जान देना हल नहीं

Updated at : 12 May 2019 8:08 AM (IST)
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जान देना हल नहीं

अनुज कुमार सिन्हा रांची में 12वीं की परीक्षा में एक छात्रा काे गणित में कम अंक आये (हालांकि वह परीक्षा पास कर गयी थी), पिता ने डांटा ताे उस छात्रा ने ऊंचे भवन से कूद कर जान दे दी. घटना बेचैन करनेवाली है. आज हालात ऐसे हाे गये हैं, जहां किसी छाेटी सी घटना पर […]

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अनुज कुमार सिन्हा
रांची में 12वीं की परीक्षा में एक छात्रा काे गणित में कम अंक आये (हालांकि वह परीक्षा पास कर गयी थी), पिता ने डांटा ताे उस छात्रा ने ऊंचे भवन से कूद कर जान दे दी. घटना बेचैन करनेवाली है. आज हालात ऐसे हाे गये हैं, जहां किसी छाेटी सी घटना पर भी काैन, कहां और कब जान दे दे, काेई नहीं कह सकता. कारण धैर्य, संयम और हार काे स्वीकारने की क्षमता का अभाव. बहुत कहना मुश्किल है कि दाेषी काैन? छात्र-छात्रा, माता-पिता या पूरी व्यवस्था.
बच्चे अगर परेशान हैं, ताे माता-पिता भयभीत. डांटे ताे जान देने काे तैयार, न डांटे, ताे बिगड़ने का खतरा. इसलिए इस समस्या का हल आसान नहीं. हालात ऐसे हाे गये हैं कि हर काेई जीतना चाहता है, अगर हार गये, ताे बर्दाश्त नहीं कर पाते. बच्चाें पर इतना भार कि वह संभाल नहीं पाता. साेचिए, जिंदगी से बड़ी भी काेई चीज है, शायद नहीं.
आत्महत्या वाली घटना के पहले कुछ पुरानी घटनाआें काे याद कीजिए. जाे आज की पीढ़ी के हैं, वे अपने माता-पिता, दादा-दादी से ऐसी घटनाएं शायद सुन चुके हाेंगे. 30-40 साल पहले प्राइवेट और आज जैसे बड़े-बड़े स्कूल नहीं हाेते थे. सरकारी स्कूलाें में बच्चे ज्यादा पढ़ते थे. तब भी रिजल्ट निकलता था और बच्चे फेल करते थे. रिजल्ट लेकर आते वक्त रास्ते में काेई पूछा कि पास किया कि नहीं. फेल करनेवाले बच्चे सीधा जवाब देते-नहीं किये, लटक गये.
रिजल्ट न ताे छिपाते थे और न ही उस पर बात करने से हिचकते थे. यह था माहाैल. घर में खराब रिजल्ट करने पर बहुत डांटते-बाेलते भी नहीं थे. कुछ घराें में धुनाई हाेती थी, लेकिन बच्चे महसूस करते थे कि फेल किये हैं, ताे पिटायेंगे ही. माता-पिता काे इतना ही कहते थे कि अागे से ध्यान से पढ़ेंगे. उन दिनाें रिजल्ट खराब हाेने पर जान देने की घटना कम घटती थी.
मानसिक ताैर पर बच्चे मजबूत हाेते थे. लाेग उसे चिढ़ाते भी नहीं थे. संयुक्त परिवार में हाेने के कारण दादा-दादी, नाना-नानी का उन बच्चाें पर हाथ हाेता था. प्रेरक कहानियां सुना-सुना कर बच्चाें काे वे कब मजबूत बना देते थे, पता नहीं चलता था.
गुजर गया वह जमाना. मैदान में बच्चे खेलने जाते, आपस में लड़ते. एक-दूसरे का कॉलर पकड़ते. कभी-कभी आपस में गाली भी बकते, लेकिन खेल खत्म हाेते ही गले में हाथ डाल कर गपियाते हुए घर चले जाते. तनाव मैदान में खत्म, यह था माहाैल. आज जैसी स्थिति नहीं थी कि स्कूल से आआे, ट्यूशन जाआे, हाेमवर्क कराे. थाेड़ा माैका मिला, ताे माेबाइल में मस्त हाे जाआे. न ताे माता-पिता के पास समय है और न ही बच्चाें के पास. ऐसे में हालात कैसे बदलेंगे?
सच यह है कि हर मां-बाप अपने बच्चाें काे डॉक्टर-इंजीनियर ही बनाना चाहता है. कुछ अपवाद हाेंगे. बच्चे काे साइंस ही पढ़ायेंगे. उस बच्चे की क्षमता क्या है, उसकी रुचि क्या है, इस पर माता-पिता गाैर नहीं करते. साेचते हैं कि पैसा खर्च करेंगे, बड़े स्कूल में भेजेंगे, बड़े काेचिंग में भेजेंगे, कैसे नहीं बनेगा इंजीनियर-डॉक्टर?
