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रांची : खुलकर बयां की चुनाव और जीवन की कड़वी हकीकत

Updated at : 05 May 2019 8:55 AM (IST)
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रांची : खुलकर बयां की चुनाव और जीवन की कड़वी हकीकत

रांची : कवि अक्सर कविता के माध्यम से उन प्रसंगों को साझा कर देते हैं, जिनके बारे में आम आदमी शायद ही सोचे. इन प्रसंगों में हास्य, अभिव्यक्ति और जीवन की सच्चाई छुपी होती है. प्रभात खबर कार्यालय में शनिवार को काव्य सम्मेलन का आयोजन किया गया. जिसमें रांची के कई कवियों ने हिस्सा लिया. […]

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रांची : कवि अक्सर कविता के माध्यम से उन प्रसंगों को साझा कर देते हैं, जिनके बारे में आम आदमी शायद ही सोचे. इन प्रसंगों में हास्य, अभिव्यक्ति और जीवन की सच्चाई छुपी होती है. प्रभात खबर कार्यालय में शनिवार को काव्य सम्मेलन का आयोजन किया गया. जिसमें रांची के कई कवियों ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम का आयोजन विश्व हास्य दिवस की पूर्व संध्या पर हुआ. जहां कवियों ने अपनी कविता से रोजमर्रा के जीवन में घट रही घटनाओं को लेकर अपनी भावना को अभिव्यक्त किया. किसी ने हास्य कविता पढ़ कर लोगों को गुदगुदाया, तो किसी ने मतदान और चुनावी जंग को आम लोगों के हित में पेश किया. वहीं किसी ने हुस्न के साथ बॉर्डर पर तैनात जवान के जीवन को चित्रित किया.

संगीता कुमार टाक : एक वो था जो ललकार रहा था, बॉर्डर पर खड़ा था देश के लिए कुछ भी करने को तैयार, एक ये है जो ललकार रहे हैं मंच पर खड़े हैं वोट के लिए कुछ करने को तैयार है….

नरेश बंका : किस पर हंसे किसको हसायें लाफ्टर दिवस की शुभकामनाएं. पत्रकार ने नेता से पूछा राजनीति का अर्थ बताइये? नेताजी बोले – राज कीजिए नीति भूल जाइये….

डॉ शिशिर सोमवंशी : कोई इंसा कोई खुदा ही नहीं, उसके जैसा कोई हुआ ही नहीं.

रीता गुप्ता : लघुकथा आस्था के माध्यम से अंधी आस्था की गाथा पेश की. उन्होंने बच्चे और उसकी दादी के बीच हुई हास्य घटना का वर्णन किया. जिसमें कमजोर आंख वाली दादी ने कटरीना कैफ की तस्वीर को पूजा फिर भी उनकी आस्था बरकरार रही.

डॉ सुरिंदर कौर : मेरी पुरानी डायरी में तुम्हारा दिया हुआ गुलाब जो सूख चुका है पर झड़ा नहीं है. जानते हो, उसे छूकर मैं आज फिर से हरी हो गयी हूं….

रेणु झा : नेताजी गया जमाना कसमें वादों का, धोती कंबल बटवाने का, अब युग है कर्तव्य निभाने तब अधिकार पाने का….

संध्या चौधरी : लो चली मैं मतदान देने, ना चमचा न चमची बस देने चली अकेली मतदान…., बचपन तो बीत गया पर बचपना कभी न छोड़ना, शराफत, शरारत, नजाकत से ईश्क को गुलजार कर दिया करो…

नजमा नाहीद अंसारी : तारीकियां हो राह में डर नहीं मुझे, बस खौफ है शहर की बदतर फिजा न हो…

वीणा श्रीवास्तव : हुस्न और इश्क के मिलने से बहस आयेगी, होगी फिर प्यार की बरसात करीब आ जाओ…

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