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ranchi

  • Sep 30 2019 11:47AM
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रांची के रिम्स में जन्म के साथ ही शुरू हो जायेगा जन्मजात आनुवांशिक रोगों का इलाज

रांची के रिम्स में जन्म के साथ ही शुरू हो जायेगा जन्मजात आनुवांशिक रोगों का इलाज
डॉ अमर वर्मा.

मिथिलेश झा

रांची : झारखंड की राजधानी रांची में अब जन्मजात आनुवांशिक रोगों (Genetic Diseases) का इलाज जन्म के साथ ही शुरू हो जायेगा. इसके लिए एक विशेष केंद्र बनने जा रहा है. यह सुविधा देश के मात्र दो अस्पतालों में शुरू होने वाला है, जिसमें एक केंद्र रांची (Ranchi) के रिम्स (RIMS) में खुलेगा. अक्टूबर महीने में इस केंद्र के पूरी तरह से फंक्शनल हो जाने की उम्मीद है. एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट्स - डीबीटी उम्मीद - ‘यूनिक मेथड्स ऑफ मैनेजमेंट ऑफ इनहेरिटेड डिस्ऑर्डर्स’ प्रोग्राम (Unique Methods of Management of Inherited Disorders Programme) के तहत एंटीनेटल स्क्रीनिंग एंड न्यूबोर्न स्क्रीनिंग (Antenatal Screening and Newborn Screening) की शुरुआत हो जायेगी. इस कार्यक्रम के तहत बच्चे के जन्म के पहले और जन्म के बाद तमाम आनुवांशिक रोगों की जांच की जायेगी. किसी भी बीमारी का लक्षण पाये जाने पर उसका इलाज भी तत्काल शुरू कर दिया जायेगा. वह भी मुफ्त में.

रांची के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ अमर वर्मा ने prabhatkhabar.com को बताया कि भारत में आनुवांशिक रोगों (Genetic Diseases) पर बहुत देर से काम शुरू हुआ, लेकिन बहुत तेजी से काम हुआ है. 30 से 33 आनुवांशिक रोगों का हम बच्चे के जन्म के पहले पता कर सकते हैं. क्रिटनीन की कमी से होने वाली लाइलाज बीमारी रही डाउन सिंड्रोम की बात करें, तो गर्भधारण के 11वें सप्ताह में इसका पता लगा सकते हैं. ट्राइसोमिक21 की वजह से इस बीमारी से पीड़ित बच्चे चीनी (Chinese) बच्चों जैसे दिखते हैं. अब इस बीमारी का इलाज संभव है.

डॉ वर्मा ने बताया कि भारत में आनुवांशिक रोगों के बारे में लोगों को जागरूक होने की जरूरत है. रिम्स में रिसर्च प्रोजेक्ट के तहत जेनेटिक बीमारियों का इलाज हो रहा है. हालांकि, यहां कुछ समस्याएं हैं. टेस्ट किट के अलावा पारा मेडिकल स्टाफ की भी कमी है. बावजूद इसके इस विषय पर काम हो रहा है. जेनेटिक बीमारियों के बिहार-झारखंड के एकमात्र विशेषज्ञ डॉक्टर और रिम्स के प्रोफेसर डॉ वर्मा कहते हैं कि सरकार और स्वास्थ्य विभाग मदद करे, तो रिम्स में जेनेटिक रोगों की पढ़ाई शुरू की जा सकती है. उन्होंने कहा कि वर्तमान स्वास्थ्य सचिव इस विषय पर थोड़ा गंभीर हैं. इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में जेनेटिक्स पर रिम्स में कुछ काम शुरू होगी.