वे भूल जाते हैं कि सिर्फ पैसा खर्च कर दबाव बनाने से बच्चाें का जीवन नहीं बन जाता. बच्चाें की क्षमता काे पहचानिए. सब के लिए दुनिया में स्थान है. अब जिस तरीके से नंबर आ रहे हैं (अभी दाे काे पांच साै में पांच साै अंक मिले हैं), 95 प्रतिशत से ज्यादा अंक लाना मामूली बात हाे गयी है, वह बता रहा है कि आनेवाला दिन और कठिन हाेगा.
सच कड़वा हाेता है. ऐसी बात नहीं है कि जाे बच्चे कम अंक लाते हैं, वे सभी बेकार ही हैं और जीवन में कुछ नहीं करेंगे. या जाे फेल हाे गये हैं, उनका जीवन ही बर्बाद हाे गया. या जाे बच्चे 95-99 प्रतिशत अंक ला रहे हैं, सब न्यूटन-आइंस्टाइन ही बनेंगे. ठीक है टैलेंट का सम्मान हाेना चाहिए, लेकिन कम अंक लानेवालाें की भी उपेक्षा नहीं हाेनी चाहिए. ईश्वर ने हर किसी काे अलग-अलग क्षमता दी है. काेई अगर पढ़ने में अच्छा है ,ताे काेई खेल-कूद,संगीत, नृत्य या अन्य क्षेत्र में.
उसकी नैसर्गिक प्रतिभा काे आगे बढ़ाइए. आइआइटी और मेडिकल के लिए दबाव मत दीजिए. धाैनी और विराट ने ताे आइआइटी या मेडिकल नहीं किया, ताे किस मामले में ये पीछे हैं. देश के सबसे सफल व्यक्ति में शामिल. खेल के बल पर पूरी दुनिया में लाेकप्रिय. पैसा-प्रतिष्ठा का अभाव नहीं. लता मंगेश्कर काे देखिए. संगीत के क्षेत्र में देश में दूसरी लता नहीं निकल पायी.
और बच्चाें. सीधा फार्मूला है-जीवन सबसे कीमती. जीवन है, जिंदा रहाेगे, ताे जीवन में बहुत अवसर मिलेंगे. माता-पिता चिंतित रहेंगे ही, क्याेंकि वे आपके माता-पिता हैं. वे अापका भला ही चाहते हैं. इसलिए कभी अगर आपने गलती की या आपसे गलती हाे गयी, ताे वे आपकाे डाटेंगे ही. उन्हें आपकाे डांटने का अधिकार है. इसे आशीर्वाद समझ कर स्वीकार कीजिए. आवेश-जल्दबाजी में काेई ऐसा कदम न उठा लें, जिससे सभी काे पछताना पड़े. कायर मत बनिए. समस्या आये, ताे भागिए मत, उसका सामना कीजिए और उसे मात दीजिए.
अंदर से मजबूत बनिए, मानसिक मजबूती सबसे जरूरी है. क्या हुआ, कम अंक आया ताे आया. देश-दुनिया में लाखाें-कराेड़ाें काे कम अंक आये हाेंगे. यह ठान लें कि फिर से तैयारी करेंगे और बेहतर करेंगे. असफलता के बाद ही सफलता की राह खुलती है. दुनिया में ऐसे महान लाेगाें की भरमार है, जाे अपने आरंभिक जीवन में फेल हाेते रहे हैं. उसके बाद उनका रास्ता खुला और उन्हाेंने इतिहास रचा. इस तथ्य काे समझिए कि रात के बाद दिन आता ही है, यही प्रकृति का नियम है. अगर आप असफल हाे रहे हैं, ताे आपकाे सफल हाेने का माैका मिलेगा ही. यह समय है साेच समझ कर निर्णय करने का. दाेनाें के लिए, छात्र-छात्राआें के लिए और अभिभावकाें के लिए भी. अभिभावक अनावश्यक दबाव नहीं बनाये, उतनी ही अपेक्षा करें, जितनी क्षमता उसे ईश्वर ने दी है. वह पहले से इस प्रतियाेगी युग में परेशान है, दबाव में है, उस पर और दबाव न बनाये. और बच्चाें, कभी-कभी हारने के लिए भी तैयार रहें.
हर बार आप ही जीतेंगे, ऐसा नहीं हाेगा. ठीक है सफल हुए ताे खुश रहिए और अगर असफल हुए ताे यह साेचिए कि ईश्वर ने आपके लिए जरूर काेई इससे अच्छा माैका बचा कर रखा है. निराश न हाे, हार न माने और चुनाैती काे स्वीकारें. जीत आपकी हाेगी ही, भले ही समय लगेगा.
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