ट्रंप के चीन दौरे से वैश्विक शांति की उम्मीद

Author : शशांक Published by : Rajneesh Anand Updated At : 19 May 2026 10:50 AM

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चीन और अमेरिका के संबंध

Trump China visit : ईरान युद्ध से पहले ट्रंप ने वेनेजुएला में दखल दिया और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया. दरअसल, ट्रंप ने यह सब कुछ चीन को दबाने के लिए किया है. चीन का वेनेजुएला के साथ दीर्घावधि का अनुबंध था. वहां का लगभग 80 प्रतिशत तेल चीन को जाता था, जो अमेरिका के दखल के बाद रुक गया.

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Trump China visit : हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी चीन यात्रा पूरी की. इस तरह नौ वर्षों बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की चीन यात्रा हुई. बीते वर्ष अमेरिका द्वारा टैरिफ वार शुरू करने के बाद ट्रंप का चीन दौरा बहुत कुछ संकेत दे रहा है. विदित है कि टैरिफ वार के उस दौर में चीन ने महत्वपूर्ण धातुओं (रेयर अर्थ मिनरल्स) और मैग्नेट्स अमेरिका को न बेचने की बात कही थी, जबकि ट्रंप ने कहा था कि वह चीन को चिप और सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी का हस्तांतरण नहीं होने देंगे.

इतना ही नहीं, चीन ने अमेरिका को भेजे जाने वाले कृषि उत्पादों पर भी रोक लगा दी थी. हालांकि दोनों देश इस मामले को सुलझाने की कोशिश भी करते रहे हैं. इसी कारण बीते वर्ष दक्षिण कोरिया के बुसान में दोनों नेताओं के बीच बातचीत हुई थी और उसके बाद दोनों देशों ने टैरिफ को एक वर्ष के लिए आगे बढ़ाने का निर्णय लिया था. इस दौरान अमेरिका ताइवान को 14 अरब डॉलर के हथियारों की भी आपूर्ति करना चाहता था, पर चीन के विरोध के बाद उसने आपूर्ति पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी. इन सब उथल-पुथल के बीच ईरान के साथ ट्रंप का युद्ध शुरू हो गया.


ईरान युद्ध से पहले ट्रंप ने वेनेजुएला में दखल दिया और वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया. दरअसल, ट्रंप ने यह सब कुछ चीन को दबाने के लिए किया है. चीन का वेनेजुएला के साथ दीर्घावधि का अनुबंध था. वहां का लगभग 80 प्रतिशत तेल चीन को जाता था, जो अमेरिका के दखल के बाद रुक गया. दूसरा, ईरान का लगभग 80 प्रतिशत तेल चीन को जाता था, युद्ध छिड़ने के बाद वह भी रुक गया. वास्तविकता यह है कि जब से अमेरिका का ईरान से युद्ध शुरू हुआ है, तभी से ट्रंप चाहते हैं कि वह ताइवान को हथियार आपूर्ति की बात उछाल कर चीन पर दबाव बनायें.

जाहिर-सी बात है कि चीन नहीं चाहता कि अमेरिका ताइवान को हथियार दे, ऐसे में ट्रंप की मंशा ताइवान को हथियार आपूर्ति में देरी करना और उसके एवज में चीन पर यह दबाव बनाना है कि वह ईरान को समर्थन देना बंद करे और ईरान युद्ध रुकवाने में ट्रंप की मदद करे. ऐसा लगता है कि ट्रंप की चीन यात्रा के दौरान इस मामले में कुछ बात बनी है, क्योंकि चीन ने कह दिया है कि हमारी रेड लाइन (लक्ष्मण रेखा) ताइवान है और अमेरिका ने कहा है कि उसकी रेड लाइन ईरान है. जाहिर है कि ईरान जिस तरीके से होर्मुज को नियंत्रित कर रहा है, नौवहन पर रोक लगा रखी है, वह ट्रंप को पसंद नहीं आ रहा.


उथल-पुथल भरे इस वैश्विक परिदृश्य में यदि चीन और अमेरिका के बीच यह समझौता हो जाता है कि चीन ईरान को मदद नहीं देगा और ईरान से पहले जो तेल ले रहा था, वह अमेरिका से लेगा, तो यह चीन के लिए राहत की बात होगी. चीन ने तो यह कोशिश भी शुरू कर दी है. वर्तमान में वह अमेरिका से छह सौ हजार (छह लाख) बैरल तेल प्रतिदिन ले रहा है. इस तरह कहा जा सकता है कि ट्रंप और जिनपिंग के बीच हुई हालिया मुलाकात कहीं न कहीं जी-2 की तरफ बढ़ने का प्रयास है, जहां विश्व की दो बड़ी शक्तियां आपस में ऐसे संबंध बनाकर रखें, जिसमें उनकी अपनी प्राथमिकताएं पूरी होती रहें.

