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ranchi

  • Oct 10 2019 3:21PM
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जेनेटिक रोगों से निजात दिलायेगी जांच और जागरूकता, रांची में बोले अर्जुन मुंडा

जेनेटिक रोगों से निजात दिलायेगी जांच और जागरूकता, रांची में बोले अर्जुन मुंडा

रांची : जांच और जागरूकता से जेनेटिक बीमारियों को जड़ मिटाने का भारत सरकार ने संकल्प लिया है. इसी संकल्प के तहत भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग के डिपार्टमेंट ऑफ बायो टेक्नोलॉजी (डीबीटी) ने रांची के रिम्स में UMMID (Unique Methods of Management of Inherited Disorders Programme) की शुरुआत की है. इस कार्यक्रम के तहत आनुवांशिक रोगों (Genetic Diseases) की जांच और इलाज के लिए देश भर के सरकारी अस्पतालों में ‘निदान केंद्र’ (Nidan Kendra) खोले जायेंगे. इसके लिए केंद्र सरकार ने 117 जिलों का चयन किया है, जिसमें 93 आदिवासी बहुल जिले हैं. इन्हीं जिलों में आनुवांशिक रोगों के सबसे ज्याद मरीज पाये जाते हैं. दिल्ली के बाद रांची में गुरुवार (10 अक्टूबर, 2019) को दूसरे केंद्र की शुरुआत की गयी. झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (RIMS) के ऑडिटोरियम में आयोजित इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम की शुरुआत जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री (Minister of Tribal Affairs) और झारखंड (Jharkhand) के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा (Arjun Munda) ने की.

इस अवसर पर श्री मुंडा ने कहा कि आकांक्षी जिला रांची के लिए यह महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है. इसे सफल बनाने का दायित्व झारखंड के डॉक्टरों, चिकित्साकर्मियों और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों पर है. इसके लिए स्वास्थ्य विभाग के आंतरिक प्रबंधन को बहुत मजबूत बनाना होगा. हम मिलकर किसी भी समस्या को खत्म कर सकते हैं. आनुवांशिक रोगों को भी जड़ से मिटा सकते हैं. लेकिन, यह इलाज से संभव नहीं है. यह जनभागीदारी और जन-जागरूकता से ही संभव है. श्री मुंडा ने कहा कि रिम्स के डॉक्टरों को इस कार्यक्रम को सफल बनाने की जिम्मेवारी लेनी होगी. उन्हें इलाज की औपचारिकता पूरी करने की बजाय संवेदनशीलता के साथ काम करना होगा. वह अपने पेशे को सिर्फ नौकरी न समझें, अपनी जिम्मेवारी समझें. डॉक्टरों का पेशा बहुत पवित्र है. आपको ही इस कार्यक्रम को सफल बनाना है.’

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केंद्रीय मंत्री ने उम्मीद जतायी कि रिम्स के डॉक्टर ‘UMMID’ कार्यक्रम के लिए आकांक्षी जिला के रूप में चुनी गयी रांची को मॉडल जिला के रूप में स्थापित करेंगे. इसमें वह (अर्जुन मुंडा) भी उनकी मदद करेंगे. श्री मुंडा ने कहा कि उनका मंत्रालय 43 विभागों की योजनाओं की समीक्षा करता है. इसलिए सबसे ज्यादा आंकड़े वह उपलब्ध करा सकते हैं और इसकी मदद से राज्य के डॉक्टर और अधिकारी सुदूरवर्ती क्षेत्रों की समस्याओं को दूर कर सकते हैं. श्री मुंडा ने कहा कि जितना सशक्त डेटाबेस होगा, उतने ही कारगर तरीके से हम योजनाओं को लागू कर पायेंगे. योजना को सफल बना पायेंगे.

जड़ से मिटा सकते हैं जेनेटिक रोगों को

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि जेनेटिक रोगों को जड़ से मिटाया जा सकता है. इसलिए लोगों को जागरूक करना होगा. वायरस से फैलने वाली बीमारी के लिए टीका है, लेकिन आनुवांशिक रोगों की रोकथाम के लिए कोई टीका नहीं है. इसका इलाज कराना सबके बूते की बात नहीं. इसलिए जरूरी है कि लोगों को जागरूक करें. सुदूर गांवों में भी युवाओं को आनुवांशिक रोगों के बारे में जानकारी दें. मैट्रिक-इंटर की पढ़ाई कर रहे बच्चों को इसके बारे में बताना होगा, तभी सरकार का उद्देश्य सफल होगा. उन्होंने कहा कि जो चीजें स्वत: आपके शरीर में आ जाती हैं, वह खतरनाक हैं, घातक हैं. इसलिए इसकी रोकथाम बेहद जरूरी है. उन्होंने कहा कि जहां उम्मीद नहीं है, वहां जीवन नहीं है. सभी अपने परिवार को सुखी देखना चाहता है. परिवार की प्रगति ही सबसे बड़ी उम्मीद होती है. उन्होंने कहा कि लोगों की उम्मीदों को पूरा करना ही UMMID का उद्देश्य है.

