मांदर सम्राट ने मछली मार कर की पढ़ाई

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 24 Jul 2016 8:09 AM

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अरविंद कुमार मिश्रा कला को भगवान की देन माना जाता है. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनमें एक साथ कई गुण होते हैं. वह गायक, वादक, नर्तक और अभिनेता हो सकता है. ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं मनपुरन नायक. झारखंडी लोक नृत्य में पारंगत मनपुरन के गीत भी लोगों को खूब भाते हैं. वह […]

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अरविंद कुमार मिश्रा
कला को भगवान की देन माना जाता है. कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनमें एक साथ कई गुण होते हैं. वह गायक, वादक, नर्तक और अभिनेता हो सकता है. ऐसे ही व्यक्तित्व के धनी हैं मनपुरन नायक. झारखंडी लोक नृत्य में पारंगत मनपुरन के गीत भी लोगों को खूब भाते हैं.
वह मांदर या झारखंड के अन्य वाद्य यंत्र बजाते हैं, तो लोग मुग्ध हो जाते हैं. उनकी स्वर लहरी से सोया अखरा भी जाग उठता है. मनपुरन अच्छे अभिनेता भी हैं.
20 जनवरी, 1957 को रांची के चुटिया गढ़ में जन्मे मनपुरन नायक को कला विरासत में मिली है. आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुके मनपुरन नायक का बचपन बेहद गरीबी में बीता. उनके पिता पेशेवर वादक थे. उनकी कमाई से दो जून की रोटी का जुगाड़ मुश्किल से हो पाता था.
प्राथमिक शिक्षा के लिए मनपुरन नायक को मछली मार कर पैसे का जुगाड़ करना पड़ा. फिर भी उन्होंने आर्थिक तंगी को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया. उन्होंने गरीबी से लड़ कर न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि गीत, संगीत और अभिनय के अपने जज्बे को भी नहीं मरने दिया. उनका जज्बा ही था कि आज वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सके.
आकाशवाणी केंद्र, रांची में वरीय उद्घोषक मनपुरन नायक कला की खान हैं. नाटक में अभिनय की बात हो, गीत गाना हो, नृत्य की बात हो या अभिनय की. वह हर विधा में दक्ष हैं. उन्होंने देश-विदेश में झारखंड की कला और संस्कृति को अलग पहचान दिलायी है.
झाॅलीवुड की फिल्मों में कर चुके हैं काम : कई कला में माहिर मनपुरन की पहचान मांदर वाक के रूप में है. उन्होंने झाॅलीवुड की कई फिल्मों में भी काम किया है. झारखंड की पहली फीचर फिल्म ‘सोना कर नागपुर’ में अभिनय किया. हिंदी फीचर फिल्म ‘आक्रांत’ और ‘सजना अनाड़ी’ में पार्श्व संगीत दिया. वह एक म्युजिक वीडियो फिल्म में सहायक निदेशक भी रहे. मनपुरन नायक ने रेडियो नाटक ‘अखरा निंदाय गेलक’, ‘अखरा’, ‘देरदाहा कर शेर’ व ‘पिपराहा भूत’ के साथ-साथ ‘सास से एहसास’ तक, ‘इंजोत डहर’ और बंगला नाटक ‘झाड़े वंशे’ का खुला मंचन भी किया है.
बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं मनपुरन: मनपुरन नायक में नायक के सभी गुण हैं. झारखंड के सभी लोक नृत्य जैसे पईका, मानभूम शैली छऊ, झूमर, नागपुरी, उरांव, मुंडारी, कुरमाली, घोड़ा-लाठी का खेल आदि में वह पारंगत हैं. इसी तरह से वह झारखंड के सभी वाद्य यंत्रों को न केवल बजा सकते हैं, बल्कि दूसरों को सिखाते भी हैं. वह मांदर, ढोलक, ढाक, भेइर, नगाड़ा, ट्रिपूल, थुंबा, नाल, ढेचका, झांझ और ड्रम सेट बड़ी कुशलता के साथ बजाते हैं. इन सभी के अलावा मनपुरन झारखंड की विभिन्न भाषाओं के लोक गीत भी गाते हैं.
झारखंड की कला को दिलायी अलग पहचान
मनपुरन नायक ने देश के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेशों में भी झारखंड की कला की प्रस्तुति दी है. झारखंड, बिहार के अलावा वह पश्चिम बंगाल, गुजरात, आंध्रप्रदेश, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और ओड़िशा में कार्यक्रम पेश कर चुके हैं. देश के अलावा मनपुरन ने वर्ष 1989 में मनीला (फिलीपींस) में ट्राइबल कल्चरल कॉन्फ्रेंस में प्रस्तुति दी. वर्ष 1992 में ताईवान में कल्चरल फेस्टिवल कार्यक्रम और वर्ष 1998 में कनाडा में डांस फेस्टिवल में हिस्सा लिया और देश के साथ-साथ झारखंड का भी नाम रोशन किया.
महज चार साल की उम्र में मनपुरन नायक को अपने पिता से छऊ नृत्य की शिक्षा मिली. पिता ने ही उन्हें वाद्ययंत्रों की भी शिक्षा दी. विवाह व अन्य कार्यक्रमों में वाद्य यंत्र बजाने मनपुरन अपने पिता के साथ जाते थे. धीरे-धीरे वह गाने, बजाने में पारंगत हुए.
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