डॉ वर्मा ने इस बात पर संतोष जताया कि भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी की मदद से रिम्स में ‘एंटीनेटल स्क्रीनिंग एंड न्यूबोर्न स्क्रीनिंग सेंटर’ की शुरुआत होने वाली है. दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के अलावा सिर्फ रिम्स में यह सेंटर खुल रहा है. इस योजना के तहत रिम्स में जन्म से पहले और जन्म के बाद नवजात शिशुओं की आनुवांशिक बीमारियों से जुड़े सभी टेस्ट कर लिये जायेंगे. जांच और इलाज मुफ्त में होगा. डॉ वर्मा ने बताया कि कांजिनाइटल थायरॉयडिज्म, कंजिनाइटल एड्रिनल हाइपरप्लेसिया और बायोटिनीडेस डिफिसिएंसी जैसे गंभीर आनुवांशिक रोगों की जांच और इलाज शामिल हैं. डॉ वर्मा के मुताबिक, आनुवांशिक रोग खान-पान से भी जुड़ा है. शाकाहार अपनाकर इन रोगों से बचा जा सकता है.

हर 5 सेकेंड में होती है एक बच्चे की मौत

युनाइटेड नेशंस इंटर एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मॉर्टलिटी इस्टिमेशन (UNIGME) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2017 में भारत में 8 लाख से ज्यादा शिशुओं की मौत हो गयी, जबकि 1,52,000 ऐसे बच्चों की मौत हो गयी, जिनकी उम्र 5-14 साल थी. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) के अनुसार, वर्ष 2017 में विश्व में ऐसे कुल 60 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत हो गयी, जिनकी उम्र 15 साल से कम थी. इनमें 50.4 लाख ऐसे बच्चे थे, जिनकी उम्र 5 साल से भी कम थी. इन आंकड़ों के अनुसार, विश्व में हर 5 सेकेंड 15 साल से कम उम्र का एक बच्चा मर जाता है. इनमें से आधे से अधिक मौतों का कारण जेनेटिक बीमारियां होती हैं.

क्या है जेनेटिक डिस्ऑर्डर

कई बीमारियां ऐसी होती हैं, जो शिशु के पैदा होने से पहले ही मां-बाप द्वारा उसे मिल जाती हैं. इन्हीं बीमारियों को अनुवांशिक बीमारियां या जेनेटिक डिस्ऑर्डर कहा जाता है. थैलेसीमिया, सिकल सेल, हार्ट अटैक आदि के अलावा डायबिटीज, मोटापा, खून की बीमारियां, दिल की बीमारियां, आंख की बीमारियां, मिर्गी, कैंसर आदि ऐसे विकार हैं, जो जन्म से पहले ही शिशु में मां-बाप के जींस द्वारा प्रवेश कर सकते हैं.

दरअसल, मां के गर्भ में जब शिशु का विकास हो रहा होता है, तभी मां-बाप के जींस (Genes) के द्वारा ये बीमारियां शिशु के जींस में पहुंच जाती हैं. कई शिशुओं में अनुवांशिक बीमारियों के लक्षण वयस्क होने या अधेड़ होने के बाद दिखते हैं, जबकि कुछ बच्चों में ये जन्म के 1-2 साल बाद ही दिखना शुरू हो जाते हैं. इन बीमारियों से बचाव के लिए जरूरी है कि प्रेग्नेंसी के दौरान हर महिला जेनेटिक टेस्ट करवाये.

जेनेटिक बीमारियां और उसका असर

जब कोई बच्चा जन्म लेता है, तो उसमें दो तरह की जीन्स पाई जाती हैं, एक जीन मां से आता है और एक जीन पिता से. ये जीन्स ही बच्चे का रूप, रंग, व्यवहार और नैन-नक्श तय करते हैं. इन जीन्स के साथ कई बार मां-बाप के शरीर में मौजूद बीमारियां भी शिशु के शरीर में प्रवेश कर जाती हैं. इन्हें ही अनुवांशिक विकार या जेनेटिक डिसआर्डर कहते हैं. कई ऐसे जेनेटिक लक्षण और बीमारियां होती हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती हैं. शोधों के अनुसार पिता की बीमारियां या उसके परिवार में चली आ रही बीमारियों का होने वाले शिशु पर ज्यादा प्रभाव पड़ता है. इन बीमारियों के कारण पैदा होने से पहले ही शिशु को जिंदगी के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है.

