रांची : 25 मई को ही समाप्त हो चुका है निर्मल हृदय का रजिस्ट्रेशन
Updated at : 13 Jul 2018 7:27 AM (IST)
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परत-दर-परत : 25 मई 2015 को कराया गया था संस्था का रजिस्ट्रेशन, जो तीन साल के लिए था रांची : मिशनरीज ऑफ चैरिटी द्वारा संचालित निर्मल हृदय केंद्र का रजिस्ट्रेशन 25 मई 2018 को ही समाप्त हो गया है. निर्मल हृदय केंद्र के दस्तावेज की जांच के क्रम में यह साफ हुआ है कि संस्था […]
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परत-दर-परत : 25 मई 2015 को कराया गया था संस्था का रजिस्ट्रेशन, जो तीन साल के लिए था
रांची : मिशनरीज ऑफ चैरिटी द्वारा संचालित निर्मल हृदय केंद्र का रजिस्ट्रेशन 25 मई 2018 को ही समाप्त हो गया है. निर्मल हृदय केंद्र के दस्तावेज की जांच के क्रम में यह साफ हुआ है कि संस्था का रजिस्ट्रेशन 25 मई 2015 को कराया गया था, जो तीन साल के लिए होता है. यानी रजिस्ट्रेशन समाप्त हो जाने के बाद भी यहां नाबालिग गर्भवती लड़कियों को रखा गया. इतना ही नहीं उनके बच्चों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के अभिभावकों को बेच दिया गया.
दोबारा रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन दिया गया है या नहीं इस संबंध में पूछे जाने पर सीडब्ल्यूसी की अध्यक्ष रूपा कुमारी ने बताया कि वह देख कर ही इस संबंध में पता पायेंगी कि दोबारा रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन दिया गया है या नहीं.
यदि दिया गया है, तो उसका स्टेटस क्या है, इसके बारे में वे पता कर रही हैं. गौरतलब है कि मामला प्रकाश में आने के बाद सीडब्ल्यूसी ने बच्चा बेचे जाने की प्राथमिकी गत तीन जुलाई को कोतवाली थाना में दर्ज करायी है.
लावारिस बच्चों को 24 घंटे के अंदर सीडब्ल्यूसी में पेश किया जाना चाहिए : जुबनाइल जस्टिस एक्ट की धारा-31(1)(सी) में यह प्रावधान है कोई लावारिस बच्चा मिलता है, तो यात्रा में लगे समय को छोड़ कर 24 घंटे के अंदर सीडब्ल्यूसी के समक्ष पेश कर देना है. यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो संबंधित संस्था पर कानूनी कार्रवाई की जायेगी.
बच्चा सरेंडर की सूचना तुंरत सीडब्ल्यूसी या समाज कल्याण को दी जानी चाहिए : किसी संस्था में रह रही बिना ब्याही नाबालिग लड़की यदि बच्चे को जन्म देती है और बच्चे को रखने के बजाय उसे संस्था में सरेंडर कर देती है, तो इसकी सूचना तत्काल सीडब्ल्यूसी अथवा समाज कल्याण विभाग को दे देनी चाहिए. लेकिन, निर्मल हृदय केंद्र द्वारा बच्चा के जन्म लेने के बाद कभी भी सीडब्ल्यूसी के समक्ष पेश नहीं किया.
इतना ही नहीं कई नाबालिग लड़कियों के बच्चे को बेच देने के बाद मरा हुआ बच्चा पैदा होने की बात कही गयी. इसलिए उन बच्चों का रिकॉर्ड भी संस्था में नहीं रखा गया गया. संस्था के दस्तावेज के जांच के दौरान यह बात सामने आयी है.
बच्चा खरीदनेवाले अभिभावकों पर अलग-अलग हो सकती है प्राथमिकी
एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि बच्चा खरीदने वाले अभिभावकों पर भी अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज करने पर विचार हो रहा है. पुलिस अधिकारी का कहना है कि अब तक तीन बच्चा बेचे जाने का मामला सामने अाया है. अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज होने से अलग-अलग अनुसंधानकर्ता होंगे, जिससे काम करने में अासानी होगी और अनुसंधान शीघ्र हो जायेगा.
