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जब सनराइज मसाले का हो साथ तो क्यों न हो हर दिन खास

Updated at : 08 Jun 2021 11:17 AM (IST)
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जब सनराइज मसाले का हो साथ तो क्यों न हो हर दिन खास

हमने पिछली बार चर्चा की थी कि जब इस लॉकडाउन के दौरान बाहर की दुनिया थमी हुई है, वहीं किस तरह लोग अपने घरों में रह कर कुकिंग के जरिये खुशियां तलाश रहे हैं. ऐसे में उन खास रेसिपीज को भी अपनी रसोई में ट्राई कर रहे हैं, जिनका लुत्फ वीकेंड या किसी खास अवसर पर रेस्टोरेंट में जाकर उठाया जाता था. जाहिर तौर पर जब आप घर में रेस्टोरेंट वाला स्वाद पाना चाहते हैं, तो इसके लिए ढेरों तैयारियां भी करनी पड़ती है, जो कभी-कभार बोझिल हो जाती है.

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हमने पिछली बार चर्चा की थी कि जब इस लॉकडाउन के दौरान बाहर की दुनिया थमी हुई है, वहीं किस तरह लोग अपने घरों में रह कर कुकिंग के जरिये खुशियां तलाश रहे हैं. ऐसे में उन खास रेसिपीज को भी अपनी रसोई में ट्राई कर रहे हैं, जिनका लुत्फ वीकेंड या किसी खास अवसर पर रेस्टोरेंट में जाकर उठाया जाता था. जाहिर तौर पर जब आप घर में रेस्टोरेंट वाला स्वाद पाना चाहते हैं, तो इसके लिए ढेरों तैयारियां भी करनी पड़ती है, जो कभी-कभार बोझिल हो जाती है. मगर अब आपको टेंशन लेने की कोई जरूरत नहीं, क्योंकि इसके समाधान के रूप में ‘सनराइज मसाले’ लेकर आया है 25 से भी अधिक ब्लेंडेड मसालों की लंबी रेंज. इनकी मदद से आप चुटकियों में एक से बढ़ कर एक स्वादिष्ट व्यंजन तैयार कर सकते हैं. आपको अलग से किसी अन्य मसाले की जरूरत नहीं. इससे आपका समय भी बचता है. यकीन मानिए, सनराइज मसाले पर आपका भरोसा खाने के स्वाद को अद्भुत बना देता है, क्योंकि इसके पास है 100 वर्षों का अनुभव.

इस कड़ी में आगे जानते हैं आपके कुछ फेवरेट रेस्टोरेंट डिशेज के बारे में कि उनकी शुरुआत कब, कहां और कैसे हुई. इसके बाद यकीनन इन डिशेज को लेकर आपका प्यार और बढ़ जायेगा.
पनीर बटर मसाला
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पनीर को लेकर कहा जाता है कि यह मुगलों की देन है. कुछ पुराने दस्तावेज बताते हैं कि फारसी और अफगान शासक 16वीं शताब्दी में अपने शासन के दौरान इसे उत्तर भारत में लेकर आये थे. तब शाकाहारियों के बीच अपने पौष्टिक गुणों की वजह से यह बहुत ही पसंद किया जाने लगा. लोगों को इसके सेवन करने से ऊर्जावान होने का अनुभव हुआ. बात अगर पनीर बटर मसाला के रेसीपी की करें, तो ऐसी जानकारी मिलती है कि 1950 के दशक में कुछ पंजाबियों द्वारा दिल्ली के प्रसिद्ध मोती महल रेस्तरां में इसकी शुरुआत हुई थी. यही कारण है कि इस रेसिपी में गजब का पंजाबी स्वाद मिलता है, जिसकी झलक इसकी ग्रेवी में मिल जाती है. ‘सनराइज मसाले’ वही पारंपरिक स्वाद अपने पनीर बटर मसाला पैक के रूप में लेकर आया है, जिसमें आपको न कोई अन्य मसाला मिलाने की जरूरत है और न कुछ पीसने की जरूरत है.

