पार्ट टू हिंदी के सामान्य पेपर टू के प्रश्न पत्र में छह के बजाय पांच प्रश्न ही

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कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्षों पर भी सवाल परीक्षार्थियों ने विभिन्न कॉलेजों के हिंदी के विभागाध्यक्षों पर भी सवाल खड़े किये हैं. उनका कहना है कि विभागाध्यक्ष सहित सभी शिक्षकों का यह दायित्व है कि परीक्षा से जुड़ी हर गतिविधियों पर नदर रखे. क्योंकि सभी परीक्षार्थियों का संबंध यूनिवर्सिटी से नहीं होता. इस गड़बड़ी के सामने […]

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कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्षों पर भी सवाल
परीक्षार्थियों ने विभिन्न कॉलेजों के हिंदी के विभागाध्यक्षों पर भी सवाल खड़े किये हैं. उनका कहना है कि विभागाध्यक्ष सहित सभी शिक्षकों का यह दायित्व है कि परीक्षा से जुड़ी हर गतिविधियों पर नदर रखे. क्योंकि सभी परीक्षार्थियों का संबंध यूनिवर्सिटी से नहीं होता. इस गड़बड़ी के सामने आने के बाद विभागाध्यक्षों के स्तर से पहल होनी चाहिए थी. परीक्षा के दिन ही वैकल्पिक व्यवस्था होनी चाहिए थी.
यदि यह बात सामने आयी तो सभी परीक्षार्थियों को ग्रेस अंक दिलाने की पहल होनी चाहिए. उनकी कहना है कि अपवादों को छोड़ दें तो हिंदी विभाग के अधिसंख्य शिक्षकों को इन गतिविधियों से तुछ लेना-देना नहीं होता. शिक्षण परिसर से अलग उनकी सक्रियता होती है, शिक्षा के स्तर या छात्रों की परेशानियों से उनका कुछ लेना-देना ही नहीं होता.
क्या है पूरा मामला
पार्ट टू हिंदी जेनरल के पेपर टू की परीक्षा के प्रश्न पत्र में बड़ी भूल थी. प्रश्न संख्या दो में छह काव्य उद्धरणों की व्याख्या करनी थी. इसके लिए छह-छह अंक निर्धारित थे.
जब परीक्षार्थियों ने प्रश्न पत्र देखा तो उसमें छह के बजाय पांच ही उद्धरण दिये गये थे. जबकि पूर्णांत के अनुसार कम से कम छह उद्धरण तो होने ही चाहिए थे. परंपरा के अनुसार कम से कम आठ उद्धरण होने चाहिए थे. ताकि परीक्षार्थियों को कम से कम दो विकल्प तो मिले ही. परीक्षार्थियों ने इसकी शिकायत वीक्षकों तथा संबंधित परीक्षा केंद्र के प्रभारियों से की.
कुछ ने यूनिवर्सिटी के अधिकारियों से भी संपर्क किया. लेकिन कोई उचित जबाब नहीं मिला. परीक्षार्थियों को केंद्रों में कहा गया कि वे पांच का ही उत्तर लिखे. छह अंक उन्हें ग्रेस में यूनिवर्सिटी दे देगा. मीडिया में इस खबर के प्रकाशित होने के बाद यह मुद्दा कुलपति डॉ चक्रवर्ती तक पहुंचा. उन्होंने पूरे प्रकरण पर दु:ख जताते हुए इस दिशा में उचित पहल करने का आश्वासन दिया. परीक्षार्थियों को लगा कि उन्हें न्याय मिल जायेगा.
उत्तर पुस्तिकाओं की जांच में फंसा पेंच
पूरे प्रकरण के बाद भी यूनिवर्सिटी के स्तर से इस दिशा में कोई स्पष्ट निर्णय नहीं लिया गया. अब शिक्षक-शिक्षिकाओं को इसकी उत्तर पुस्तिका जांच करने का दायित्व दिया गया है. वे प्रश्न पत्र देख कर परेशान है. उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे छठी व्याख्या के बारे में क्या निर्णय लें?
क्योंकि यह गलती तो यूनिवर्सिटी की है. इसका खामियाजा परीक्षार्थी क्यों भुगतें? कुछ ने इस संबंध में अपने कॉलेज विभागाध्यक्ष से तो कुछ ने यूनिवर्सिटी से इस संबंध में निर्देश मांगे हैं. लेकिन कोई जबाब नहीं मिला है. कुछ शिक्षकों का कहना है कि उन्हें कहा गया है कि प्रश्न पत्र मुद्रण में गलती हो गयी है. तीन अन्य उद्धरण प्रश्न संख्या चार में चले गये हैं. उनके आधार पर जांच कर मार्किग कर दें. लेकिन प्रश्न चार में भी काफी विसंगतियां हैं.
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