रिमांड के लिए अपडेट केस डायरी जमा करने का आदेश
बच्चा बेचे जाने के मामले में पूछताछ के लिए जेल में बंद सिस्टर कोंसिलिया और कर्मचारी अनिमा इंदवार को रिमांड पर लेने के लिए कोतवाली थाना के अनुसंधानकर्ता ने सीजेएम कोर्ट में आवेदन दिया है. इस संबंध में एपीपी पुष्पा सिन्हा ने बताया कि सीजेएम स्वयंभू की अदालत ने पुलिस से अपडेट केस डायरी जमा करने का आदेश दिया है. अपडेट केस डायरी के जमा करने के बाद ही रिमांड पर विचार किया जायेगा.
शेल्टर होम का रजिस्ट्रेशन चला रहे थे एडॉप्शन सेंटर
रांची : मिशनरीज ऑफ चैरिटीज ने शेल्टर होम (नारी निकेतन) के नाम पर निबंधन कराया था, लेकिन यहां एडॉप्शन सेंटर चलाया जा रहा था. यह जानकारी जिला समाज कल्याण पदाधिकारी कंचन सिंह ने दी है. उन्होंने बतायाकि वर्ष 2015 में चाइल्ड एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (कारा) बना. इसके बाद से ऑनलाइन एडॉप्शन शुरू हुआ.
तब मिशनरीज ऑफ चैरिटी ने एडॉप्शन सेंटर के तौर पर काम करने से इनकार कर दिया था. इसके बाद उनलोगों ने शेल्टर होम का लाइसेंस लिया था. 2015 के पहले तक लीगल तरीके से निर्मल हृदय में एडॉप्शन का काम हो रहा था. लेकिन, एडॉप्शन सेंटर के बंद करने के बाद भी गलत तरीके से यह काम किया जा रहा था. जो जिला प्रशासन के जांच के बाद सामने आया.
शिशु सदन के मिलीभगत भी आयी सामने
सीडब्ल्यूसी द्वारा पिछले दिनों 22 बच्चों को अपने अधीन लिये जाने के बाद शिशु सदन की भी मिलीभगत बतायी जा रही है. इस बारे में जिला समाज कल्याण पदाधिकारी कंचन सिंह कहती हैं कि अनिमा इंदवार ने यूपी की दंपती से बच्चा लेकर शिशु सदन में ही रखा था. इसका प्रमाण वीडियो रिकॉर्डिंग के तौर पर जिला प्रशासन के पास है.
उन्होंने बताया कि वहां की सिस्टर ने भी इस बात की जानकारी सीडब्ल्यूसी को नहीं दी. ऐसे में जिला प्रशासन ने उनकी भी संलिप्तता मानी है. इसके बाद ही कार्रवाई हुई है. वहीं, परिजनों के लगातार दबाव बनाये जाने पर कंचन सिंह का कहना है कि जो लोग आ रहे हैं, वे अभिभावक हैं कि नहीं इसकी जांच किये बिना बच्चे को नहीं दिया जा सकता है.
फैक्ट फाइल
तीन जुलाई : सीडब्ल्यूसी ने एएचटीयू कोतवाली में चार बच्चों के बेचे जाने की प्राथमिकी दर्ज करायी
चार जुलाई : छह बच्चों के बेचे जाने का मामला सामने आया
छह जुलाई : मिशनरीज ऑफ चैरिटीज के हिनू स्थित कार्यालय शिशु सदन से 22 बच्चों को दूसरे होम में शिफ्ट किया गया
सात जुलाई : बच्चा बेचे जाने के मामले की जांच के लिए सीआइडी सीडब्ल्यूसी कार्यालय पहुंची
आठ जुलाई : सीडब्ल्यूसी ने पुलिस को दस्तावेज सौंपने का निर्णय लिया
11 जुलाई : वर्ष 2016 में 36 बच्चों में सिर्फ चार बच्चों की ही इंट्री दिखायी गयी, 32 बच्चों की इंट्री नहीं
कब-कब कहां से बरामद हुए तीनों बच्चे
रांची : मिशनरीज ऑफ चैरिटी द्वारा संचालित निर्मल हृदय केंद्र द्वारा बेचा गया तीनों बच्चा कब-कब व कहां से बरामद हुए.
