गुमला: हजारों साल पुराना है वासुदेव कोना मंदिर, पूरी होती हैं हर मुरादें
10 गुम 18 में रायडीह प्रखंड का वासुदेव कोना मंदिर | Prabhat Khabar Network
गुमला का वासुदेव कोना मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला और चमत्कारों के लिए प्रसिद्ध है.जानें इस प्राचीन शिव मंदिर का रहस्य और इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं.
गुमला: गुमला शहर से करीब 15 किमी दूर रायडीह प्रखंड के वासुदेव कोना गांव में स्थित प्राचीन शिव मंदिर आज भी आस्था का प्रमुख केंद्र है. यह मंदिर स्वतंत्रता सेनानी बख्तर साय के गांव जाने वाले रास्ते पर स्थित है. मंदिर और यहां स्थापित शिवलिंग के निर्माण अथवा स्थापना की निश्चित तिथि का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है. हालांकि मंदिर के पुजारी का दावा है कि इसकी स्थापना छठी-सातवीं शताब्दी के आसपास या उससे भी पहले हुई होगी. पुजारी के अनुसार मंदिर की बनावट सामान्य मानव निर्माण जैसी नहीं है. उनका मानना है कि मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने किया था. मंदिर पूरी तरह पत्थरों से निर्मित है और इसके निर्माण में सीमेंट, चूना, मिट्टी या बालू का इस्तेमाल नहीं किया गया है. हजारों वर्ष पुराने इस मंदिर से स्थानीय लोगों की गहरी आस्था जुड़ी हुई है. ग्रामीणों का मानना है कि यहां सच्चे मन से मांगी गयी मुराद जरूर पूरी होती है.
मंदिर के दरवाजे पर विराजमान हैं भगवान नंदी
मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव विराजमान हैं, जबकि मुख्य द्वार के पास भगवान नंदी की प्राचीन पत्थर की आकृति स्थापित है. श्रद्धालु शिवलिंग की पूजा करने के बाद नंदी की पूजा भी जरूर करते हैं. नंदी की बनावट और पत्थर की आकृति भी लोगों के लिए आकर्षण और आस्था का केंद्र है. पुजारी के अनुसार नंदी हजारों वर्ष पहले स्वयं मंदिर के मुख्य द्वार के पास प्रकट हुए थे और तभी से पत्थर के रूप में यहां विराजमान हैं. हालांकि इस मान्यता के ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं.
टांगीनाथ धाम से भी पुराना होने का दावा
गुमला निवासी राजेंद्र प्रसाद गुप्ता का दावा है कि वासुदेव कोना का मंदिर डुमरी प्रखंड स्थित प्रसिद्ध टांगीनाथ धाम से भी पुराना है. उन्होंने बताया कि टांगीनाथ धाम में भी कई पुरातात्विक और ऐतिहासिक धरोहरें मौजूद हैं. वहां की कलाकृतियां और नक्काशी प्राचीन काल की कहानी कहती हैं, जिनके रहस्य पर आज तक पूरी तरह से पर्दा नहीं उठ सका है. राजेंद्र प्रसाद गुप्ता के अनुसार टांगीनाथ धाम से जुड़े कई स्रोत इतिहास को सातवीं से नौवीं शताब्दी तक ले जाते हैं. मान्यता है कि टांगीनाथ धाम में स्वयं भगवान शिव का वास है और यहां सैकड़ों शिवलिंग मौजूद हैं. स्थानीय मान्यता के अनुसार टांगीनाथ धाम और वासुदेव कोना दोनों ही शाश्वत धार्मिक स्थल हैं, जिनकी रचना भगवान विश्वकर्मा ने की है. उनका कहना है कि इन स्थलों की बनावट, शिवलिंग और अन्य अवशेषों को देखने से इनकी प्राचीनता का अंदाजा लगाया जा सकता है.
भगवान विष्णु की प्रतिमा को हाथी भी नहीं उठा सका
वासुदेव कोना में भगवान शिव के साथ भगवान विष्णु की प्राचीन प्रतिमा भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है. पुजारी के अनुसार पालकोट के राजा को वासुदेव कोना स्थित भगवान विष्णु की प्रतिमा पसंद आ गयी थी. उन्होंने प्रतिमा को पालकोट ले जाने के लिए हाथी भेजा था. कहा जाता है कि महावत हाथी लेकर वासुदेव कोना पहुंचा और प्रतिमा को हाथी की पीठ पर रख दिया गया. लेकिन प्रतिमा को पीठ पर बैठाने के बाद हाथी खड़ा ही नहीं हो सका. काफी प्रयास के बावजूद जब हाथी प्रतिमा को लेकर नहीं उठ सका, तो पालकोट के राजा ने प्रतिमा को वहीं छोड़ दिया. पुजारी के अनुसार भगवान विष्णु की यह प्रतिमा आज भी वासुदेव कोना गांव में मौजूद है. स्थानीय मान्यता है कि इसकी स्थापना भी स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने की थी.
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पुरातात्विक अध्ययन से खुल सकते हैं रहस्य
वासुदेव कोना मंदिर की प्राचीनता और इससे जुड़ी विभिन्न मान्यताएं इसे ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती हैं. मंदिर के निर्माण काल, शिवलिंग की स्थापना, नंदी की प्राचीनता और भगवान विष्णु की प्रतिमा से जुड़े दावों की पुष्टि के लिए पुरातात्विक अध्ययन की आवश्यकता है. यदि विशेषज्ञ स्तर पर यहां अध्ययन और सर्वेक्षण कराया जाये, तो मंदिर के इतिहास और इसकी वास्तविक प्राचीनता से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं.
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लेखक के बारे में
By दुर्जय पासवान
दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.
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