पाव भाजी
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पाव भाजी का इतिहास भी इसके स्वाद जितना ही चटपटा है. वैसे तो पाव भाजी को महाराष्ट्र का सबसे लोकप्रिय स्ट्रीट फूड माना जाता है, जिसका स्वाद आज देशभर में दूर-दूर तक फैल चुका है. इसे लेकर जानकारी मिलती है कि अमेरिकी गृहयुद्ध (1861 से 1865 तक) की शुरुआत के साथ कपास की वैश्विक मांग में आयी तेजी ने भारतीय कपड़ा मीलों को जबरदस्त काम दिया. बड़े-बड़े ऑर्डर को पूरा करने के लिए मुंबई (तब बॉम्बे) के मीलों में मजदूरों को दिन-रात काम करना पड़ता था. यहां तक कि उनके पास खाने लिए भी बहुत कम समय बचता था. ऐसे में मजदूरों को एक सस्ता भोजन देने की योजना स्थानीय विक्रेताओं द्वारा बनायी गयी, जो जल्दी तैयार भी हो जाये. चूंकि देर रात तक होटलों में बची-खुची सब्जियां ही होती थीं, तो उन्हें मिला कर भाजी तैयार हुई, जिसे बन्स के साथ परोसा जाने लगा. तो ऐसे पाव भाजी वजूद में आया. यह स्वाद में तो हिट था ही, मजदूरों की जेब पर भारी भी नहीं था, इसलिए बेहद लोकप्रिय हो गया. आज छोटे-बड़े रेस्टोरेंट से लेकर फाइव स्टार होटल्स में भी यह सर्व की जाने लगी है. वैसे पाव शब्द की उत्पत्ति पुर्तगाली शब्द पाओ (pao) से मानी जाती है.

तो अगर आप घर बैठे पाव भाजी का वही चटपटा स्वाद पाना चाहते हैं, तो ले आइए ‘सनराइज पाव भाजी मसाला’. यकीन जानिए, आप उन पुरानी यादों में खो जाइएगा.
बिरयानी
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बिरयानी फारसी शब्द ‘बिरियन’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है- ‘खाना पकाने से पहले तला हुआ’ और राइस (चावल) फारसी शब्द बिरिंज से लिया गया है. इस स्वादिष्ट व्यंजन को लेकर कई इतिहासकारों का मानना ​​है कि बिरयानी की उत्पत्ति फारस से हुई थी और यह मुगलों द्वारा भारत में लायी गयी थी. इसे आगे मुगलों ने शाही रसोई के रूप में विकसित किया. बिरयानी के विकास क्रम से जुड़ी कई किंवदंतियां हैं. इनमें शाहजहां की बेगम मुमताज महल से संबंधित कहानी अधिक लोकप्रिय है. ऐसा माना जाता है कि जब मुमताज ने एक बार मुगल सेना के बैरक का दौरा किया, तो मुगल सैनिकों को कुपोषित पाया. तब सैनिकों को पौष्टिक आहार देने के लिए उन्होंने रसोइयों को ऐसा पकवान बनाने को कहा, जिसमें मांस के साथ चावल शामिल हो. इस पकवान को मसालों और केसर के साथ फेंटा गया, फिर लकड़ी की आग पर पकाया गया. एक अन्य किंवदंती है कि बिरयानी को 1398 ई में तुर्क-मंगोल विजेता तैमूर द्वारा भारत लाया गया था. यहां तक ​​कि हैदराबाद के निजाम और लखनऊ के नवाब भी इसके स्वाद के मुरीद माने जाते थे. समय के इस उतार-चढ़ाव में बिरयानी का वही अद्भुत स्वाद आपके लिए ‘सनराइज प्योर’ लेकर आया है

आलू दम
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आमतौर पर दम आलू को पारंपरिक मिट्टी के बर्तन (हांडी) में धीमी आंच पर पूरी तरह सील करके तब तक पकाया जाता है, जब तक कि वह खाने के लिए तैयार न हो जाये. यह आलू और दम (भाप से बना) का संयोजन है. मूलत: यह कश्मीरी पंडितों द्वारा पकाया जानेवाला जम्मू और कश्मीर का पारंपरिक व्यंजन माना जाता है. जम्मू-कश्मीर के खान-पान की उसी परंपरा को सहेजते हुए सनराइज अब झारखंड में आपके लिए लेकर आया है ‘सनराइज आलू दम मसाला’.

सनराइज के माध्यम से आप न केवल स्वादिष्ट भोजन का लुत्फ उठाते हैं, बल्कि हमारे देश की समृद्ध सांस्कृतिक और पाक कला के इतिहास का हिस्सा भी बनते हैं.
गुणवत्ता एवं लाजवाब स्वाद का गौरवमयी इतिहास
पारंपरिक भारतीय मसालों के क्षेत्र में सनराइज मसाले का 100 वर्षों का गौरवमयी इतिहास रहा है. 1910 की शुरुआत में कोलकाता की एक छोटी-सी दुकान से शुरू हुआ मसालों का यह सफर अपनी गुणवत्ता एवं लाजवाब स्वाद के दम पर आज देश का अग्रणी ब्रांड बन चुका है. शुद्ध मसालों के स्वाद और उसके खुशबू को आप तक पहुंचाने के लिए आईटीसी सनराइज अपने कुछ सबसे बेहतरीन उत्पादों को लेकर अब झारखंड आ रहा है.
”एक परंपरा, जो चले जमाने के साथ”
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