दो जुलाई – उत्तर प्रदेश के ओबरा निवासी सौरभ अग्रवाल व प्रीति अग्रवाल के पास से पहला बच्चा बरामद़ तीन जुलाई को प्राथमिकी दर्ज.
आठ जुलाई- मोरहाबादी, हरिहर सिंह रोड के भरत सहाय के घर में किराये पर रहने वाले ओमेंद्र कुमार सिंह व दीपधारी देवी के घर से बरामद़
11 जुलाई- कोकर के खोरहाटोली, डॉन बास्को स्कूल की पीछे की निवासी शैलेजा तिर्की के घर से नव्या की बरामदगी़
एक की गलती के कारण मिशनरीज ऑफ चैरिटी की सभी संस्थाओं पर कार्रवाई उचित नहीं : आमया
रांची : आॅल मुसलिम यूथ एसोसिएशन (आमया) ने कहा है कि मिशनरीज ऑफ चैरिटी की संस्थाओं पर सरकार और प्रशासन मनगढंत आरोप लगाकर कार्रवाई कर रहे हैं. आमया के अध्यक्ष एस अली ने कहां निर्मल हृदय की पृष्ठभूमि, छवि और चरित्र हमेशा से बेदाग रहा है.
निर्मल हृदय के किसी एक व्यक्ति की गलती पर मिशनरीज ऑफ चैरिटी की सभी संस्थाओं पर मनगढ़ंत कहानी के आधार पर कानूनी कार्रवाई करना उचित नहीं है. उन्होंने कहा कि अनाथ व लावारिस बच्चों को नयी जिंदगी देकर मानवता की सेवा करना कहीं से अमानवीय या अनैतिक नहीं है.
आपसी सहमति से ऐसे बच्चों को वैसे संतानहीन दंपतियों को, जो इन्हें सारी सुविधाओं के साथ पालन-पोषण के इच्छुक हैं, देना मानवीय दृष्टिकोण से गलत नहीं है. पिछले कुछ वर्षों से ईसाई संस्थाओं पर विदेशी फंड और धर्मांतरण के बेबुनियाद आरोप लगाकर हमले किये जा रहे हैं. आदिवासी-मूलवासी को हिंदू-मुसलमान में बांट कर लड़ाया जा रहा है.
झारखंडियों के लिए इसका जवाब मिलकर देने का समय आ गया है. बैठक में इस्मे आजम, मो फुरकान, लतीफ आलाम, इमरान अंसारी, रहमतुल्लाह अंसारी, जियाउद्दीन अंसारी, एकराम हुसैन, तारिक अनवर, अफताब आलम, नौशाद आलम, अबरार अहमद, मो हसन, अंजर अहमद, इमाम अहमद आदि शामिल थे़
गोद लिये जानेवाले बच्चे से नहीं मिल सकते भावी अभिभावक
गोद लिये जाने वाले बच्चे व गोद लेनेवाले अभिभावकों का अॉनलाइन रजिस्ट्रेशन जरूरी
संजय
रांची : इन दिनों बच्चों को गोद लेने से संबंधित विवाद चल रहा है. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि गोद लेने की सही प्रक्रिया क्या है. यदि आप किसी बच्चे को गोद लेना चाहते हैं, तो आप बच्चे से मिल नहीं सकते.
सरकार ने अगस्त 2015 में गोद लेने की प्रक्रिया सरल बनाने संबंधी प्रावधान किये हैं. अब गोद लिये जाने वाले बच्चे व गोद लेनेवाले अभिभावकों का अॉनलाइन रजिस्ट्रेशन जरूरी है. बच्चे व उसके भावी अभिभावकों की सीधी मुलाकात के बदले अब अॉनलाइन मैचिंग का प्रावधान है.
