समय रहते माता-पिता और बच्चे की Genetic जांच हो जाये, तो कोई नहीं बनेगा ‘किन्नर’

By Prabhat Khabar Digital Desk
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मिथिलेश झा

रांची : भारत में जेनेटिक रोगों के बारे में लोगों को बहुत कम जानकारी है. यही वजह है कि लोगों ने कई तरह की भ्रांतियां पाल रखी हैं. किन्नरों का जन्म भी ऐसी ही एक भ्रांति है. दरअसल, यह एक आनुवांशिक बीमारी है, जिसमें नवजात शिशु का जननांग असामान्य या अलग तरह का हो जाता है. समय रहते इसका पता चल जाये, तो इसका इलाज संभव है. डॉ मीनाक्षी बोथरा ने गुरुवार को ये बातें रांची स्थित रिम्स ऑडिटोरियम में कहीं.

झारखंड की राजधानी रांची स्थित राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) में आयोजित UMMID के लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए मीनाक्षी ने बताया कि आनुवांशिक रोग कई प्रकार के होते हैं. कुछ रेयर होते हैं, तो कुछ कॉमन. इसके बारे में लोगों को जागरूक करने की जरूरत है.

उन्होंने कहा कि कांजिनाइटल एड्रिनल हाइपरप्लेसिया (Congenital Adrenal Hyperplasia) एक ऐसा आनुवांशिक रोग है, जिसकी वजह से बच्चों का जननांग अलग तरह का दिखता है. फलस्वरूप लोग उन्हें ‘किन्नर’ नाम दे देते हैं. और अपने परिवार से बाहर कर देते हैं. उन्हें उनके जैसे अन्य लोगों के समूह में भेज देते हैं.

डॉ मीनाक्षी ने बताया कि समय रहते यदि मालूम हो जाये कि बच्चे को कांजिनाइटल एड्रिनल हाइपरप्लेसिया है, तो उसका इलाज हो सकता है. यह तभी संभव है, जब लोग जागरूक होंगे और बच्चे के जन्म से पहले और जन्म के तुरंत बाद जेनेटिक जांच करवायेंगे. उन्होंने कहा कि डीएनए से परिवार नहीं बनता, परिवार प्यार से बनता है.

दरअसल, कांजिनाइटल एड्रिनल हाइपरप्लेसिया 21-हाइड्रॉक्सीलेस की कमी से होने वाला ऑटोसोमल रिसेसिव विकार है, जो CYP21A2 जीन में परिवर्तन की वजह से होता है. इसमें कॉर्टिसोल और एल्डोस्टेरोन सिंथेसिस में अजीब सी विकृति आ जाती है. इससे प्रभावित महिलाओं में जन्म के समय उनका जननांग अस्पष्ट रह जाता है.

इन परिस्थितियों में तत्काल जांच कराने की जरूरत है. प्रभावित मरीज और उसके परिवार की जेनेटिक हिस्ट्री का अध्ययन बहुत जरूरी हो जाता है. जांच के बाद उस परिवार की जेनेटिक काउंसलिंग की जाती है, ताकि भविष्य में वे बच्चे पैदा करने से पहले जरूरी जांच करवा लें.

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