झारखंड का प्रसिद्ध सरहुल पर्व इस दिन, साल वृक्ष की पूजा से जुड़ी अनोखी मान्यता
Published by : Shaurya Punj Updated At : 08 Mar 2026 6:00 PM
सरहुल पर्व 2026 में कब
Sarhul Festival 2026: सरहुल झारखंड का प्रमुख आदिवासी प्रकृति पर्व है. 2026 में यह 21 मार्च को मनाया जाएगा. इस दिन साल वृक्ष की पूजा, पारंपरिक नृत्य और सामुदायिक उत्सव आयोजित किए जाते हैं.
Sarhul Festival 2026: झारखंड और आसपास के इलाकों में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व आदिवासी समाज का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है. यह उत्सव प्रकृति की पूजा और उसके संरक्षण का प्रतीक माना जाता है. सरहुल के दौरान साल वृक्ष की पूजा, पारंपरिक नृत्य, गीत और सामुदायिक भोज का विशेष महत्व होता है. इस पर्व के माध्यम से लोग प्रकृति, सूर्य और पृथ्वी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं. सरहुल का त्योहार खासतौर पर झारखंड के उरांव, मुंडा, और अन्य आदिवासी समुदायों के बीच बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है. इस अवसर पर गांवों में खुशी और उत्सव का माहौल देखने को मिलता है.
2026 में कब मनाया जाएगा सरहुल
इस वर्ष यानी 2026 में सरहुल पर्व 21 मार्च, शनिवार को मनाया जाएगा. हालांकि अलग-अलग गांवों और समुदायों में इस पर्व को मनाने की तिथि में थोड़ा अंतर भी देखने को मिलता है. कई स्थानों पर सरहुल का उत्सव एक ही दिन नहीं बल्कि अलग-अलग दिनों में मनाने की परंपरा भी है. पर्व से पहले गांवों में इसकी घोषणा की जाती है और सभी लोग मिलकर सरहुल की तैयारी में जुट जाते हैं.
सरहुल शब्द का अर्थ और महत्व
सरहुल शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है — ‘सर’ या ‘सराय’ और ‘हुल’. ‘सर’ या ‘सराय’ का अर्थ होता है साल का पेड़ (शोरिया रोबस्टा), जबकि ‘हुल’ का अर्थ होता है सामूहिक रूप से या उत्सव. इस तरह सरहुल का अर्थ हुआ साल के पेड़ के माध्यम से प्रकृति का सामूहिक उत्सव. मान्यता के अनुसार सरहुल पर्व पृथ्वी और सूर्य के बीच विवाह का प्रतीक भी माना जाता है. इस दिन लोग पवित्र सरना स्थल या सरना वृक्ष के नीचे पूजा-अर्चना करते हैं और प्रकृति से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं.
विभिन्न जनजातियों में अलग नाम
सरहुल पर्व विभिन्न जनजातियों के बीच अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है. उरांव सरना समाज में इसे ‘खद्दी’ या ‘खेखेल बेंजा’ कहा जाता है. अलग-अलग समुदायों में इसकी परंपराएं और अनुष्ठान थोड़े अलग हो सकते हैं, लेकिन प्रकृति की पूजा और सामूहिक उत्सव इसकी मुख्य विशेषता है. इस दिन गांव के लोग एकजुट होकर प्रकृति और ग्राम देवताओं की पूजा करते हैं.
सरहुल पर्व की पूजा विधि
सरहुल पर्व की तैयारियां लगभग एक सप्ताह पहले से ही शुरू हो जाती हैं. गांव के पाहन (पुजारी) इस पर्व से पहले उपवास रखते हैं. पर्व की सुबह सूर्योदय से पहले पुजारी दो नए घड़ों में पवित्र जल भरकर सरना स्थल पर अर्पित करते हैं. इसके बाद साल के वृक्ष की पूजा की जाती है और गांव की समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है. पूजा के दौरान मां सरना, सूर्य देवता, ग्राम देवताओं और पूर्वजों को याद किया जाता है. पूजा से पहले सरना स्थल की अच्छी तरह सफाई की जाती है. पूजा के दौरान कुछ स्थानों पर पारंपरिक रीति के अनुसार मुर्गे या अन्य पशु-पक्षियों की बलि देने की भी परंपरा रही है.
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नृत्य, गीत और सामुदायिक उत्सव
सरहुल पर्व के दौरान आदिवासी समुदाय के लोग रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों में सजते हैं. पुरुष, महिलाएं और बच्चे सभी मिलकर पारंपरिक नृत्य और गीत प्रस्तुत करते हैं. गांव के अखड़ा में सामूहिक नृत्य का आयोजन किया जाता है, जो इस पर्व का मुख्य आकर्षण होता है. इस दौरान लोग चावल से बने पारंपरिक पेय हांडिया का सेवन भी करते हैं. महिलाएं और पुरुष साल के फूलों को अपने सिर और चेहरे पर सजाते हैं और प्रकृति के इस उत्सव में शामिल होते हैं. सरहुल केवल एक त्योहार ही नहीं बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान, सामूहिकता और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखने का प्रतीक है. यही कारण है कि झारखंड में यह पर्व पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.
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By Shaurya Punj
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