कहीं शिक्षकों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं, कहीं 15 वर्षों से ही नहीं हुअा ऑडिट

Updated at : 06 Aug 2018 8:22 AM (IST)
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कहीं शिक्षकों को वेतन देने के लिए पैसे नहीं, कहीं 15 वर्षों से ही नहीं हुअा ऑडिट

जमशेदपुर : झारखंड के डिग्री कॉलेजों में होने वाली इंटरमीडिएट की पढ़ाई भगवान भरोसे है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देश के बावजूद राज्य भर के अंगीभूत महाविद्यालयों में इंटरमीडिएट की कक्षाएं संचालित हो रही है. यह प्रणाली बिना किसी सरकारी मदद और निगरानी के कुछ लोगों की मर्जी के अनुसार चल रहा है. झारखंड सरकार […]

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जमशेदपुर : झारखंड के डिग्री कॉलेजों में होने वाली इंटरमीडिएट की पढ़ाई भगवान भरोसे है. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देश के बावजूद राज्य भर के अंगीभूत महाविद्यालयों में इंटरमीडिएट की कक्षाएं संचालित हो रही है. यह प्रणाली बिना किसी सरकारी मदद और निगरानी के कुछ लोगों की मर्जी के अनुसार चल रहा है.
झारखंड सरकार के उच्च, तकनीकी शिक्षा एवं कौशल विकास विभाग से लेकर स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग तक के पास डिग्री कॉलेजों की इंटरमीडिएट कक्षाओं को लेकर कोई नीति नहीं है. बार-बार घोषणा होती है कि डिग्री कॉलेजों में इंटर की पढ़ाई बंद कर दी जायेगी. नया सत्र शुरू होते ही सारी विभागीय घोषणाएं हवाई साबित होती हैं. राज्य में प्लस टू की पढ़ाई के लिए शिक्षकों से लेकर संसाधनों तक की घोर कमी है. प्राथमिक, माध्यमिक व उच्च शिक्षा के लिए तमाम नीतियां बनती रहती हैं. अगर कहीं कुछ नहीं होता तो वह उच्चतर माध्यमिक शिक्षा में. नीतियों की कमी और संसाधनों के अभाव का पूरा फायदा पिछले कई वर्षों से कुछ लोगों के निजी फायदे का सौदा साबित होता है.
आलम यह है कि पूरे राज्य के डिग्री कॉलेजों में इंटर की पढ़ाई मानदेय शिक्षकों के भरोसे होती है. डिग्री कॉलेजों में सेवा देने वाले किसी एक शिक्षक को इंचार्ज बनाकर पूरी प्रक्रिया का संचालन कराया जाता है. हर साल बड़ी संख्या में दसवीं पास करने के बाद छात्र ग्यारहवीं में नामांकन के लिए कॉलेजों के बाहर कतार में खड़े होते है. कॉलेज इंटर में छात्रों का दाखिला लेते हैं. इसके बदले फीस वसूली जाती है. फिर जैसे-तैसे दो साल का समय गुजार कर इन छात्र-छात्राओं को झारखंड एकेडमिक काउंसिल से इंटरमीडिएट बोर्ड की परीक्षा में शामिल कराया जाता है.
बच्चे पास हो, न हों इसकी जिम्मेदारी कोई नहीं लेता. खराब परिणाम को लेकर थोड़ा हाय-तौबा मचती है. फिर सबकुछ यथावत चलने लगाता है. अगर इस पूरी प्रक्रिया में किसी के हिस्से कुछ आता है तो वह हैं डिग्री कॉलेजों के प्राचार्य. जिन्हें बिना रोकटोक के एक मोटी रकम ए टू अकाउंट में प्राप्त होती है. इस राशि का उपयोग अधिकांश प्राचार्य अपनी मर्जी के अनुसार करते है. कहीं फंड डायवर्सन कराया जाता है तो कहीं बिना ऑडिट के राशि का उपयोग होता है.
वर्तमान में कुछ ऐसे खर्च होती राशि. वर्तमान में डिग्री कॉलेजों की ओर से जैक को हर साल इंटर का बजट भेजा जाता है. जैक इसे अपनी स्वीकृति प्रदान कर देता है. इसके आलोक में पूरे वर्ष कॉलेज इंटर के फंड का उपयोग करते है. कोल्हान विवि के कई अंगीभूत कॉलेज ऐसे हैं, जहां पिछले दस से पंद्रह वर्षों से इंटर का ऑडिट नहीं हुआ. कई जगह फंड डायवर्सन हुए हैं. कहीं जगह बैंक अकाउंट बदले गये हैं. कई जगह डिग्री के काम के बदले इंटर के फंड से ठेकेदारों को पेमेंट किये गये हैं.
सबसे ज्यादा शोषण डिग्री कॉलेजों में पढ़ाने वाले शिक्षक व कर्मचारियों का
आयम यह होता है कि कई कॉलेजों में इंटर के शिक्षकों व कर्मचारियों का मानदेय तक चार-चार, पांच-पांच माह बाद निर्गत किया जाता है. शिक्षकों व कर्मचारियों से कहा जाता है कि पैसे उपलब्ध नहीं है. लिहाजा भुगतान नहीं हो सकता. हकीकत में यह कॉलेजों को प्राप्त होने वाला ऐसा गुप्त खजाना है, जिस न तो विश्वविद्यालय की निगरानी होती है, न झारखंड एकेडमिक काउंसिल और न ही सरकार की. कई जगह ताे इंटरमीडिएट के फंड से डिग्री कॉलेजों तक के काम किये जाते है. विभिन्न मदों में ठेकेदारों का बकाया भुगतान करने के लिए इस राशि का उपयोग कर लिया जाता है. स्पष्ट नियमावली व ऑडिट नहीं होने के कारण इस पर कहीं कोई आपत्ति तक नहीं होती. कई कॉलेजों में तो इंटरमीडिएट के खाते में मौजूद भारी-भरकम राशि का बैंक अकाउंट बदलकर वित्तीय वर्ष की शुरुआत में कमीशन का खेल चलता है.
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