Christmas Countdown: गुमला के मांझाटोली चर्च का गौरवपूर्ण इतिहास,1905 में हुई थी स्थापना, समय के साथ आया बदलाव
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 07 Dec 2021 10:35 PM
jharkhand news: गुमला के मांझाटोली चर्च का गौरवपूर्ण इतिहास रहा है. इस चर्च की स्थपना 1905 ई में हुई है. इस दौरान चर्च को सिरनी चावल नहीं मिलता था. चर्च ने 10 एकड़ 82 डिसमिल जमीन खरीद कर उसपर धान की खेती की. जिससे खाने-पीने की समस्या दूर हुई थी.
Jharkhand news: गुमला जिले के रायडीह प्रखंड स्थित संत इग्नासियुस चर्च मांझाटोली का गौरवपूर्ण इतिहास है. इस पल्ली का इतिहास छाटोनागपुर में ख्रीस्तीय विश्वासियों के महान इतिहास से जुड़ा हुआ है. रांची धर्मप्रांत 7 पल्लियों में बंटा हुआ था. प्रत्येक पल्ली में एक पुरोहित थे. कोनबीर नवाटोली इन्हीं पल्लियों में से एक था. मांझाटोली, कोनबीर नवाटोली पल्ली में आता था. मांझाटोली उस समय नवागढ़ (वर्तमान में रायडीह प्रखंड) व पनारी (वर्तमान में गुमला प्रखंड के सोसो पल्ली) के नाम से जाना जाता था.
नवागढ़ के कैथोलिक की देखभाल सोसो के फादर किया करते थे. उस समय अंग्रेजों के पुलिस मजिस्ट्रेड की विरोधी भावना के कारण नवागढ़ में कलिसिया विकसित नहीं हो पाया. 1901 ई में फादर स्तानिसलास कार्बरी सोसो आये. इसके बाद 1903 ई में फादर जोसेफ फोर्ड एसजे को सोसो भेजा गया. बाद में फादर ब्रिटन डियन ने फादर स्तानिसलास का स्थान ले लिए. पनारी (सोसो) व नवागढ़ के प्रथम मिशनरी फादर जोसेफ फोर्ड हुए. पनारी से ही फादर जोसेफ ने नवागढ़ के मांझाटोली को नया पल्ली के रूप में चयन किये. मांझाटोली में इसके लिए स्थान की तलाश की गयी.
फादर जोसेफ ने 1904 ई में कुछ जमीन खरीदी और 1905 ई में खपैरलनुमा घर बनाया. जहां वे ईश्वर की आराधना किया करते थे. फादर जोसेफ ने अपने रहने के लिए 1907 ई में एक छोटा गिरजाघर व मकान बनाये. परंतु इसे पनारी के अधीन ही रखा गया. 1908 ई में वे पूर्ण रूप से मांझाटोली में निवास करने लगे. इस प्रकार 1908 ई में फादर जोसेफ फोर्ड द्वारा मांझाटोली पल्ली की स्थापना की गयी. इसके बाद गिरजाघर को संत पीटर क्लेवर के संरक्षण में सौंप दिया गया. 25 मार्च 1912 ईस्वी में गिरजाघर की प्रथम आशीष हुई.
1947 में भारत देश आजाद हुआ. 1958 में पूर्णत: स्वराज्य की प्राप्ति हुई. मांझाटोली पल्ली के विकास में यहां के पुरोहितों ने अपना योगदान देना शुरू किया. 1956 ई के आसपास मांझाटोली पल्ली की स्थिति ठीक नहीं थी. पुरोहित व धर्मबहनों के रहने के लिए कच्चा मकान था. पूजा पाठ के लिए ठीक ढंग का गिरजाघर भी नहीं था. यहां 30 एकड़ जमीन ही आर्चबिशप रांची के अधीन था. उस वक्त सिरनी चावल भी नहीं मिलता था. उसी समय फादर मारकुस टेटे यहां के मझियस की जमीन, जो बाबू बनेश्वर शेखर के नाम से था.
दो मार्च 1956 ईस्वी को टांड़ व दोन मिलाकर 10 एकड़ 82 डिसमिल जमीन खरीदे. उसके बाद पारिस में धान की खेती की जाने लगी. खाने की समस्या का समाधान हुआ. आज माझांटोली पल्ली नित्य प्रगति के मार्ग पर बढ़ रहा है. मांझाटोली ने अबतक 24 पल्ली पुरोहितों को देखा है. जिनकी अगुवाई में मांझाटोली पल्ली का विस्तार ही नहीं हुआ, बल्कि उतरोत्तर विकास भी हुआ. वर्तमान में फादर सामुवेल कुजूर पल्ली की देखरेख कर रहे हैं.
भंडारटोली के प्रचारक लिनुस लकड़ा ने कहा कि मांझाटोली पल्ली को मैंने अपने जीवन काल में ईट जुड़ते हुए व चर्च को आगे बढ़ते हुए अपनी आंखों से देखा है. जिस प्रकार ईट से ईट जोड़कर महल बनते हैं. उसी प्रकार लोग इसाई धर्म को अपनाकर अपना धर्म समाज को बढ़ाया है. मांझाटोली चर्च का सर्वप्रथम नाम संत पीटर क्लेवर चर्च था. लेकिन, उसका नाम बाद में संत कैथोलिक चर्च मांझाटोली रखा गया. इस चर्च की बहुत बड़ी महत्ता है.
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पल्ली पुरोहित फादर सामुवेल कुजूर ने कहा कि पहले जब चर्च नहीं बना था. तब इस क्षेत्र के लोग अज्ञानता व अंधकार में जी रहे थे. लोग अपना जीवन कठिन तरीके से जीने को मजबूर थे. परंतु जब चर्च की स्थापना हुई. लोग धर्म की ओर झुके तो धीरे-धीरे ज्ञान रूपी उजाला की ओर पूरा समाज आगे बढ़ने लगा. लोग जागरूक हुए और उन्नति के शिखर पर चढ़ने लगे और आज लोग फल फूल रहे हैं. यह चर्च झारखंड छत्तीसगढ़ बॉर्डर इलाका में होने के कारण काफी प्रसिद्ध है.
रिपोर्ट: जगरनाथ/खुर्शीद, गुमला.
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