24 को नहाय-खाय, 26 को पहला अर्घ्य

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आस्था. भास्कर को समर्पित चारदिवसीय महाछठ पूजा की तैयारियां हो गयी शुरू बिहार की तर्ज पर आसनसोल सहित पूरे शिल्पांचल में दीपावली के बीतते ही महाछठ की तैयारियां शुरू हो गयी हैं. नदी, तालाबों तथा जलाशयों की सफाई कर उन तक पहुंचनेवाली सड़कों की मरम्मत शुरू हो गयी है. घाटों पर युवकों की टोली व्यवस्था […]

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आस्था. भास्कर को समर्पित चारदिवसीय महाछठ पूजा की तैयारियां हो गयी शुरू
बिहार की तर्ज पर आसनसोल सहित पूरे शिल्पांचल में दीपावली के बीतते ही महाछठ की तैयारियां शुरू हो गयी हैं. नदी, तालाबों तथा जलाशयों की सफाई कर उन तक पहुंचनेवाली सड़कों की मरम्मत शुरू हो गयी है. घाटों पर युवकों की टोली व्यवस्था करने में लगी हुई है.
आसनसोल : दीपावली संपन्न होते ही आसनसोल शहर सहित शिल्पांचल के निवासी छठ महापर्व की तैयारी में जुट गये हैं. घर-घर में छठ के गीत गूंजने लगे हैं. शुद्ध आटा के लिए गेहूं को धोकर सूखाया जाने लगा है. कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से महापर्व छठ की शुरुआत हो जाती है. इस बार यह पर्व मंगलवार, 24 अक्तूबर से शुरू होकर शुक्रवार, 27 अक्तूबर तक बहुत ही सात्विकता के साथ मनाया जायेगा. इसमें व्रती अस्ताचलगामी (प्रथम अद्र्य) और उदीयमान सूर्यदेव (दूसरा अद्र्य) को अद्र्य अर्पित कर भगवान से सुख- समृद्धि का आशीर्वाद मांगती हैं.
नहाय-खाय: व्रत का प्रथम संयम 24 अक्तूबर को नहाय-खाय से शुरू हो जायेगा. इस दिन व्रती प्रात: काल स्नानादि से निवृत्त होकर अरवा चावल, चने की दाल, लौकी से विभिन्न व्यंजन तैयार करती हैं. भगवान सूर्यदेव को जल अर्पित कर अपने आराध्य के निमित्त व्यंजन अर्पित करती हैं. पूजा के बाद व्यंजन को सबसे पहले व्रती ग्रहण करती हैं. फिर परिजन, कुटुंब, मित्रजनों को वितरित किया जाता है.
खरना: शुभ मुहुर्त्त : संध्या 06:45 बजे से रात्रि 09:55 बजे तक (प्रदोष काल पूजन सवरेत्तम माना जाता है.) व्रत का द्वितीय संयम खरना बुधवार, 25अक्तूबर को है. व्रती प्रात: काल स्नानादि से निवृत्त हो जाते हैं. दोपहर के बाद फिर से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर घर के नियत कक्ष में आम की लकड़ी से गुड़, अरवा चावल, गाय दूध, गाय की घी आदि से खीर बनाती है. शुद्ध आटे की रोटी भी बनायी जाती है. कुल परंपरा के अनुसार विभिन्न प्रकार के सात्विक व्यंजन तैयार किये जाते हैं. शुभ मुहुर्त्त में शंत भाव से छठी मैया और आराध्य देव की पूजा की जाती है. इस प्रसाद को सबसे पहले व्रती ग्रहण करती हैं. इसके बाद इसे परिजन और मित्रजनों में बांटा जाता है.
प्रथम अर्घ्य
अर्घ्य का सर्वोत्तम समय – संध्या 04:30 बजे से 05:10 बजे तक
गुरुवार, 26 अक्तूबर को अस्तचलगामी सूर्यदेव को अर्घ्य दान (प्रथम अर्घ्य) किया जायेगा. इसे डाला छठ भी कहा जाता है. इस दिन व्रती ब्रह्म मुहुर्त्त से पहले नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूजा के निमित्त विभिन्न प्रकार के नेवैद्य तैयार करती हैं.
गेहूं आटा, गुड़, गाय घी आदि से पकवान, चावल आटा, तिल, गुड़ से लड्डू व अन्य पकवान बनाया जाता है. इसे सूप में सजाया जाता है. जिसे डलिया में रख कर नदी, तालाब अथवा जलाशय तट पर ले जाया जाता है. वहां अस्तचलगामी सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है.
द्वितीय अर्घ्य
अर्घ्य के लिए सर्वोत्तम समय- प्रात: 05:49 बजे से 07:15 बजे तक
शुक्रवार, 27अक्तूबर को उदीयमान सूर्यदेव का अर्घ्य अर्पित किया जायेगा. इस दिन व्रती पारना करेंगी. व्रती और श्रद्धालू ब्रह्म मुहुर्त्त से पहले स्नानादि से निवृत्त होकर श्रद्धा के साथ डालिया सजा कर छठ घाट ले जाते हैं. घाट पर छठ गीत गाते हउए सूर्यदेव के उदय होने का इंतजार किया जाता है. उदित होने के साथ अर्घ्य अर्पण शुरू हो जाता है. व्रती सुबह 05:50 से 08:50 बजे तक पारना जरूर तक लें.
छठ महापर्व के लिए बाजारों में सूप व दऊरा की बिक्री शुरू हो गयी है. रविवार को कई व्रतधारियों ने इनकी खरीदारी की. भीड़-भाड़ से बचने के लिए अभी से ही सूप-दऊरा की खरीदारी करने लगे हैं.
सूप : 60 रूपये से सौ रुपये तक
खांचा : सौ रुपये से डेढ़ सौ रुपये तक
चौड़ी टोकड़ी : 70 रुपये से 90 रुपये
पंखा : 15 रुपये से 25 रुपये तक
दऊरा : डेढ़ सौ रुपये से तीन सौ रुपये तक
छोटा सुपली : 30 रुपये से 40 रुपये तक
नारियल : 30 रुपये से 40 रुपये तक (कीमत प्रति पीस)
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