देखा जाये, तो आपसी संबंधों को बेहतर बनाने के लिए दोनों देशों के बीच काफी वर्षों से बातचीत चल रही है. इसके प्रमुख कारणों में एक एआइ तकनीक भी है. एआइ के क्षेत्र में चीन जहां बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरा है, वहीं अमेरिकी कंपनी एनवीडिया के पास एआइ के क्षेत्र में कम से कम तीन ऐसी तकनीकें हैं, जिनके आसपास चीन समेत कोई भी देश नहीं है. एनवीडिया इस क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रही है. यही कारण है कि ट्रंप के चीन दौरे पर उनके साथ एनवीडिया के सीइओ भी गये थे.


इससे लग रहा है कि ट्रंप चाहते हैं कि अमेरिका से चीन को तकनीक का हस्तांतरण हो जाये और चीन से रेयर अर्थ मिनरल्स और मैगनेट्स अमेरिका को मिलता रहे. इतना ही नहीं, अमेरिका चीन को अपने कृषि उत्पाद- गेहूं, सोयाबीन आदि- भी बेचना चाहता है, ये चीजें चीन को चाहिए भी. यदि दोनों देशों के रिश्तों में सुधार आता है, तो एशिया में तनाव की जो स्थिति फिर से बन रही है, उससे थोड़े समय के लिए राहत मिलेगी. लेकिन हमारी सारी परेशानियां दूर नहीं होंगी, क्योंकि होर्मुज जलडमरूमध्य में अब भी तनाव बने रहने की उम्मीद है. यहां भारत को सावधानी बरतने की जरूरत है.

चीन-अमेरिका के संबंध प्रगाढ़ होने पर हो सकता है कि अमेरिका भारत को दरकिनार कर दे. ऐसी स्थिति आए, उससे पहले भारत को यूरोप के उन देशों के साथ, जो पहले अमेरिका के सहयोगी थे, अपने संबंध मजबूत करने चाहिए. अपनी ऊर्जा सुरक्षा की मजबूती की दिशा में कदम उठाना चाहिए. तेल-गैस के वैकल्पिक स्रोत तैयार रखने चाहिए और देश के आत्मनिर्भरता अभियान को भी आगे बढ़ाना चाहिए, ताकि आज जो समस्याएं हमारे सामने आ रही हैं, वे भविष्य में उत्पन्न न हों. अपने जिन संसाधनों को हम बचा सकते हैं, उन्हें बचाने की जरूरत है. यहां ब्रिक्स की बात करनी भी जरूरी है, क्योंकि भारत वर्तमान में ब्रिक्स का अध्यक्ष है और चीन, रूस समेत ईरान और यूएइ इसके सदस्य हैं. ऐसे में बहुत जरूरी है कि ब्रिक्स को मजबूत बनाकर रखा जाए और अमेरिका को मनाया जाए, ताकि ईरान युद्ध समाप्त हो और होर्मुज से निर्बाध आवाजाही शुरू हो सके.


यहां चीन और रूस की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि दोनों ईरान के सहयोगी रहे हैं और उन्हीं के समर्थन के कारण ईरान इतना बढ़-चढ़कर बोल रहा है. दोनों देश यदि ईरान को समझाने में सफल हो जाते हैं, तो यह युद्ध समाप्त हो सकता है और पश्चिम एशिया तथा खाड़ी में शांति स्थापित हो सकती है. ट्रंप-जिनपिंग के बीच हुई मुलाकात के बाद ट्रंप को यह शह नहीं मिलनी चाहिए कि वह ईरान के ऊपर परमाणु हमला कर दे. इसके बजाय यह होना चाहिए कि अमेरिका और ईरान, दोनों शांति की राह पर आगे बढ़ें. अमेरिका को भी ताइवान को हथियारों की आपूर्ति पर रोक बनाये रखनी चाहिए. इससे पूरे एशिया में शांति बनी रहेगी, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण है.

(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं)
(बातचीत पर आधारित)
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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शशांक is a contributor at Prabhat Khabar.

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