हिंदी का अस्तित्व अभी और बढ़ेगा

Updated at : 06 Oct 2018 7:20 AM (IST)
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हिंदी का अस्तित्व अभी और बढ़ेगा

जमशेदपुर : प्रभात खबर से बातचीत में कुमार विश्वास ने कहा कि युवाओं में भी कविताओं का काफी क्रेज है. आज कुमार विश्वास का क्रेज इस कारण हुआ है, क्योंकि युवाओं के अनुसार कविताओं का पाठ करता हूं. आज इश्क और प्रेम की कविताएं युवा चाहते हैं और युवाओं को जो चाहिए, वह देता हूं, […]

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जमशेदपुर : प्रभात खबर से बातचीत में कुमार विश्वास ने कहा कि युवाओं में भी कविताओं का काफी क्रेज है. आज कुमार विश्वास का क्रेज इस कारण हुआ है, क्योंकि युवाओं के अनुसार कविताओं का पाठ करता हूं. आज इश्क और प्रेम की कविताएं युवा चाहते हैं और युवाओं को जो चाहिए, वह देता हूं, जिस कारण ही मेरा क्रेज है.
उन्होंने कहा, कविता या साहित्य से लेकर कई सारी विधाएं हैं, जिसके बारे में पहले भी लोग सोचते थे कि उनके बाद यह समाप्त हो जायेगी. लेकिन वह लगातार ऊंचाइयों में पहुंचती गयी. मेरे बाद भी कविता, साहित्य व हिंदी और ऊंचाइयों पर पहुंचती रहेगी. हिंदी का भविष्य काफी बेहतर है. इसके लिए जरूरत है कि यह लोगों के प्यार और व्यापार की भाषा बन जाये. इंग्लिश को व्यापार की भाषा बनाकर पूरी दुनिया में राज कर लिया है, लेकिन आज हिंदी को प्यार और व्यापार से जोड़कर काम करने की जरूरत है.
इसके बाद सात समुंदर पार भी हिंदी की पहचान बढ़ेगी. उन्होंने कहा : सरकारों ने हिंदी का बंध्याकरण कर दिया है. कभी आपने सुना है कि सरकार हिंदी को लेकर सम्मेलन कराती हो. विश्व हिंदी सम्मेलन सरकार की ओर से आयोजित की जाती है, जिसमें मेरे जैसे लोग, जो 30 साल से कविता कर रहे हैं, नहीं गये. कई लोग नहीं जानते. अंगूठा छाप मंत्री बन गये हैं, कला और साहित्य का विभाग देखते है. कुमार विश्वास ने कहा : एक वक्त था, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत थे, तो निराला जी ने हंगामा कर दिया था, क्योंकि मुख्यमंत्री मंच पर थे और निराला को नीचे बैठाया गया था.
विरोध को मुख्यमंत्री ने सम्मान दिया था और खुद नीचे आकर उन्हें ले गये थे. आज की सरकार में बैठा व्यक्ति क्या ऐसा कर सकता है. आज विश्वविद्यालयों की भी हालत यही हो गयी है. जो सरकार का चमचा होता है, उसको वाइस चांसलर बना दिया जाता है, इससे हिंदी का भला संभव नहीं लगता है.
कुमार विश्वास ने कहा : झारखंड जैसे राज्यों के विकास के लिए छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड के साथ इसका भी विकेंद्रीकरण किया गया था. लेकिन इसका लाभ लोगों तक नहीं पहुंच पाया था. झारखंड के खनिज का सदुपयोग भी नहीं हो पाया और वनों में जिन्हें अधिकार मिलना चाहिए था, वह नहीं मिल पाया है.
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