कब जरूरी है जेनेटिक टेस्ट

डॉ अमर वर्मा कहते हैं कि उन मामलों में जेनेटिक टेस्ट जरूरी है, जहां किसी एक साथी में कोई जेनेटिकल (वंशानुगत) बीमारी है, परिवार में आनुवांशिक बीमारियों का इतिहास है, गर्भावस्था के समय मां के साथ कुछ बुरा घटा है या महिला के पहले के बच्चों में कुछ जन्मजात विसंगतियां पायी गयी हैं. इसके अलावा जेनेटिक टेस्ट उन महिलाओं के लिए भी जरूरी है, जो देर से (आमतौर पर 30-35 साल के बाद) गर्भधारण करती हैं.

कई आनुवांशिक रोगों से बचाता है शाकाहार

दुनिया भर में इस बीमारी पर शोध हो रहे हैं. अभी हाल ही में एक शोध सामने आया है, जिसमें कहा गया है कि भारतीय आहार आनुवांशिक बीमारियों को मात दे सकता है. जर्मनी की ल्यूबिक यूनिवर्सिटी में हुए इस शोध ने स्पष्ट किया है कि आनुवांशिक बीमारियों का मुख्य कारक केवल डीएनए में गड़बड़ी नहीं है. आहार की वजह से भी कई बीमारियां होती हैं. उचित आहार कई रोगों को नियंत्रित कर सकता है. ‘नेचर’ के ताजा अंक में प्रकाशित यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर राॅल्फ लुडविज के शोध में रूस के डॉ अर्तेम वोरोवयेव, इस्राइल की डॉ तान्या शेजिन और भारत के डॉ यास्का गुप्ता शामिल थे.

हाइ कैलोरी आहार से बढ़ता है आनुवांशिक रोगों का खतरा

वैज्ञानिकों ने चूहों पर दो साल के शोध के बाद निष्कर्ष दिया कि पश्चिमी देशों के हाइ कैलोरी आहार आनुवांशिक (जेनेटिक) माने जाने वाले रोगों को बढ़ाते हैं. वहीं, भारतीय उपमहाद्वीप के लो कैलोरी आहार रोगों से बचाते हैं. शोध के नतीजे बताते हैं कि पश्चिमी देशों में पिज्जा, बर्गर जैसे फास्ट फूड आनुवांशिक रोगों को उभारते हैं. वहीं, भारत का शाकाहारी आहार स्टार्च, सोयाबीन तेल, दाल-चावल, सब्जी और विशेषकर हल्दी का इस्तेमाल इन रोगों से शरीर की रक्षा करता है.

चूहे पर जर्मनी में हुआ हालिया प्रयोग

शोधकर्ताओं ने चूहों के उस समूह पर प्रयोग किया, जो ल्यूपस नामक रोग से ग्रसित थे. ल्यूपस रोग का सीधा संबंध डीएनए से है. ल्यूपस ऑटोइम्यून रोग की श्रेणी में आता है और इसमें शरीर का प्रतिरोधक तंत्र अपने ही अंगों पर प्रहार करता है. इससे शरीर के विभिन्न अंग व विभिन्न प्रणालियों जैसे जोड़ों, किडनी, दिल, फेफड़े, ब्रेन व ब्लड सेल नष्ट होने लगते हैं. चूहों के दो समूहों में एक को ज्यादा सूक्रोज वाला आहार दिया गया, जैसा पश्चिमी देशों में लिया जाता है. दूसरे समूह को लो कैलोरी वाला नियंत्रित आहार दिया गया, जैसा भारतीय उपमहाद्वीप में लोग लेते हैं. पहले समूह के चूहे ल्यूपस रोग की चपेट में आ गये और उनकी हालत गंभीर हो गयी, जबकि दूसरे समूह के चूहे, जिन्हें लो कैलोरी डाइट दी गयी थी, वे ल्यूपस रोग से ग्रसित होने से बच गये.

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