यानी गोद लेने के इच्छुक लोग बच्चे के बारे में सारी जानकारी अॉनलाइन ही ले सकते हैं. किस राज्य से कौन-सा बच्चा गोद लिया जा सकता है, यह निर्णय सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्सेस अॉथोरिटी (सीएआरए या कारा) करती है. गोद लिये जानेवाले बच्चे तथा गोद लेने के इच्छुक लोगों की तसवीरों सहित सभी जानकारी कारा की साइट www.cara.nic.in पर उपलब्ध हैं.
बच्चे व अभिभावकों का निबंधन भी इसी साइट पर होता है. बच्चों को गोद लेने संबंधी प्रक्रिया तथा इसके लिए तय कानून की निगरानी के लिए ही राष्ट्रीय स्तर पर कारा तथा राज्य स्तर पर स्टेट एडॉप्शन रिसोर्सेस एजेंसी (एसएआरए या सारा) कार्यरत है. झारखंड में सारा का कार्यालय एचइसी के एफएफपी बिल्डिंग स्थित सचिवालय में है.
बच्चे व भावी अभिभावकों की सीधी मुलाकात के बदले है अॉनलाइन मैचिंग का प्रावधान
कितने बच्चे गोद लिये गये झारखंड से
झारखंड बाल संरक्षण संस्था एवं स्टेट एडॉप्शन रिसोर्स एजेंसी (सारा) के वर्ष 2011 में गठन के बाद से दिसंबर 2017 तक झारखंड से 33 लड़कियों व 20 लड़कों (कुल 53) को एनआरआइ व विदेशियों ने गोद लिया है. वहीं, झारखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों के ज्यादातर संतानहीन लोगों ने झारखंड के 213 लड़कों तथा 164 लड़कियों (कुल 430) को गोद लिया है.
क्या है गोद लेना
गोद लेना एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें उन बच्चों को, जो अपने अभिभावकों से किसी कारणवश (उनकी मृत्यु होने, बच्चे को छोड़ देने या किसी कारणवश समर्पण कर देने) स्थायी रूप से अलग हो गये हों, उन्हें न्यायसंगत (कानूनी) तरीके से नये अभिभावकों को सौंप दिया जाता है. ऐसे अभिभावक उस बच्चे के दत्तक माता-पिता कहलाते हैं. गोद लेने के साथ ही दत्तक अभिभावक को उस बच्चे से जुड़े सभी अधिकार, सुविधाएं व जिम्मेदारियां मिल जाती हैं. बच्चे को गोद देने का निर्णय अंतिम रूप से फैमिली कोर्ट करता है.
राज्य में गोद देने वाली एजेंसियां
बच्चों को गोद देने वाली एजेंसियों को लाइसेंस, कारा देती है. सरकार की ओर से संचालित संस्थाअों के अलावा गैर सरकारी संस्थाओं के माध्यम से संचालित बाल व शिशु गृह को भी स्पेशलाइज्ड एडॉप्शन एजेंसी (सा) का लाइसेंस दिया जाता है. झारखंड में 15 संस्थाअों को यह लाइसेंस प्राप्त है.
एजेंसियां : इंटिग्रेटेड सोशल डेवलपमेंट अॉर्गनाइजेशन मेदिनीनगर, सहयोग विलेज खूंटी, जमशेदपुर, रांची, गढ़वा व बोकारो, करुणा (आरोग्य भवन) बरियातू रांची, सहयोग विलेज गुरु गोविंद सिंह आश्रालय सिमडेगा, आइअारए इंस्टीट्यूट अॉफ रूरल मैनेजमेंट देवघर, सृजन फाउंडेशन चतरा, लोहरदगा व हजारीबाग, ग्राम प्रौद्योगिक विकास संस्थान दुमका, कोडरमा व धनबाद.
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