मिशन मोड में खत्म करना है आनुवांशिक रोगों को : डॉ निनावे

भारत सरकार के बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट की सलाहकार डॉ शुचिता निनावे ने डॉक्टरों को संबोधित करते हुए कहा कि आनुवांशिक रोगों को खत्म करने के लिए मिशन मोड में इस कार्यक्रम को चलाना होगा. उन्होंने कहा कि 5 अस्पतालों में निदान केंद्र खोले जायेंगे. एक निदान केंद्र नयी दिल्ली में 23 सितंबर को खोला गया. रांची में दूसरा केंद्र खोला जा रहा है. इनमें हर साल 10 हजार गर्भवतियों और 5,000 नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग होगी. उन्होंने कहा कि UMMID कार्यक्रम के तहत इस योजना का पूरा फंड सीधे सरकारी अस्पतालों को जायेगा. डॉ निनावे ने यह भी बताया कि नयी दिल्ली स्थित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज मुख्य ट्रेनिंग सेंटर होगा. अगले चरण में देश के 117 आकांक्षी जिलों में निदान केंद्र खोले जायेंगे. दो-तीन साल के भीतर पूरे देश में ऐसे केंद्र खुल जायेंगे.

ईश्वर का अभिशाप नहीं है आनुवांशिक रोग : डॉ कुलकर्णी

स्वास्थ्य विभाग के सचिव डॉ नितिन मदन कुलकर्णी ने इस अवसर पर कहा कि आनुवांशिक रोग ईश्वर की देन नहीं है. यह ईश्वर का अभिशाप भी नहीं है. समय रहते इसकी जांच हो जाये, तो इस अभिशाप से मुक्ति पाया जा सकता है. उन्होंने उम्मीद जतायी की झारखंड में UMMID कारगर होगा. उन्होंने कहा कि समय रहते यदि स्क्रीनिंग नहीं हुई, तो सिकल सेल एनीमिया या थैलेसीमिया जैसी बीमारी के लक्षण सामने आने तक इलाज के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता. उन्होंने बताया कि गुमला में एक कार्यक्रम की शुरुआत हुई है. इसके तहत सुदूर गांवों में महिलाओं की जांच की जा रही है. 70 महिलाओं की जांच की गयी, जिसमें 10 में थैलेसीमिया के लक्षण पाये गये हैं.

डॉ कुलकर्णी ने कहा कि हाई रिस्क वाले लोगों को चिह्नित करना होगा. उनका उचित इलाज करना होगा. सिस्टम एक बड़ी समस्या है. प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों के साथ-साथ शिशु रोग विशेषज्ञों को जिम्मेवारी लेनी होगी कि वे इस गंभीर समस्या से लोगों को निजात दिलायेंगे. उन्हें गर्व करना होगा कि वे इतिहास रचने जा रहे हैं. वे ऐसा कर पायेंगे, तभी इस कार्यक्रम को वास्तव में सफल बना पायेंगे.

निकट संबंधी से विवाह से उत्पन्न संतान को खतरा ज्यादा : डॉ मीनाक्षी

रिम्स की डॉक्टर अनुपा प्रसाद ने सीएमइ के उद्देश्यों के बारे में बताया, तो डॉ मीनाक्षी बोथरा ने आनुवांशिक रोगों के मामले में भारत की स्थिति पर विस्तार से जानकारी दी. पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन के जरिये डॉ मीनाक्षी ने आनुवांशिक रोगों के दुष्प्रभावों के बारे में भी जानकारी दी. उन्होंने एक अध्ययन के हवाले से बताया कि वर्ष 2014 से 2018 के बीच 70 अस्पतालों के आंकड़े बताते हैं कि 1000 में 105 बच्चों में आनुवांशिक बीमारियां पायीं गयीं. इसमें जन्म के साथ शिशु की मृत्यु और गर्भपात के मामलों को शामिल नहीं किया गया है. यह आंकड़ा बताता है कि भारत में स्थिति कितनी भयावह है. डॉ मीनाक्षी ने कहा कि कुछ बच्चों की बीमारियां शरीर में दिख जाती हैं, लेकिन बहुत से बच्चों के मामले में जब तक लक्षण सामने आते हैं, बहुत देर हो चुकी होती है. उनके मुताबिक, भारत में 15 फीसदी किशोर और 30 फीसदी बच्चे आनुवांशिक रोगों से पीड़ित हैं.

