यूरोप की तुलना में 20 वर्ष कम जीते हैं झारखंडी ट्राइबल

Updated at : 14 Apr 2024 12:57 AM (IST)
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यूरोप की तुलना में 20 वर्ष कम जीते हैं झारखंडी ट्राइबल

झारखंड में आदिवासियों की औसत आयु यूरोपीय देशों से 20 वर्ष कम हो गयी है. बदली जीवनशैली और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण इनकी आबादी घट रही है. यूरोपीय देशों में आदिवासी समुदाय की औसत आयु 85 साल है. वहीं, झारखंड में पुरुषों की औसत आयु 50 से 55 वर्ष और महिलाओं की औसत आयु 55 से 60 वर्ष है.

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झारखंड में आदिवासियों की औसत आयु यूरोपीय देशों से 20 वर्ष कम हो गयी है. बदली जीवनशैली और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण इनकी आबादी घट रही है. यूरोपीय देशों में आदिवासी समुदाय की औसत आयु 85 साल है. वहीं, झारखंड में पुरुषों की औसत आयु 50 से 55 वर्ष और महिलाओं की औसत आयु 55 से 60 वर्ष है. इसके अलावा राज्य में आदिवासियों की आबादी वर्ष 2011 की जनगणना के हिसाब से वर्तमान में कम हो गयी है. यह जानकारी शुक्रवार को रिम्स के प्रिवेंटिव एंड सोशल मेडिसिन (पीएसएम) विभाग की ओर से आयोजित सेमिनार में दी गयी. सेमिनार में झारखंड के आदिवासियों के स्वास्थ्य विषय पर चर्चा की गयी. इस मौके पर देश-विदेश के डॉक्टरों ने अपना शोध पत्र प्रस्तुत कर आदिवासियों के स्वास्थ्य में सुधार लाने को लेकर जानकारी दी. स्वीडन से आये डॉ लीडिको ने वहां के आदिवासी समुदाय के स्वास्थ्य और उन्हें मिलनेवाली सुविधाओं के बारे में बताया. यह भी बताया गया कि राज्य में कुल आबादी का 26.6 फीसदी आदिवासी हैं. इसमें आदिम जनजाति की आबादी साढ़े तीन लाख है. कार्यक्रम में टीआरआइ के निदेशक डॉ रणेंद्र ने भी आदिवासी आदिम जनजाति के विलुप्त होने और स्वास्थ्य में सुधार लाने पर विचार व्यक्त किये. सेमिनार में डॉ दीपिका शर्मा ने भी विचार व्यक्त किये. मौके पर डॉ सुमंत मिश्रा, डॉ विद्यासागर, डॉ कुमारी आशा किरण, डॉ देवेश कुमार सहित कई डॉक्टर मौजूद थे.

पौष्टिक भोजन से दूर हैं आदिवासी :

रिम्स पीएसएम विभाग के डॉ देवेश कुमार ने बताया कि झारखंड में 32 प्रकार की ट्राइबल जाति व जनजाति हैं, लेकिन इनके स्वास्थ्य का डेटा अब तक उपलब्ध नहीं है. आभा कार्ड से देश के लोगों को जोड़ा जा रहा है, लेकिन देश की तुलना में झारखंड का आंकड़ा नगण्य है. झारखंड की आदिवासी आबादी पौष्टिक भोजन से दूर हैं. दो वक्त के हिसाब से सप्ताह में 14 बार खाने में 10 बार वह भात और आलू ही खाते हैं. हालांकि, राज्य में 60 तरीके की साग मिलती है, लेकिन आदिवासी आज के दौर में इसका उपयोग नहीं करते हैं. सेमिनार में यह भी विचार किया गया है कि अगर इनको मुख्य धारा से जोड़ा गया, तो कहीं उनकी सभ्यता और संस्कृति तो प्रभावित नहीं होगी. आदिवासी की जीवनशैली और स्वास्थ्य पर ‘फूल-बनमाली’ नामक शोध चल रहा है. कई अन्य प्रकार के शोध भी किये जा रहे हैं.

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