हेंदेगिर के किसानों ने 100 एकड़ बंजर भूमि को किया आबाद

राजधानी रांची से करीब 35 किलोमीटर दूर है ओरमांझी प्रखंड का हेंदेगिर गांव. यह राजस्व ग्राम पहाड़ों की तलहटी में बसा है. इसके आसपास कई टोले हैं. यहां की जमीन पथरीली है. नदी और नाले हैं. पांच साल पहले तक यहां के लोग खेती के बारे में सोचते भी नहीं थे.
मनोज सिंह (रांची). राजधानी रांची से करीब 35 किलोमीटर दूर है ओरमांझी प्रखंड का हेंदेगिर गांव. यह राजस्व ग्राम पहाड़ों की तलहटी में बसा है. इसके आसपास कई टोले हैं. यहां की जमीन पथरीली है. नदी और नाले हैं. पांच साल पहले तक यहां के लोग खेती के बारे में सोचते भी नहीं थे. युवा मजदूरी करने के लिए दूसरे राज्य में पलायन कर जाते थे. वहीं गांव के कई युवा 25-30 किलोमीटर दूर शहरों में जाकर मजदूरी करते थे. दूसरे के खेतों में काम करते थे. आज स्थिति बदल गयी है. गांव में करीब 100 एकड़ से अधिक बंजर जमीन को आबाद कर दिया गया है. अब यहां हरियाली नजर आती है. पूरा इलाका देखने में चाय बगान की तरह नजर आता है. यहां के युवा अब अपने खेतों में ही काम कर रहे हैं. महिलाओं को भी रोजगार मिल गया है. अभी 100 एकड़ से अधिक खेत पर तरबूज, खरबूज, कद्दू और खीरा लगा है. कई स्थानों पर लत्तरवाली सब्जियां लगी है. किसानों को अब कमाने के लिए बाहर जाने की चिंता नहीं है. किसानों ने अपना एक समूह तैयार किया है. किसान उत्पादक समूह (एफपीओ) का सालाना कारोबार 60 से 70 लाख रुपये हो गया है. बेदिया बहुल इस गांव में आधुनिक तकनीक से खेती हो रही है.
250 से 300 किसान जुड़े हैं समूह से :
2019 में यहां के किसानों ने समूह बनाना शुरू किया था. अभी इससे 250 से 300 किसान जुड़े हैं. पहले किसान अलग-अलग खेती करते थे. समूह बनाकर किसान खेती करने लगे तो सरकारी सहायता भी मिलने लगी. यहां कृषि विभाग की स्कीम का लाभ दिया गया है. किसानों को 90 फीसदी अनुदान पर ड्रिप इरिगेशन की सुविधा दी गयी. किसानों को मल्चिंग तकनीक बतायी गयी. खेतों में कीटनाशी और अन्य उपादानों के उपयोग की जानकारी दी गयी. कृषि विभाग के कांके के पूर्व बीटीएम प्रदीप सरकार बताते हैं कि शुरु में किसानों को एकजुट करना मुश्किल था. जब किसानों को एकजुट होकर काम करने के फायदे बताये गये तो एफपीओ बना. आज किसानों को विभाग की कई स्कीम का लाभ मिला है. गोवलकर एग्रोटेक के राजेश कुमार कहते हैं कि बंजर जमीन को उपजाऊ बनाना इतना आसान नहीं था. पूरी जमीन पत्थरीली है. शहर से दूर है. लेकिन, धीरे-धीरे युवाओं को एकजुट कर खेतों को बदला गया. पथरीली भूमि को ऊपजाऊ बनाया गया. आज कहानी कुछ और हो गयी है.पहले कुदाल लेकर काम खोजने जाते थे, आज व्यापारी यहां आते हैं :
किसान मोतीराम बेदिया कहते हैं कि मात्र 10 साल पहले गांव की स्थिति बहुत खराब थी. युवा काम के लिए कुदाल लेकर काम खोजने शहर जाते थे. आज दूसरे-दूसरे राज्य के व्यापारी यहां फल-सब्जी लेने आते हैं. यहां लांग प्लेटफॉर्म (एलपी) ट्रक लगते हैं. अभी सप्ताह में दो-तीन दिन ट्रक आता है. यहां से फल और सब्जी भेजी जा रही है. दो माह के बाद खेतों में फूलगोभी, शिमला मिर्च, टमाटर आदि लगाये जायेंगे. किसान सालों भर खेती कर रहे हैं. स्थिति बदल रही है. युवाओं को आज काम खोजने के लिए दूसरे राज्य या शहर जाने की जरूरत नहीं है.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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By Prabhat Khabar News Desk
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