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डॉ मीनाक्षी बोथरा ने कहा कि निकट संबंधी (Blood Relation) से विवाह करने वालों के बच्चों में आनुवांशिक रोगों का खतरा ज्यादा होता है. यदि मां की जीन में कोई समस्या है, तो 50 फीसदी चांस है कि उसके बच्चे में आनुवांशिक रोग हो सकता है. यदि मां और पिता दोनों के जीन में समस्या है, तो बच्चे को थैलीसेमिया, सिकल सेल जैसे रोग हो सकते हैं. उन्होंने बताया कि भारत में हर साल 2.7 करोड़ बच्चे जन्म लेते हैं. इनमें से 20 फीसदी में मल्टीफैक्टोरल जेनेटिक डिसऑर्डर पाया जाता है. यानी ऐसे बच्चों में मोटापा और दिल की बीमारी जैसी गंभीर आनुवांशिक बीमारी का खतरा होता है.

बच्चों को रोग दे सकती हैं अधिक उम्र में मां बनने वाली महिला

डॉ मीनाक्षी ने बताया कि जितनी अधिक उम्र में महिला बच्चे को जन्म देगी, उसके शिशु के आनुवांशिक रोगों से पीड़ित होने की संभावना उतनी ही ज्यादा होगी. रिपोर्ट्स के हवाले से उन्होंने बताया कि 20 से 24 साल की उम्र में जो युवतियां गर्भधारण करती हैं, उनसे जन्म लेने वाले 1183 में से एक बच्चे को आनुवांशिक रोग हो सकता है. वहीं, 40 या उससे अधिक वर्ष की उम्र में मां बनने वाली 63 में एक महिला का बच्चा आनुवांशिक रोग से पीड़ित पाया गया है. बीटा थैलेसीमिया और सिकल सेल थैलेसीमिया जैसी बीमारी झारखंड में चरम पर है. देश में 4-5 फीसदी बच्चों में यह रोग पाया जाता है, जबकि झारखंड में यह 8-10 फीसदी है.

उम्मीद पर दुनिया कायम : सारिका मोदी

सारिका मोदी ने पैरेंट्स सपोर्ट ग्रुप के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि इनबोर्न एरर्स ऑफ मेटाबोलिजस्म (Inborn Errors of Metabolism) के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि मेटाबोलिज्म से जुड़ी 500 से ज्यादा बीमारियां हैं. इनके लिए विशेष आहार की जरूरत होती है, जो विदेशों से मंगानी पड़ती है. सरकार को ऐसे उत्पादों के आयात पर टैक्स में छूट देना चाहिए, ताकि जरूरतमंद लोगों को यह कम कीमत पर उपलब्ध कराया जा सके. सारिका मोदी ने इसकी शुरुआती जांच पर जोर देने की बात कही. कहा कि सभी बड़े अस्पतालों में रेयर डिजीज सेंटर होने चाहिए. ऐसी बीमारियों का पंजीकरण होना चाहिए, ताकि उसके विश्वसनीय आंकड़े उपलब्ध हो सकें. उसके आधार पर उन बीमारियों से निबटने की रणनीति बनायी जा सकेगी.

इतना ही नहीं, सारिका मोदी ने गंभीर आनुवांशिक रोगों से पीड़ित परिवारों के लिए टैक्स छूट की भी मांग की. कहा कि लाइफ सेविंग ड्रग्स को जीएसटी से छूट मिलनी चाहिए. अस्पतालों में पुनर्वास केंद्र खोले जाने चाहिए, आनुवांशिक रोगों से पीड़ित लोगों के लिए अलग ओपीडी खोले जाने चाहिए. श्रीमती मोदी ने कहा कि स्कूलों में शिक्षकों को ऐसे बच्चों के प्रति संवेदनशीलता बरतने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत को ‘लैंड ऑफ क्योर’ कहा जाता है. हम किसी भी बीमारी से लड़ सकते हैं.

