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स्‍मृति शेष : नहीं रहे कमलेश कच्‍छप, थम गयी बांसुरी की सरगम

Updated at : 06 Aug 2019 7:22 PM (IST)
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स्‍मृति शेष : नहीं रहे कमलेश कच्‍छप, थम गयी बांसुरी की सरगम

डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो असिस्टेंट प्रोफेसर यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ टीआरएल रांची विश्वविद्यालय रांची : झारखंड में चलना ही नृत्य और बोलना ही गीत है, डॉ राम दयाल मुंडा की उक्ति ‘जे नाची से बांची’ झारखंडी कलाकारों के लिए सही साबित नहीं हो रहा है. सरकारी उपेक्षा और आर्थिक तंगी से जुड़े यहां के कलाकारों की […]

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डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो

असिस्टेंट प्रोफेसर

यूनिवर्सिटी डिपार्टमेंट ऑफ टीआरएल

रांची विश्वविद्यालय

रांची : झारखंड में चलना ही नृत्य और बोलना ही गीत है, डॉ राम दयाल मुंडा की उक्ति ‘जे नाची से बांची’ झारखंडी कलाकारों के लिए सही साबित नहीं हो रहा है. सरकारी उपेक्षा और आर्थिक तंगी से जुड़े यहां के कलाकारों की सुध लेने वाला कोई नहीं है. एक के बाद एक बेहतरीन लोक कलाकार अपनी कला के साथ असमय ही काल के गाल में समा जाने को मजबूर हैं. सारंगी वादक, टोहिला वादक, बांसुरी वादक, कवि कलाकारों के असमय मौत के पश्चात पुनः रातू के संजय नगर में रहने वाले झारखंड के प्रसिद्ध बांसुरी वादक कमलेश कच्छप बांसुरी की सरगम भी थम गयी.

आज उन्होंने अपने आवास में तकरीबन ढेड़ बजे अंतिम सांसे ली. गौरतलब हो कि किसी कार्यक्रम में बांसुरी बजाते-बजाते अचानक गिर पडे़ थे. ईलाज के दौरान पता चला, इन्हें मिर्गी है. जैसे ऊपर वाले को इतने भर से संतोष नहीं था. कमलेश के शरीर का बायां हिस्सा पक्षाघात से पीड़ित हो गया और फिर तो बिस्तर के अलावा कोई दूसरा चारा भी नहीं रहा.

पिछले पांच सालों से कमलेश ने न तो बासुरी में फूंक मारी है और न आसमां को देखा. छोटे से कमरे और छोटी सी चारपाई तक ही कमलेश की दुनिया सिमट कर रह गयी थी. अंतत: वे जिंदगी की जंग हार गये. हम सबों को छोड़ कर हमेशा हमेशा के लिए चिर निन्द्रा में सो गये.

कभी कमलेश कच्छप की बांसुरी की धुन पर लोग थिरका करते थे. झारखंड की नौ भाषाओं के गीतों को बांसुरी में उतारने की महारत हासिल करने वाले इस कलाकार को रेडियो और दूरदर्शन ने बीआई ग्रेड के कलाकार का दर्जा दे रखा था। कला विभाग की संस्था कला केंद्र में 12 साल से सेवा दे चुके थे।

बांसुरी बिस्तर पर रखकर सोते थे

कमलेश कच्छप की जिंदगी बिस्तर पर ही सिमट कर रह गयी थी. लेकिन मरते दम तक भी वे बांसुरी बिस्तर में रखकर सोते रहे. दर्जनों कलाकारों को बांसुरी सिखा चुके कमलेश की धुन पर जो लोग थिरकते थे, वाहवाही लूटते और लुटाते थे.

मालूम हो कि झारखंड के इस लोक कलाकार बासुरी वादक कमलेश कच्छप की बासुरी की मीठी तान कई नागपुरी और हिंदी गीतों की शोभा बनती रही. कई सीडी व कैसेट्स, दूरदर्शन और आकाशवाणी के साथ-साथ ढेर सारे मंचीय एवं सरकारी कार्यक्रम में उन्होंने बांसुरी बजायी है.

पिछले पांच साल से चारपाई पर ही रहने के कारण घर की आर्थिक स्थिति बद से बदतर हो चली थी. पत्नी अश्रिता देवी भी कमलेश की सेवा करते नहीं थकतीं थी, लेकिन घर में कमाई का कोई जरिया नहीं होने के कारण परिवार टूट सा गया था।. सबसे बड़ी बेटी जूली का विवाह हो गया। वह ससुराल चली गयी. बड़े बेटे सोनू कच्छप का विवाह हो चुका है, लेकिन वह भी बेरोजगार है.

तीसरे बेटे संतोष और चौथे बेटे राजकुमार की भी आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई छूट गयी और वे भी कुछ नहीं करते हैं. कुल मिलाकर घर की आर्थिक स्थिति दयनीय है. पूरे घर को चूहों ने खोखला कर दिया है. कमलेश के पैर की अंगुलियों को भी चूहों ने कुतर दिया था. आस-पड़ोस वालों से एक-एक मुट्ठी चावल मिलता था तब इन्हें खाना नसीब हो पाता था. अंततः कमलेश कच्छप की बांसुरी की मीठी सरगम थम गयी.

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