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बीड़ी-सिगरेट नहीं पीते, पर 35% पुजारियों के फेफड़े हुए प्रभावित

Updated at : 01 Jun 2019 1:09 AM (IST)
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बीड़ी-सिगरेट नहीं पीते, पर 35% पुजारियों के फेफड़े हुए प्रभावित

राजीव पांडेयरांची : प्रभात खबर ने 15 अप्रैल को शहर के प्रमुख मंदिर: प्राचीन पहाड़ी मंदिर, रातू रोड दुर्गा मंदिर, साईं मंदिर, मेन रोड स्थित हनुमान मंदिर, चर्च रोड स्थित काली मंदिर और मेडिकल चौक स्थित दुर्गा मंदिर के पुजारियों के फेफड़े की जांच करायी. इन मंदिर के करीब 11 प्रमुख पुजारियों के स्पिरोमेट्री (फेफड़ा […]

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राजीव पांडेय
रांची :
प्रभात खबर ने 15 अप्रैल को शहर के प्रमुख मंदिर: प्राचीन पहाड़ी मंदिर, रातू रोड दुर्गा मंदिर, साईं मंदिर, मेन रोड स्थित हनुमान मंदिर, चर्च रोड स्थित काली मंदिर और मेडिकल चौक स्थित दुर्गा मंदिर के पुजारियों के फेफड़े की जांच करायी. इन मंदिर के करीब 11 प्रमुख पुजारियों के स्पिरोमेट्री (फेफड़ा की जांच ) की जांच की गयी. जांच में चार पुजारियों के फेफड़े प्रभावित पाये गये. कुछ पुजारी के फेफड़ों में हल्की समस्या पायी गयी. हालांकि, शेष पुजारियों का फेफड़ा पूरी तरह स्वस्थ पाया गया.

जांच में सबसे चौंकाने वाले तथ्य यह आया कि शहर के एक मंदिर के 24 वर्षीय युवा पुजारी क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी सीओपीडी से पीड़त हैं. उनका अिधकतर समय मंदिर के अंदर गुजरता है, जहां हर वक्त धूप और अगरबत्ती का धुआं फैला रहता है. जांच के समय भी इनको काफी परेशानी हुई. उनके पिता ने बताया कि इनको माइल्ड टीबी की शिकायत भी हो गयी थी. इलाज चलने के बाद यह ठीक हुए.
वातावरण में तेजी से बढ़ रहे प्रदूषण का असर मानव शरीर पर पड़ रहा है. इसमें धूम्रपान के अलावा अन्य माध्यमों से निकलने वाला धुआं भी हमारे फेफड़ों को खराब करता है. केमिकल से बनी धूप और अगरबत्ती से निकलनेवाला धुआं भी फेफड़ों के लिए हानिकारक साबित हो रहा है. मंदिरों में लगातार रहनेवाले पुजारी तेजी से इसकी चपेट में आते हैं.
प्रभात खबर ने ‘सिप्ला ब्रिथ फ्री’ के सहयोग से राजधानी के प्रमुख मंदिरों के पुजारियों के फेफड़ों की जांच करायी, तो पता चला कि 35 फीसदी पुजारियों के फेफड़े प्रभावित हैं. सनातन धर्म में चंदन या आम की लकड़ी, घी और गुड़ से खुले में हवन करने की परंपरा है, लेकिन आधुनिक समय में लोग इसके बजाय केमिकल धूप और अगरबत्ती का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो हानिकारक साबित हो रहा है.
केस स्टडी-1 : फेफड़ा खराब होना शुरू हो गया है
बरियातू मेडिकल चौक के 45 वर्षीय पुजारी के फेफड़े की जांच की गयी. जांच में वह फेफड़े की बीमारी से पीड़ित पाये गये. हालांकि, अभी वह क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज की बीमारी से पीड़ित नहीं हुए हैं, लेकिन फेफड़ा खराब होने की शुरुआती स्थिति में है. अगर सही समय पर इलाज नहीं किया गया तो वह सीओपीडी से पीड़ित हो जायेंगे. उन्होंने बताया कि वह धूम्रपान नहीं करते हैं. लेकिन, मंदिरों में पूजा अनुष्ठान के दौरान लगातार वे केमिकल धूप और अगरबत्ती से निकलने वाले धुएं के संपर्क में रहते हैं.
केस स्टडी-2 : खराब हो चुका है फेफड़ा
शहर के एक मंदिर के 64 वर्षीय पुजारी भी क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) की बीमारी से पीड़ित हैं. प्रभात खबर द्वारा कराये गये सर्वे जांच में इसकी पुष्टि हुई. जांच के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि वह एलर्जी की बीमारी से पीड़ित हैं. एलर्जी की दवा भी लेेते हैं, लेकिन कोई फायदा नहीं होता है.
उन्होंने बताया कि वह जीवन में कभी धूम्रपान नहीं किया है. जब उनकी उम्र 14 साल की थी, तभी से वह कर्मकांड और पूजा का कार्य शुरू कर दिये थे. धुआं शरीर को हानि पहुंचाता है, इसकी जानकारी उन्हें अब तक नहीं है.
क्या है सीओपीडी
क्रोनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) फेफड़े की बीमारी है. सीओपीडी से पहले व्यक्ति सामान्य बीमारी ब्रोंकाइटिस व एम्फिसीमा से पीड़ित होता है. इन दोनों बीमारियों से एक व्यक्ति पीड़ित हो सकता है. यह सांस की नली को प्रभावित करना शुरू करता है. फेफड़ों से बाहरी वायु प्रवाह को संक्रमित कर देता है. इसके अलावा सांस की नली में सिकुड़न व सूजन हो जाता है.
हार्ट की बीमारी का खतरा
क्रोनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के मरीज अगर समय पर इलाज नहीं कराये, तो गंभीर हृदय रोग की चपेट में आ सकते हैं. सामान्य खासी होने पर वह एलर्जी की दवा खाते हैं और आराम होने पर पहले की तरह सामान्य दिनचर्या में लौट आते हैं. लेकिन, बाद फेफड़ा की यह बीमारी हार्ट की बीमारी को जन्म देती है. इससे व्यक्ति की जान तक जा सकती है.
पुणे में 25% पुजारियों के फेफड़े खराब
चेस्ट रिसर्च फाउंडेशेन के डायरेक्टर व प्रसिद्ध फेफड़ा रोग विशेषज्ञ डॉ संदीप साल्वी ने बताया कि वह उनके द्वारा भी पुणे के मंदिरों के पुजारी के फेफड़ों की जांच करायी गयी थी. जांच में 25 फीसदी पुजारियों के फेफड़े खराब पाये गये थे. यानी ये क्रोनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और अस्थमा की बीमारी से पीड़ित पाये गये थे.
सीओपीडी धुआं से होनेवाली बीमारी है. लकड़ी का जलावन के रूप में प्रयोग करना व फसल के अवशेष को जलावन के रूप में प्रयोग करना भी इसका कारण है. सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक ज्यादातर पुजारी सीओपीडी से पीड़ित मिले हैं. पूजन सामग्री से निकलने वाले धुआं में ज्यादा देर तक रहने से फेफड़ा प्रभावित हो सकता है. धुआं व सांस के माध्यम से शरीर में जाता है, जो सीओपीडी का कारण बना.
डॉ निशीथ कुमार, फेफड़ा रोग विशेषज्ञ
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