24 से 28 घंटे के बीच जरूरी है जांच : डॉ भावना धींगड़ा

भोपाल से आयीं डॉ भावना धींगड़ा ने नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग के महत्व पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि शिशु के जन्म के 24 घंटे बाद और 48 घंटे बीतने से पहले उसकी स्क्रीनिंग हो जानी चाहिए. न 24 घंटे से पहले, न 48 घंटे के बाद. उन्होंने कहा कि बड़ी संख्या में कांजिनाइटल हर्ट डिजीज के साथ बच्चे जन्म ले रहे हैं. यदि 48 घंटे के अंदर उनकी स्क्रीनिंग नहीं हुई, तो पूरी तरह सही रिपोर्ट नहीं आयेगी. उन्होंने जांच के तरीकों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी. डॉ भावना ने बताया कि 5 से 15 फीसदी बच्चों को एसएनसीयू में भर्ती कराया जाता है. यदि इनकी स्क्रीनिंग नहीं की गयी, तो इन्हें सेरेब्रल पाल्सिया हो सकता है. यहां तक कि बच्चे की मृत्यु भी हो सकती है.

प्रेग्नेंसी के तीसरे महीने करा लें पहली स्क्रीनिंग : डॉ सीमा कपूर

डॉ सीमा कपूर ने कहा कि टीकाकरण से बेहतर है नीयोनेटल स्क्रीनिंग. हर गर्भवती को गर्भधारण के तीसरे महीने में पहली जांच करा लेनी चाहिए. उन्होंने बताया कि कई ऐसी आनुवांशिक बीमारियां भी हैं, जो माता-पिता में नहीं हो, फिर भी बच्चे को हो सकती है. इसलिए जांच जरूरी है. उन्होंने इस बात पर खुशी जाहिर की कि UMMID की शुरुआत झारखंड की राजधानी रांची से हो रही है.

रिम्स में जेनेटिक डिपार्टमेंट का सपना : डॉ अमर वर्मा

रिम्स के वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ और जेनेटिक सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ अमर वर्मा ने इस अवसर पर कहा कि आनुवांशिक रोगों की रोकथाम आसान है, इसका इलाज बेहद मुश्किल और खर्चीला. उन्होंने कहा कि शिशु मृत्यु दर को यदि रोकना है, तो आनुवांशिक रोगों की रोकथाम सबसे ज्यादा जरूरी है. डॉ वर्मा ने कहा कि एक बार उनके पास आनुवांशिक रोग से पीड़ित एक ऐसा बच्चा आया, जिसके माता-पिता ने सारी उम्मीदें छोड़ दी थी. लेकिन, इलाज से बच्चा जीवित है. उन्होंने नौकरशाही की सोच पर भी सवाल उठाये.

डॉ वर्मा ने कहा कि एक बार एक आइएएस अधिकारी ने उनसे कहा था कि झारखंड में आनुवांशिक रोगों पर काम करके अपना जीवन क्यों बर्बाद कर रहे हैं. इस मामले में कुछ नहीं हो सकता. ऐसे रोगियों का ईश्वर ही मालिक है. बाद में इस विभाग को मिलने वाले पैसे टीबी रोगों की रोकथाम के लिए दे दिये गये. डॉ वर्मा ने आनुवांशिक रोगों की समस्या और उसकी स्क्रीनिंग की जरूरत को समझने के लिए स्वास्थ्य सचिव डॉ नितिन मदन कुलकर्णी का शुक्रिया अदा किया.

रिम्स की को-प्रिंसिपल डॉ अनुभा विद्यार्थी ने ‘अभिभावकों की जांच : समय की जरूरत’ के बारे में विस्तार से जानकारी दी. उन्होंने बताया कि कुछ खास जातियों में आनुवांशिक बीमारियां ज्यादा पायी जाती हैं. डॉ विद्यार्थी ने आयरन के ओवरलोड से सुरक्षा की जरूरत भी बतायी. लायंस क्लब के सोमनाथ ने कहा कि वह इस बीमारी के बारे में सुदूरवर्ती आदिवासी बहुल गांवों में जागरूकता फैलायेंगे और देश के भविष्य को गंभीर रोगों से बचायेंगे. इस अवसर पर सभी अतिथियों को सम्मानित किया गया. रांची की वरिष्ठतम स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ शोभा चक्रवर्ती और सॉफ्टवेयर डेवलपर कमल पॉल को विशेष रूप से सम्मानित किया गया.

रिम्स के निदेशक डॉ डीके सिंह ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि 10.10.2019 को कार्यक्रम की शुरुआत हो रही है. अगले साल यानी 10.10.2020 को जरूर हम 20 हो जायेंगे. कई विभाग खुलेंगे और सुपर स्पेशियलिटी डिपार्टमेंट भी चालू हो जायेंगे. इस अवसर पर डॉ दिलीप कुमार झा समेत भारी संख्या में रिम्स के डॉक्टर, छात्र-छात्राओं के अलावा पारा मेडिकल स्टाफ भी उपस्थित थे. कार्यक्रम की शुरुआत सरस्वती वंदना से हुई, तो समाप्ति गणेश वंदना और शिवतांडव स्तोत्र पर नृत्य के साथ.

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