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देश के 22 में 12 लॉ कॉलेज कर रहे हैं कानून का उल्लंघन, जानें क्या है झारखंड का हाल

Updated at : 05 Sep 2019 2:13 PM (IST)
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देश के 22 में 12 लॉ कॉलेज कर रहे हैं कानून का उल्लंघन, जानें क्या है झारखंड का हाल

रांची : देश के अधिकतर लॉ कॉलेज सरकारी नियम का पालन नहीं करते. खासकर नि:शक्तों या दिव्यांगों को उनका अधिकार देने के मामले में. उन्हें एडमिशन देने के मामले में. वर्ष 2017 में सेंटर फॉर डिजेबिलिटी स्टडीज एंड हेल्थ लॉज (CDHSL) ने कहा कि देश के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) में नि:शक्तों को 5 फीसदी […]

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रांची : देश के अधिकतर लॉ कॉलेज सरकारी नियम का पालन नहीं करते. खासकर नि:शक्तों या दिव्यांगों को उनका अधिकार देने के मामले में. उन्हें एडमिशन देने के मामले में. वर्ष 2017 में सेंटर फॉर डिजेबिलिटी स्टडीज एंड हेल्थ लॉज (CDHSL) ने कहा कि देश के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (NLUs) में नि:शक्तों को 5 फीसदी आरक्षण के नियमों का पालन नहीं होता. एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि देश के 22 विधि संस्थानों में सिर्फ 9 में नि:शक्तता से जुड़े कानून का पूरी तरह पालन किया जाता है, जबकि 12 में सीटें आरक्षित की गयी हैं.

इस विषय पर अध्ययन करने वाले लखनऊ के एक लॉ स्टूडेंट ने कहा है कि देश के अलग-अलग भागों में स्थापित इन 22 संस्थानों की जिम्मेदारी है कि वे देश को श्रेष्ठ वकील दें. कानून के विशेषज्ञ देने की जिन संस्थानों पर जिम्मेदारी है, यदि वही नि:शक्तों के साथ भेदभाव करेंगे, उनके अधिकार उन्हें नहीं देंगे, तो ऐसे संस्थानों की स्थापना का उद्देश्य अधूरा रह जायेगा.

ज्ञात हो कि सरकार से अनुदान पाने वाले सभी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए राइट्स ऑफ परसंस विद डिजेबिलिटीज एक्ट, 2016 के तहत दिव्यांगों के लिए 5 फीसदी सीटें आरक्षित रखने और एडमिशन में कम से कम 5 साल की रियायत देने का प्रावधान है. 2016 के कानून ने इक्वल अपॉर्च्यूनिटीज, प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एंड फुल पार्टिसिपेशन एक्ट 1995 की जगह ली थी, जिसके सेक्शन 32 में उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान है. यह नियम सरकारी अनुदान पाने वाले सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होता है.

नि:शक्तों के अधिकारों के लिए काम करने वाले समूहों की एक याचिका पर कोर्ट ने 1995 के एक्ट को वर्ष 2016 के कानून से बदल दिया, क्योंकि 1995 के कानून में सिर्फ 3 फीसदी आरक्षण का प्रावधान था और इसका भी खुल्लमखुल्ला उल्लंघन हो रहा था. डिजेबल्ड राइट्स ग्रुप व अन्य बनाम भारत सरकार के एक केस में कोर्ट ने यह आदेश दिया. वर्ष 2016 के संशोधित कानून में आरक्षण की सीमा 3 फीसदी से बढ़ाकर 5 फीसदी कर दी गयी.

इस कानून के अस्तित्व में आने के एक साल बाद उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्र शशांक पांडे ने एक अध्ययन किया. आंकड़ों पर गौर करने के बाद शशांक पांडे ने पाया कि 22 में से सिर्फ 9 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों ने दिव्यांगों को आरक्षण देने के नियमों का पालन किया. इसे समझने के लिए उन्होंने 22 विश्वविद्यालयों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया.

पहली श्रेणी में उन विश्वविद्यालयों को रखा गया, जिन्होंने सिर्फ आरक्षण के लिए प्रतिशत का जिक्र किया है. दूसरी श्रेणी में वे विश्वविद्यालय हैं, जिन्होंने सिर्फ आरक्षित सीटों का जिक्र किया है. वहीं, तीसरी श्रेणी के जो विश्वविद्यालय हैं, उन्होंने आरक्षण का प्रतिशत और सीट की संख्या स्पष्ट रूप से बतायी है. पहली श्रेणी में 10 विधि विश्वविद्यालय हैं, जिनके नाम राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (जोधपुर), हिदायतुल्लाह नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (रायपुर), गुजरात नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (गांधीनगर), डॉ राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (लखनऊ), चाणक्य लॉ यूनिवर्सिटी (पटना), नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज (कोच्चि), दामोदरम संजीवैया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (विशाखापत्तनम), महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (मुंबई), महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (नागपुर), महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (औरंगाबाद) और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (दिल्ली) हैं.

इनमें से डॉ राम मनोहर लोहिया नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी और महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (मुंबई) वर्ष 2016 के एक्ट का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन कर रहे हैं. इन सभी विश्वविद्यालयों ने नि:शक्तों के लिए सिर्फ 3 फीसदी आरक्षण का प्रावधान कर रखा है. 10 में से सिर्फ तीन विश्वविद्यालय नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एडवांस्ड लीगल स्टडीज, महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (नागपुर) और महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (औरंगाबाद) कानून का पूरी तरह पालन कर रहे हैं. इन विश्वविद्यालयों में नि:शक्तों के लिए 5 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की गयी है. बाकी के सभी सात विधि विश्वविद्यालय पूरी तरह से कानून का उल्लंघन कर रहे हैं.

शशांक पांडे ने अपने अध्ययन के आधार पर कहा है कि मुंबई, औरंगाबाद के विधि विश्वविद्यालयों में सिर्फ उन नि:शक्तों को आरक्षण का लाभ दिया जाता है, जो महाराष्ट्र के डोमिसाइल हैं. इनके अलावा किसी और विधि विश्वविद्यालय में आरक्षण के मामले में डोमिसाइल (नागरिकता) नीति नहीं है.

दूसरी श्रेणी में 6 राष्ट्रीय विधि विश्विविद्यालयों को रखा गया है. इनमें से दो नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (भोपाल) और वेस्ट बंगाल नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ ज्यूरिडिकल साइंसेज (कोलकाता) में आरक्षण कानून का पालन नहीं हो रहा है. इन दोनों संस्थानों में 6 सीट आरक्षित होनी चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है. बाकी के चार विश्वविद्यालय नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी ओड़िशा (कटक), नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी एंड ज्यूडिशियल एकेडमी असम (गुवाहाटी), तमिलनाडु नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (तिरुचिरापल्ली) और नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्टडी एंड रिसर्च इन लॉ (रांची) कानून का अनुपालन कर रहे हैं. उन्होंने स्पष्ट जानकारी दी है कि इनके यहां नि:शक्तों के लिए क्रमश: 9, 3, 6 और 6 सीटें आरक्षित हैं.

तीसरी श्रेणी के सभी पांच संस्थान नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी (बेंगलुरु), नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (हैदराबाद), राजीव गांधी नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ (पटियाला), हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (शिमला) और धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (जबलपुर) 5 फीसदी आरक्षण के नियमों का पालन कर रहे हैं.

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