गुहार लगाने के बाद भी नहीं मिला जमीन का मुआवजा
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 25 Jul 2019 1:11 AM
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* 1998 में नागफेनी के रैयत अनिल की 0.6 एकड़ जमीन का अधिग्रहण नागफेनी पुल बनाने के लिए हुआ है * मुआवजा भुगतान के नाम पर विभागीय पदाधिकारी एक-दूसरे को जिम्मेवार बता पल्ला झाड़ने में लगे हैं * रैयत अनिल ने गुमला डीसी को ज्ञापन सौंपा, जांच करा कर मुआवजा भुगतान कराने की मांग गुमला […]
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* 1998 में नागफेनी के रैयत अनिल की 0.6 एकड़ जमीन का अधिग्रहण नागफेनी पुल बनाने के लिए हुआ है
* मुआवजा भुगतान के नाम पर विभागीय पदाधिकारी एक-दूसरे को जिम्मेवार बता पल्ला झाड़ने में लगे हैं
* रैयत अनिल ने गुमला डीसी को ज्ञापन सौंपा, जांच करा कर मुआवजा भुगतान कराने की मांग
गुमला : प्रशासन द्वारा नेशनल हाइवे 23 में पुल निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण किये जाने के बाद रैयत सिसई के नागफेनी निवासी मनोहर पंडा के पुत्र अनिल कुमार पंडा मुआवजा की मांग को लेकर सरकारी कार्यालयों का चक्कर लगाने को विवश हैं. रैयत अनिल कुमार का खाता नंबर एक के प्लॉट नंबर 1384 में रकबा 0.61 एकड़ जमीन है. पंजी टू में उक्त जमीन अनिल के पूर्वज पारसनाथ पंडा वगैरह के नाम से दर्ज है. अनिल उक्त जमीन का प्रतिवर्ष लगान भी देते आ रहे हैं.
प्रशासन ने उसमें से 0.6 एकड़ जमीन को एक मई 1998 को राष्ट्रीय उच्च पथ 23 के नागफेनी कोइल नदी में पुल निर्माण के लिए अधिग्रहण किया है. उस समय सिसई सीओ ने रैयती जमीन को सरकारी जमीन बता कर रिपोर्ट बना कर भू-अर्जन कार्यालय को दे दिया. इसके बाद उक्त जमीन पर पुल निर्माण भी हुआ है, परंतु अब तक अधिग्रहित जमीन का मुआवजा नहीं मिला है.
इधर, कहीं से कुछ सुनवाई नहीं होने के बाद अनिल ने गुमला डीसी को ज्ञापन सौंप कर जमीन की जांच कराने और मुआवजा दिलाने की गुहार लगायी है. अनिल ने बताया कि पंजी टू में उक्त जमीन का रैयत पारसनाथ पंडा वगैरह के नाम से दर्ज है, जिसका हम प्रतिवर्ष लगान भी अदा करते आ रहे हैं. उक्त जमीन में से 0.6 एकड़ जमीन को अधिग्रहण कर पुल बनाया गया है, परंतु अब तक अधिग्रहण किये जमीन का भुगतान नहीं मिला है.
अनिल ने बताया कि वह सिसई अंचल और भू-अर्जन पदाधिकारी को कई बार आवेदन देकर मुआवजा भुगतान की गुहार लगा चुका है, परंतु पदाधिकारी मुआवजा भुगतान में रुचि नहीं दिखा रहे हैं. अनिल ने बताया कि सिसई अंचल जाने पर सीओ कहते हैं कि भू-अर्जन का मामला है और भू-अर्जन कार्यालय जाने पर कहा जाता है कि सिसई अंचल का मामला है. विभागीय पदाधिकारी एक-दूसरे को जिम्मेवार बता कर अपना पल्ला झाड़ने में लगे हैं. इस कारण अब तक मुआवजा का पैस भी नहीं मिला है.
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