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झारखंड हाईकोर्ट ने कहा- बुजुर्ग सास की सेवा बहू का फर्ज, यह भारतीय संस्कृति का हिस्सा

Updated at : 24 Jan 2024 11:55 PM (IST)
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झारखंड हाईकोर्ट

झारखंड हाईकोर्ट

आदेश में प्रतिवादी संख्या-दो (पत्नी) को प्रति माह 30,000 रुपये तथा विपक्षी पक्ष संख्या-तीन (नाबालिग पुत्र) को प्रतिमाह 15,000 रुपये भुगतान करने का निर्देश दिया था.

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रांची : भारत में बुजुर्ग सास की सेवा करना बहू का फर्ज है. यह भारतीय संस्कृति का हिस्सा है. यह बात बुधवार को झारखंड हाइकोर्ट के जस्टिस सुभाष चंद की अदालत ने कही. इसके साथ ही अदालत ने पत्नी की ओर से वृद्ध सास की सेवा करने की सलाह दी और उनसे अलग रहने की अनुचित मांगों पर जोर नहीं देने को कहा. अदालत ने यजुर्वेद व मनुस्मृति के श्लोक का उदाहरण दिया . मनुस्मृति के श्लोकों का उदाहरण देते हुए अदालत ने कहा, जहां परिवार की महिलाएं दुखी होती हैं वह परिवार जल्द ही नष्ट हो जाता है.

जहां महिलाएं संतुष्ट रहती हैं वह परिवार हमेशा फलता-फूलता है. उक्त टिप्पणी अदालत ने एक पति की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए की. पति ने दुमका फैमिली कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की अदालत के आदेश को चुनौती दी थी. उक्त अदालत ने आदेश में प्रतिवादी संख्या-दो (पत्नी) को प्रति माह 30,000 रुपये तथा विपक्षी पक्ष संख्या-तीन (नाबालिग पुत्र) को प्रतिमाह 15,000 रुपये भुगतान करने का निर्देश दिया था.

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कोर्ट ने पाया-पत्नी ने स्वेच्छा से छोड़ा घर

अदालत ने कहा कि मौजूदा मामले में, पत्नी ने जून 2018 में ससुराल छोड़ मायके आ गयी थी. और उसके बाद महिला ने ससुराल जाने से इनकार कर दिया. पति ने न्यायिक अलगाव के लिए हिंदू विवाह अधिनियम की धारा-10 के तहत इसी आधार पर मुकदमा दायर किया था कि उसकी पत्नी को उसकी वृद्ध मां और नानी की सेवा करना पसंद नहीं था. वह उस पर उनसे अलग रहने का दबाव बनाती थी. दोनों पक्षों द्वारा प्रस्तुत मौखिक साक्ष्यों को सुनने के बाद अदालत ने पाया कि पत्नी ने स्वेच्छा से ससुराल छोड़ा था. उसके जाने का स्थापित कारण उसकी बुजुर्ग सास व नानी की देखभाल की जिम्मेदारी को पूरा करने में उसकी अनिच्छा थी. उसने अपने पति पर मां से अलग रहने का दबाव डाला, लेकिन उसे पति ने स्वीकार नहीं किया था.

नाबालिग पुत्र की भरण-पोषण राशि बढ़ायी

अदालत ने कहा कि यह तथ्य अच्छी तरह साबित हो चुका है कि पुनरीक्षणकर्ता (प्रार्थी) की मंशा भी स्पष्ट थी कि उसने तलाक के लिए नहीं, बल्कि न्यायिक अलगाव के लिए मुकदमा दायर किया था. क्योंकि, वह अपनी पत्नी को अपने साथ रखना चाहता था, लेकिन वह बिना किसी उचित कारण के अलग अपने मायके में रहने पर अड़ी थी. इसलिए सीआरपीसी की धारा-125 (4) के अनुसार, वह किसी भी भरण-पोषण की हकदार नहीं थी. वहीं, अदालत ने नाबालिग पुत्र के लिए भरण-पोषण की राशि 15,000 रुपये प्रति माह से बढ़ा कर 25,000 रुपये प्रति माह करने का आदेश पारित किया.

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