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आदिवासी साहित्य आज भी क्यों है हाशिए पर? रांची में दिल्ली की प्रोफेसर डॉ आईवी हांसदा ने बतायी वजह

Updated at : 28 Apr 2025 5:26 PM (IST)
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gossner college guest lecture

रांची को गोस्सनर कॉलेज में आयोजित अतिथि व्याख्यान में प्रोफेसर डॉ आईवी हांसदा समेत अन्य

Tribal Literature: रांची के गोस्सनर कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में सोमवार को अतिथि व्याख्यान का आयोजन किया गया. मौके पर बतौर मुख्य अतिथि दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ आईवी हांसदा मौजूद थीं. डॉ आईवी हांसदा ने कहा कि दलित साहित्य अब मुख्यधारा के साहित्य में शामिल हो चुका है लेकिन आदिवासी साहित्य आज भी हाशिए पर है. पूरे विश्व में आदिवासियों पर बात होना गर्व की बात है.

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Tribal Literature: रांची-दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ आईवी हांसदा ने कहा कि दलित साहित्य अब मुख्यधारा के साहित्य में शामिल हो चुका है लेकिन आदिवासी साहित्य आज भी हाशिए पर है. इसका प्रमुख कारण प्रभावी वर्ग अपनी भाषा और साहित्य को लेकर शुरू से मुखर रहा है. आदिवासी साहित्य वाचिक परंपरा को लेकर आगे बढ़ा. इसलिए इसका प्रामाणिक दस्तावेज कम उपलब्ध है. कई क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषाओं की अपनी लिपि नहीं है. आज समय है इसे विकसित कर दस्तावेज में संरक्षित करने का. वह रांची के गोस्सनर कॉलेज के अंग्रेजी विभाग में आयोजित अतिथि व्याख्यान को संबोधित कर रही थीं. कार्यक्रम का विषय-फ्रॉम द मार्जिन टू द सेंटर: ट्राइबल लिटरेचर इन इंडियन एकेडमिया (हाशिए से केंद्र की ओर: भारतीय अकादमिक दायरे में आदिवासी साहित्य) था.

विश्वभर में हो रही है आदिवासियों की बात-डॉ आईवी हांसदा


प्रोफेसर डॉ आईवी हांसदा ने कहा कि आदिवासियों का उल्लेख पौराणिक धर्म ग्रंथों रामायण (शबरी ), महाभारत (एकलव्य) और पुराणों आदि में भी मिलता है. आदिवासियों के नेतृत्वकर्ता इतिहास के मध्यकाल विशेष कर मुगल कालखंड में कम मुखर रहे. उनकी आवाज दब सी गई थी. वर्तमान में आदिवासी समाज जनजीवन से जुड़े सभी क्षेत्रों जैसे साहित्य, कला, संस्कृति और चिकित्सा में मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है. आज पूरे विश्व में आदिवासियों पर बात हो रही है. गैर आदिवासी लेखन पर बातचीत करते हुए उन्ह‍ोंने कहा कि आदिवासी साहित्य को समृद्ध करने में आदिवासी साहित्यकारों के साथ गैर आदिवासी लेखकों की लंबी शृंखला है, लेकिन इनके वर्णन में स्वानुभूति की जगह सहानुभूति की झलक मिलती है.

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अनुवाद और साहित्य सृजन से जुड़ें-डॉ शांतिदानी मिंज


विशेष व्याख्यान कार्यक्रम की शुरुआत स्नातक प्रथम सेमेस्टर की छात्रा साक्षी टेटे ने प्रार्थना कर की. अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ ईवा मार्ग्रेट हांसदा ने अतिथियों का स्वागत किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉ शांतिदानी मिंज ( प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन, क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज एंड मेडिसिन, वेल्लोर) ने कहा कि वे चिकित्सा के पेशे में रहते हुए वंचितों के प्रति समर्पित रहने की कोशिश करती हैं. उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे अनुवाद और साहित्य सृजन से जुड़ें. कार्यक्रम का संचालन एमए चतुर्थ सेमेस्टर की छात्रा प्रियंका टूटी और आभार ज्ञापन अंग्रेजी विभाग के प्रो गौतम एक्का ने किया.

मौके पर ये थे मौजूद


कार्यक्रम में प्रो इंचार्ज इलानी पूर्ती, वर्सर प्रो प्रवीण सुरीन, अंग्रेजी विभागाध्यक्ष डॉ ईवा मार्ग्रेट हांसदा, हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो आशा रानी केरकेट्टा, डॉ सुब्रतो सिन्हा, डॉ सुषमा केरकेट्टा, प्रो अदिति लाया टोप्पो, डॉ प्रशांत गौरव, प्रो आमोस तोपनो, डॉ अब्दुल बासित, डॉ ध्रुपद चौधरी, डॉ विनोद राम सहित विभिन्न विभागों के शिक्षक और विद्यार्थी मौजूद थे.

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Guru Swarup Mishra

लेखक के बारे में

By Guru Swarup Mishra

मैं गुरुस्वरूप मिश्रा. फिलवक्त डिजिटल मीडिया में कार्यरत. वर्ष 2008 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पत्रकारिता की शुरुआत. आकाशवाणी रांची में आकस्मिक समाचार वाचक रहा. प्रिंट मीडिया (हिन्दुस्तान और पंचायतनामा) में फील्ड रिपोर्टिंग की. दैनिक भास्कर के लिए फ्रीलांसिंग. पत्रकारिता में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए. 2020 और 2022 में लाडली मीडिया अवार्ड.

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