खड़ियापाड़ा को नहीं बनने देंगे बांग्लादेशियों का अड्डा : अध्यक्ष

Updated at : 26 May 2025 10:25 PM (IST)
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खड़ियापाड़ा को नहीं बनने देंगे बांग्लादेशियों का अड्डा : अध्यक्ष

खड़ियापाड़ा को नहीं बनने देंगे बांग्लादेशियों का अड्डा : अध्यक्ष

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गुमला. झारखंड आंदोलनकारी मोर्चा सह राष्ट्रीय सरना युवा संघ गुमला के अध्यक्ष अशोक कुमार भगत ने कहा है कि गुमला शहर के खड़ियापाड़ा समेत अन्य जगहों पर आदिवासियों की जमीन को एक विशेष समुदाय तथाकथित प्रवासी बांग्लादेशियों ने प्रशासन व पुलिस की मिलीभगत से सीएनटी एक्ट की धज्जियां उड़ते हुए आदिवासियों की जमीन को जबरन कब्जा किया जा रहा है. समय रहते अगर उपायुक्त गुमला द्वारा त्वरित करवाई नहीं की जाती हैं, तो आदिवासी समुदाय अवैध कब्जा को हटाने के लिए और प्रवासी बांग्लादेशी डेमोग्राफी रोकने के लिए बाध्य होंगे. खड़ियापाड़ा को बांग्लादेशियों का अड्डा नहीं बनने देंगे. कहा है कि शहर के खड़िया पाड़ा की जमीन को एक विशेष समुदाय बांग्लादेशियों द्वारा फर्जी दस्तावेज बना कर व सीएनटी एक्ट 1908 का उल्लंघन कर आदिवासी जमीन को कब्जा करने की साजिश रची जा रही है. पुलिस प्रशासन गुमला की मिलीभगत से बांग्लादेशी प्रवासियों को संरक्षण दिया जा रहा है. प्रशासन मामले को संज्ञान में लेकर आदिवासी जमीन पर अवैध कब्जा को रोके.

युवा पीढ़ी को नशापान से बचाना होगा : डॉ चंद्रकिशोर

गुमला. अखिल भारतीय खड़िया महाडोकलो का दो दिवसीय 86वां वार्षिक सम्मेलन ढिढौली छापरटोली आम बगीचा में संपन्न हुआ. इसका शुभारंभ खड़िया जनजाति के नौ गोत्र का झंडा व नंदनी बसाली गाय की पूजा कर की गयी. मौके पर डॉ चंद्रकिशोर केरकेट्टा ने कहा कि खड़िया समाज को बचाने के लिए युवा पीढ़ी को नशापान से बचाना होगा. साथ ही शिक्षा पर जोर देना होगा. खड़िया समाज में सबसे बड़ी कुरीति नशापान है, जिसे दूर करना होगा. अभी खड़िया समाज संकट से गुजर रहा है. समाज का दुख दर्द कोई सुनने वाला नहीं है. झारखंड में जनजाति भाषा का इंटर महाविद्यालय में शिक्षक की नियुक्ति होने वाली है. लेकिन खड़िया भाषा को छोड़ दिया गया है. खड़िया भाषा झारखंड की दूसरी राज्य भाषा में शामिल हैं. खड़िया जाति को बचाना है, तो समाज के लोगों एकजुट रहना होगा. निकोलस किड़ो ने संस्कृति व खड़िया जाति के बारे विस्तारपूर्वक बताया. मौके पर जेम्स पी केरकेट्टा, सुमन कुल्लू, राजेश खड़िया, हंदू खड़िया, दुर्गा पाहन, कुलकांत केरकेट्टा, रतिया खड़िया, यूजीन कुल्लू, शांति कुल्लू, वासुदेव खड़िया, सोमरा खड़िया, आरती केरकेट्टा, रफाल कुल्लू, एमलेन कुल्लू, एहलाद केरकेट्टा, शिरोमणि, तरसीला केरकेट्टा, मांगरा खड़िया, दिनेश खड़िया, जितेश्वर खड़िया, शांति भगत, सुनीता किड़ो, करमी, एलिजाबेथ डुंगडुंग, सुदेश खड़िया, शुभम खड़िया, नारायण खड़िया, समीर बिलुंग, मधु पाहन, जेठा पाहन, सुरेश इंदवार मौजूद थे.

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