में किन सावधानियों की ओर इशारा […]

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रानीगंज : रानीगंज मारवाड़ी सनातन विद्यालय के सभागार में कथाकार संजीव के साथ िशक्षकों, छात्र-छात्राओं ने लंबी बातचीत की. उनकी कहानियों, ‌उपन्यासों से संबंधित कई सवाल पूछे गये. प्रधानाध्यापक दीपक कुमार सिंह ने स्तबक और प्रतीक चिन्ह से सम्मािनत करते हुये उनसे पूछा कि ‘सावधान नीचे आग है’ उपन्यास में किन सावधानियों की ओर इशारा किया गया है. वर्तमान दौर में देश और समाज की छाती में आग ही आग है. कथाकार संजीव ने कहा बताया कि शीर्षक प्रतीकात्मक है. इसका अर्थ अभिद्या में भी लिया जा सकता है. दामोदर नदी के तट पर कोयलांचल बसा हुआ है.

दामोदर शब्द दाम से बना है. दामोदर अर्थात् जिसके उदर में आग है. यहां से लेकर झरिया तक धरती के नीचे कोयला है और उसमें आग लगी है. उपन्यास में खौफनाक यथार्थ को दर्शाया गया है. कोयला खान में पानी भर जाने के कारण 21 दिनों तक की दर्दनाक मौत का उल्लेख किया है. यह बहुत ही त्रासद है. इसके लिये मैंने काफी शोध और अध्ययन किया था. श्री सिंह ने पूछा कि उनकी कहानी ‘धावक’ में धावक कौन है?संजीव ने बताया कि सामान्य रूप से हम सभी धावक हैं.

जिंदगी की रेस में हम सभी शामिल हैं. इस रेस में अशोक दा की तरह चतुर चालाक आदमी सफल हो जाता है. भंवल दा जैसा ईमानदार आदमी वंचित रह जाता है. बावजूद इसके वह हार नहीं‌ मानता है. वह अपनी दौड़ को अनवरत जारी रखता है. डॉ रविशंकर सिंह ने पूछा कि आप एक्टिविस्ट राइटर हैं. आपने धावक कहानी में अशोक दा और भंवल दा के माध्यम से दो वर्गों के चरित्र को दर्शाया है. लेकिन सर्वहारा वर्ग का प्रतिनिधि पात्र भंवल दा अंततः क्यों हार जाता है? कथाकार संजीव ने कहा कि भवन दा हारता नहीं है. उसकी नियति उसे जिस मुकाम पर ले जाती है, फिलहाल हम संघर्ष धर्मियों की यही स्थिति है. उसकी मौत के समय अशोक दा जब उसके घर पर पहुंचते हैं तो चिमनी से निकलता हुआ काला धुआं प्रतिवाद के प्रतीक के रूप में वहां दिखाई देता है. शिक्षक वैद्यनाथ मिश्र ने पूछा कि बदलते यथार्थ के दौर में सोशल मीडिया का प्रचार प्रसार काफी बढ़ रहा है. क्या आप इसे अपने साहित्य में स्थान देंगे? संजीव ने कहा कि समाज का हर परिवर्तन साहित्य में दर्ज किया जायेगा. छात्र- छात्राओं ने उनके पुरस्कारों से संबंधित उनसे कुछ सवाल पूछे. संजीव ने कहा कि विज्ञान और समाज विज्ञान के बीच से ही साहित्य का नया मार्ग बनेगा जो समाज के लिए हितकर होगा. विज्ञान हमारे लिए जरूरी है लेकिन विज्ञान अंधा है. समाज विज्ञान विज्ञान को दृष्टि देगा.विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिका सुभाष प्रसाद, सैकत चटर्जी, रमेश यादव, शंभु रजक, मनु साव, शांतनु भक्त, आशीष राय चौधरी, संजीव जायसवाल, सरिता राय, पुष्पलता राणा, अंशु चतुर्वेदी, सुनिता कुमारी आदि उपस्थित थे.

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