अस्पताल का सिस्टर रूम सहारा

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सिलीगुड़ी : कहते हैं कि अहम् की लड़ाई में बड़ों-बड़ों की जिंदगी तबाह हो जाती है. ऐसा ही कुछ मात्र दो महीने के उम्र की ‘अनन्या’ के साथ हो रही है. अनन्या को यह नाम भी उसकी मां या पिता ने नहीं दी है. उसको यह नाम सिलीगुड़ी जिला अस्पताल के नर्सो ने दी है […]

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सिलीगुड़ी : कहते हैं कि अहम् की लड़ाई में बड़ों-बड़ों की जिंदगी तबाह हो जाती है. ऐसा ही कुछ मात्र दो महीने के उम्र की ‘अनन्या’ के साथ हो रही है. अनन्या को यह नाम भी उसकी मां या पिता ने नहीं दी है. उसको यह नाम सिलीगुड़ी जिला अस्पताल के नर्सो ने दी है और पिछले दो महीने से सदर अस्पताल का सिस्टर रूम ही अनन्या का बसेरा बना हुआ है.

घटनाक्रम के अनुसार इस वर्ष 4 सितंबर को सिलीगुड़ी के लेकटाउन इलाके के कुछ लोगों ने एनजेपी आउट पोस्ट पुलिस को फोन करके एक नवजात बच्ची के पड़े होने की जानकारी दी. उसके बाद एनजेपी पुलिस की पेट्रोलिंग टीम ने उस बच्ची को वहां से बरामद कर सिलीगुड़ी सदर अस्पताल में भर्ती कर दिया. कुछ दिनों बाद ही बच्ची स्वस्थ हो गई, लेकिन उसको कोई अपनाने वाला नहीं था. तब से लेकर यह बच्ची सिलीगुड़ी जिला अस्पताल में ही पड़ी हुई है.

बच्ची को अस्पताल के नर्सो ने ही अनन्या नाम दिया है. यह बच्ची सिस्टर रूम में ही रहती है. अस्पताल की नर्से बच्ची के दूध सहित अन्य जरूरतों को पूरा कर रही है. पुलिस का कहना है कि बच्ची को किसी कुंवारी मां ने जन्म दिया है और उसे अपनाने से इंकार कर दिया. नियमानुसार बच्ची के स्वस्थ होने के बाद उसे चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को सौंप दिया जाना चाहिए. इस प्रकार के बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी चाइल्ड वेलफेयर कमेटी की है. कहते हैं कि सिलीगुड़ी जिला अस्पताल के अधीक्षक डॉ. अमिताभ मंडल तथा चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के अहम् की लड़ाई में नन्हीं अनन्या की जिंदगी फंस गई है.

खासकर डॉ. अमिताभ मंडल के अड़ियल रवैये के कारण स्थिति बिगड़ गई है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार अस्पताल में बच्ची के स्वस्थ होने के बाद इस बात की जानकारी चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को दी जानी चाहिए थी. यह एक सरकारी संगठन है और इस कमेटी के चेयरमैन को एक मजिस्ट्रेट का अधिकार मिला हुआ है. चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्यों ने इस दौरान कई बार अस्पताल अधीक्षक डॉ. अमिताभ मंडल से मिल कर बच्ची के स्वास्थ्य के संबंध में रिपोर्ट देने को कहा.

आरोप है कि तमाम आदेशों के बावजूद डॉक्टर मंडल ने ऐसा नहीं किया. जबकि चाइल्ड वेलफेयर कमेटी ने इस बात का लिखित निर्देश डॉक्टर मंडल को जारी किया है. उसके बावजूद उन्होंने इसकी रिपोर्ट नहीं दी. नियमानुसार बच्ची के स्वस्थ होने संबंधी अस्पताल अधीक्षक के रिपोर्ट के बाद ही चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्य इस मामले में हस्तक्षेप कर सकते हैं. एक बार रिपोर्ट मिल जाने के बाद ऐसे बच्चे को किसी होम में रखना है या किसी को गोद देना है, इस पर फैसला चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के सदस्य करते हैं. इस संबंध में चाइल्ड लाइन के कॉडिनेटर सोनू छेत्री ने कहा है कि चाइल्ड वेलफेयर कमेटी के चेयरमैन के आदेश को न मानना एक तरह से कोर्ट की अवमानना के समान है.

ऐसे में डॉक्टर मंडल का आदेश का पालन नहीं करना किसी के समझ से परे हैं. उन्होंने आगे बताया कि डॉक्टर मंडल ने इस मामले में बेहद अड़ियल रूख अपनाया है. उन्हें चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को रिपोर्ट देना अपने शान के खिलाफ लगता है. इस बीच, तताम दबावों के बाद डॉक्टर मंडल ने सिलीगुड़ी की एसडीओ दीपाप प्रिया पी को अनन्या के स्वस्थ होने संबंधी रिपोर्ट सौंप दी. एसडीओ ने यह रिपोर्ट चाइल्ड वेलफेयर कमेटी जलपाईगुड़ी को भेज दिया, जबकि इस रिपोर्ट को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी दाजिर्लिंग को भेजा जाना चाहिए था.

एसडीओ इस मामले में सीधा हस्तक्षेप नहीं कर सकती. बाद में जब तक इस रिपोर्ट को चाइल्ड वेलफेयर कमेटी दाजिर्लिंग को भेजा गया तब तक इस कमेटी को भंग कर दिया गया. 29 सितंबर को ही इस कमेटी को भंग कर दिया गया है. तब से लेकर अब तक कमेटी की कोई बैठक नहीं हो पायी है जिसकी वजह से अनन्या का भविष्य अधर में लटक गया है. सोनू छेत्री ने बताया है कि कमेटी के भंग होने के बाद भी नयी कमेटी के गठन नहीं होने तक पुरानी कमेटी के माध्यम से ही काम-काज को चलाने का निर्देश दाजिर्लिंग के डीएम ने दिया है.

लेकिन समस्या यह है कि कमेटी के पांचों सदस्य अलग-अलग रहते हैं और दो सदस्य दाजिर्लिंग में तो एक जलपाईगुड़ी में और दो सिलीगुड़ी में रहते हैं. कमेटी के चेयरमैन मृणाल घोष हैं. हालांकि उनका कार्यकाल खत्म हो चुका है, लेकिन कार्यवाहक के रूप में वह अपना कार्यभार संभाल रहे हैं. उन्होंने भी अब तक कोई बैठक नहीं बुलायी है जिसमें अनन्या का भविष्य तय हो सके.

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