Tribal Mahakumbh: झारखंड के राजमहल में आदिवासियों का महाकुंभ, गंगाघाट पर सजे धर्मगुरुओं के अखाड़े

Updated at : 31 Jan 2026 12:32 PM (IST)
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Tribal Mahakumbh

साहिबगंज के राजमहल में गंगा के किनारे माघी मेला में स्नान करने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ (बाईं ओर ऊपर और नीचे) और दाहिनी ओर धर्मगुरुओं का सजा अखाड़ा. फोटो: प्रभात खबर.

Tribal Mahakumbh: झारखंड के राजमहल में 1 फरवरी 2026 को आदिवासियों का महाकुंभ आयोजित होगा. माघी पूर्णिमा मेला के मौके पर गंगाघाट पर धर्मगुरुओं के अखाड़े सज गए हैं. झारखंड सहित बिहार, बंगाल, ओड़िशा और नेपाल से हजारों आदिवासी श्रद्धालु गंगा स्नान और पूजा के लिए पहुंचे हैं. नीचे पूरी खबर पढ़ें.

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राजमहल से दीप सिंह की रिपोर्ट

Tribal Mahakumbh: झारखंड के राजमहल में 1 फरवरी 2026 को आदिवासियों का महाकुंभ आयोजित होने जा रहा है. राजकीय माघी पूर्णिमा मेला के अवसर पर राजमहल का गंगाघाट आदिवासी आस्था और परंपरा का बड़ा केंद्र बन गया है. पूर्णिमा से पहले ही आदिवासी श्रद्धालु अपने-अपने धर्मगुरुओं के साथ गंगा तट पर पहुंचने लगे हैं और स्नान, पूजा व अखाड़ा स्थापना की प्रक्रिया शुरू कर दी है.

गंगा स्नान के साथ शुरू हुई पूजा-अर्चना

पूर्णिमा मुहूर्त से पूर्व आदिवासी धर्मगुरु और श्रद्धालु गंगा स्नान करते हैं. स्नान के बाद गंगा पूजन कर एक लोटा जल लेकर अखाड़े में पहुंचते हैं. यहां मरांग बुरू रूपी भगवान शिव की आराधना की जाती है. पूरे विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना और परंपरागत अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं, जिससे गंगाघाट का माहौल पूरी तरह आध्यात्मिक हो गया है.

200 से अधिक अखाड़े, हजारों श्रद्धालु

मेला क्षेत्र में अनुमानित छोटे-बड़े करीब 200 अखाड़े लगाए जाते हैं. शुक्रवार को ही हजारों की संख्या में श्रद्धालु राजमहल पहुंचे. अखाड़ों में दिन-रात पूजा, भजन और पारंपरिक अनुष्ठान जारी हैं. यह आयोजन आदिवासी समाज की आस्था, एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती देता है.

कई राज्यों और नेपाल से पहुंचते हैं अनुयायी

राजमहल के इस महाकुंभ में झारखंड के विभिन्न जिलों के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा और नेपाल से भी आदिवासी धर्मगुरु और उनके अनुयायी शामिल होते हैं. दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु इस आयोजन को अपने समाज का महाकुंभ मानते हैं और हर वर्ष इसमें शामिल होना सौभाग्य समझते हैं.

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आस्था और परंपरा का अनोखा संगम

आदिवासियों का यह महाकुंभ केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता का भी प्रतीक है. गंगाघाट पर सजे अखाड़े, पूजा-अर्चना और श्रद्धालुओं की भीड़ राजमहल को कुछ दिनों के लिए आदिवासी आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना देती है.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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