Engineer''s day : गरीबी से कभी विचलित नहीं हुए विश्वेश्वरैया

Updated at : 15 Sep 2018 12:55 PM (IST)
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Engineer''s day : गरीबी से कभी विचलित नहीं हुए विश्वेश्वरैया

सतीश चंद्र चौधरी(कार्यपालक अभियंता, सीडीअो, पथ निर्माम विभाग) अभियांत्रिकी की महान विभूति मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जन्म दिवस 15 सितंबर पर हर साल भारत में अभियंता दिवस मनाया जाता है. इसकी शुरुआत 1967 से हुई. वर्तमान में कर्नाटक और तत्कालीन मैसूर राज्य के कोलार जिला के मुदेन हल्ली गांव में मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर […]

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सतीश चंद्र चौधरी
(कार्यपालक अभियंता, सीडीअो, पथ निर्माम विभाग)

अभियांत्रिकी की महान विभूति मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जन्म दिवस 15 सितंबर पर हर साल भारत में अभियंता दिवस मनाया जाता है. इसकी शुरुआत 1967 से हुई. वर्तमान में कर्नाटक और तत्कालीन मैसूर राज्य के कोलार जिला के मुदेन हल्ली गांव में मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया का जन्म 15 सितंबर 1861 को हुआ.

पिता श्रीनिवास शास्त्री संस्कृत के विद्वान थे. माता धार्मिक महिला थी. पिता का साया उनके सिर से 15 साल की उम्र में उठ गया था. अध्ययन की सच्ची लगन की राह में गरीबी कभी भी आड़े नहीं बन सकी और वे विचलित भी नहीं हुए. उनकी प्रारंभिक शिक्षा चिक्कबल्लापुर में हुई. इसके बाद वह बेंगलुरु में उच्च शिक्षा प्राप्त करने चले गये.

ट्यूशन पढ़ा कर अपनी पढ़ाई की खर्च निकालते. मैसूर राज्य की कुछ सहायता और अंग्रेज प्रिंसिपल की प्रशंसा से उनका एडमिशन पुणे के साइंस कॉलेज में हुआ. 1883 में बंबई विवि में सर्वोच्च स्थान पाकर इंजीनियरिंग की परीक्षा पास की. इसके बाद बंबई सरकार के लोक निर्माण विभाग मे सहायक अभियंता की नौकरी मिल गयी. पहली पोस्टिंग नासिक में हुई. तब एक नदी के नीचे से सिंचाई के लिए बड़ा नल लगाने में सफलता मिली. 20 माह के अंदर ही विभागीय परीक्षा पास कर वह प्रथम श्रेणी में पहुंच गये.

फरवरी 1894 में सक्खर (सिंधु) शहर में वाटर वर्क्स का निर्माण कार्य पूरा कराया. नयी सिंचाई प्रणाली विकसित की, जिसे ब्लॉक सिस्टम के रूप में जाना गया. बांधों के लिए स्वचालित फाटक का अविष्कार कर पुणे, ग्वालियर व मैसूर के बांधों में इस्तेमाल किया गया. इससे पानी का परिमाण बढ़ गया और नागरिकों को पर्याप्त पानी मिलने लगा. 1906 मे इंग्लैंड की सरकार ने अदन में पानी के नलों तथा मल निकाल की व्यवस्था के लिए भारत से सुयोग्य इंजीनियर भेजने का निर्देश दिया गया. बंबई के गवर्नर ने विश्वेश्वरैया को उपयुक्त माना.
अपनी प्रथम विदेश यात्रा में ही अपनी योग्यता व ईमानदारी की अमिट छाप छोड़ दी. उन्हें उच्च पदों पर बैठाया गया, लेकिन मुख्य अभियंता का पद नहीं दिये जाने के कारण वह रिटायरमेंट के काफी पहले ही त्याग पत्र दे दिया. तब भारतीयों को सहायक के पद पर ही रखा जाता था. विश्वेश्वरैया को हैदराबाद निजाम द्वारा शहर के पुनर्निर्माण व जल निकास की योजना तैयार करने के लिए आग्रह पत्र प्राप्त हुआ.
हैदराबाद में मूसी व ईसा दो नदियों से बाढ़ का खतरा होने पर शहर के बाहर ही दो बड़े जलाशय बनाकर बाढ़ के खतरे से बचाया. मैसूर महाराजा ने भी उन्हें राज्य के लिए सेवा देने का आग्रह किया. फिर वह मैसूर में मुख्य अभियंता बने. बाद में मैसूर का दीवान बने. सिंचाई के लिए कृष्णराज सागर व भद्रावती का इस्पात कारखाना के अलावा मैसूर विश्वविद्यालय आदि का निर्माण कराया. 1918 में मैसूर दीवान के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त ले ली. 1955 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया. 14 अप्रैल 1962 को 101 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ.
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