राजनीतिक कुनबा बढ़ाने में जुटे झारखंड के दिग्गज! पति, पत्नी, बेटा मैदान में

Updated at : 05 Feb 2026 12:36 PM (IST)
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Jharkhand Civic Polls

झारखंड के निकाय चुनाव में कई दिग्गजों के बेटा, पति और पत्नी मैदान में ताल ठोक रहे हैं.

Jharkhand Civic Polls: झारखंड नगर निकाय चुनाव गैर दलीय होने के बावजूद परिवारवाद की राजनीति के घेरे में आ गया है. मानगो से सुधा गुप्ता, मेदिनीनगर से नम्रता त्रिपाठी और धनबाद से संजीव सिंह मैदान में हैं. राजनीतिक विरासत, प्रभाव और स्थानीय मुद्दों पर मतदाताओं की नजर टिकी है. पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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रांची से सतीश कुमार की रिपोर्ट

Jharkhand Civic Polls: झारखंड में नगर निकाय चुनाव औपचारिक रूप से भले ही गैर-दलीय आधार पर कराए जा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग नजर आ रही है. चुनावी मैदान में उतरे कई प्रत्याशियों की राजनीतिक पहचान सीधे तौर पर बड़े दलों और दिग्गज नेताओं से जुड़ी हुई है. इस बार शहरी सरकार की कमान संभालने की होड़ में दो पूर्व मंत्रियों की पत्नी और बेटी के साथ एक मौजूदा विधायक के पति उतर चुके हैं. ऐसे में परिवारवाद का मुद्दा एक बार फिर राज्य की राजनीति में चर्चा के केंद्र में आ गया है.

मानगो नगर निगम में सुधा गुप्ता की एंट्री

मानगो नगर निगम से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री बन्ना गुप्ता की पत्नी सुधा गुप्ता मेयर पद के लिए चुनावी मैदान में हैं. बन्ना गुप्ता हेमंत सोरेन सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रह चुके हैं और कोल्हान क्षेत्र में कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं. सुधा गुप्ता की उम्मीदवारी को केवल एक व्यक्तिगत राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि कांग्रेस की रणनीतिक चाल के रूप में देखा जा रहा है. पार्टी के भीतर इसे राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने और संगठनात्मक पकड़ मजबूत करने का प्रयास माना जा रहा है.

कोल्हान में कांग्रेस की सियासी रणनीति

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कोल्हान क्षेत्र में कांग्रेस की पकड़ हाल के वर्षों में कमजोर हुई है. ऐसे में बन्ना गुप्ता के राजनीतिक प्रभाव और नेटवर्क का इस्तेमाल कर पार्टी नगर निगम स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है. सुधा गुप्ता के चुनावी मैदान में उतरने से कांग्रेस समर्थकों में उत्साह जरूर बढ़ा है, लेकिन विपक्ष इसे खुलकर परिवारवाद का उदाहरण बता रहा है.

मेदिनीनगर से नम्रता त्रिपाठी का सियासी डेब्यू

मेदिनीनगर नगर निगम से कांग्रेस के पूर्व मंत्री केएन त्रिपाठी की बेटी नम्रता त्रिपाठी मेयर पद के लिए किस्मत आजमा रही हैं. केएन त्रिपाठी लंबे समय तक पलामू की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे हैं. वर्ष 2009 में उन्होंने डालटनगंज विधानसभा सीट से जीत दर्ज कर विधायक बनने के बाद ग्रामीण विकास मंत्री का पद संभाला था. उनकी बेटी की उम्मीदवारी के जरिए कांग्रेस पारंपरिक वोट बैंक को साधने के साथ-साथ युवा मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर रही है.

युवा चेहरे के सहारे नई सियासत

नम्रता त्रिपाठी को अपेक्षाकृत नया चेहरा माना जा रहा है. पार्टी को उम्मीद है कि युवा नेतृत्व और पारिवारिक पहचान का संयोजन चुनावी समीकरण को उनके पक्ष में मोड़ सकता है. कांग्रेस का मानना है कि शहरी मतदाता अब अनुभव के साथ-साथ नई सोच और ऊर्जा को भी महत्व दे रहे हैं. हालांकि, विपक्ष का आरोप है कि यह भी परिवारवाद की ही एक कड़ी है, जहां सत्ता और प्रभाव पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित किया जा रहा है.

धनबाद में संजीव सिंह की वापसी

धनबाद नगर निगम चुनाव में भी राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है. झरिया से भाजपा विधायक रागिनी सिंह के पति और पूर्व विधायक संजीव सिंह धनबाद से मेयर पद की दौड़ में उतर चुके हैं. संजीव सिंह झरिया क्षेत्र में लंबे समय तक प्रभावशाली नेता रहे हैं और संगठन में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है. वर्ष 2014 में वे झरिया विधानसभा से चुनाव जीतकर विधायक बने थे.

भाजपा का संगठनात्मक दांव

भाजपा खेमे में संजीव सिंह की उम्मीदवारी को संगठनात्मक मजबूती का प्रतीक माना जा रहा है. पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि धनबाद जैसे औद्योगिक और शहरी क्षेत्र में अनुभवी नेतृत्व मतदाताओं को आकर्षित कर सकता है. हालांकि, यहां भी परिवारवाद का सवाल उठ रहा है, क्योंकि मौजूदा विधायक की पारिवारिक पृष्ठभूमि से जुड़ा उम्मीदवार मैदान में है.

परिवारवाद बनाम अनुभव की बहस

नगर निकाय चुनावों में नेताओं के परिजनों की बढ़ती भागीदारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या गैर-दलीय चुनाव वास्तव में राजनीति से मुक्त रह पाते हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि भले ही चुनाव चिन्ह पार्टी के न हों, लेकिन उम्मीदवारों की पहचान, संसाधन और जनसंपर्क पूरी तरह से दलीय ढांचे से जुड़े रहते हैं. ऐसे में परिवारवाद और अनुभव के बीच की बहस और गहरी होती जा रही है.

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मतदाताओं के फैसले पर टिकी निगाहें

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि शहरी मतदाता किस आधार पर फैसला करेंगे. क्या राजनीतिक विरासत और बड़े नामों का असर चलेगा या फिर स्थानीय मुद्दे, विकास के वादे और प्रशासनिक क्षमता निर्णायक साबित होंगे. झारखंड के नगर निकाय चुनाव इस मायने में अहम हैं कि ये आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दलों की जमीनी ताकत का संकेत भी देंगे.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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