गुमला : मासूम नीरज को 16 माह बाद मां व पिता का मिला प्यार

दुर्जय पासवान, गुमला मासूम नीरज उरांव को 16 माह बाद अपने मां व पिता का प्यार मिला. सोमवार को नीरज अपने माता-पिता को देखने के बाद भी उनके पास जाने को तैयार नहीं था. लेकिन जब प्यार से बात की तो नीरज अपने माता-पिता की गोद में आया और खिलखिलाने लगा. अब इस परिवार की […]
दुर्जय पासवान, गुमला
मासूम नीरज उरांव को 16 माह बाद अपने मां व पिता का प्यार मिला. सोमवार को नीरज अपने माता-पिता को देखने के बाद भी उनके पास जाने को तैयार नहीं था. लेकिन जब प्यार से बात की तो नीरज अपने माता-पिता की गोद में आया और खिलखिलाने लगा. अब इस परिवार की मार्मिक कहानी बताते हैं.
गुमला प्रखंड के खोरा भकुवाटोली निवासी साखू उरांव गरीबी के कारण अपने चार बच्चों व पत्नी की जीविका चलाने के लिए मजदूरी करने पलायन कर गया था. वह उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के ईट भटठा में काम करता है. इधर, साखू की पत्नी ललिता देवी अपने गांव खोरा भकुवाटोली में चार बच्चों की देखरेख कर रही थी. लेकिन 16 माह पहले अचानक ललिता का दिमागी स्थिति खराब हो गयी.
ललिता अक्सर इधर-उधर घूमने भाग जाती थी. ललिता की मानसिक स्थिति को देखते हुए उसकी मां बिरसी देवी (ललिता की मां) ने उसे भरनो प्रखंड के गढ़ाटोली गांव ले गयी. जहां उसे एक भगत से झाड़ फूंक कराया. ताकि उसकी दिमागी स्थिति में सुधार हो सके. लेकिन ललिता की दिमागी स्थिति ठीक होने की बजाए और खराब हो गया.
वह गढ़ाटोली गांव में ही दो माह के नीरज (अब 16 महीने) को अपनी मां बिरसी की गोद में देकर भाग गयी. इसके बाद वह इधर-उधर भटकने लगी. पैदल घूमते हुए रांची फिर जमशेदपुर चली गयी. मां के अर्द्धविक्षिप्त होने व पिता के पलायन करने के बाद नीरज व उसके अन्य तीन बच्चों की परवरिश का जिम्मा बिरसी पर आ गया.
चूंकि अन्य तीन बच्चे अमृता उरांव, संतोष उरांव व धीरज उरांव समझदार थे. इसलिए उन्हें खाना खिलाकर रखा जा सकता था. लेकिन नीरज की उम्र उस समय दो माह था. वह बिना दूध के रह नहीं सकता था. ऊपर से गरीबी के कारण दूध कहां से खरीदें. यही चिंता थी. इसलिए बिरसी ने अपने दामाद साखू उरांव को फोन कर उत्तर प्रदेश से बुलाया और पूरी घटना की जानकारी दी.
नीरज की अच्छी परवरिश व देखरेख के लिए साखू ने अपने बेटे को सीडब्ल्यूसी को सौंप दिया. सीडब्ल्यूसी ने बच्चे की स्थिति को देखते हुए उसे मिशनरीज ऑफ चैरिटी में परवरिश के लिए रख दिया. बेटे को सीडब्ल्यूसी को सौंपने के बाद साखू अपना काम छोड़कर अपनी पत्नी ललिता को खोजने में लग गया. काफी खोजबीन व विभिन्न पुलिस थानों में संपर्क के बाद ललिता को बुंडू तमाड़ की सड़कों पर भटकते देखा गया.
साखू, ललिता को वापस अपने गांव लाया. यहां इलाज कराया. 10 महीने के इलाज के बाद ललिता की दिमागी स्थिति में सुधार हुआ. जब ललिता ठीक हुई तो मां की ममता जाग उठी. वह अपने बेटे नीरज को खोलने लगी. सोमवार को साखू व ललिता गुमला में सीडब्ल्यूसी कार्यालय पहुंचे और अपने बेटे की मांग की. कागजी कार्रवाई के बाद सीडब्ल्यूसी ने नीरज को उसके माता-पिता को सौंप दिया.
गुमला के सीडब्ल्यूसी के चेयरमैन शंभु सिंह ने कहा कि मां के अर्द्धविक्षिप्त होने व पिता के पलायन करने के बाद सीडब्ल्यूसी ने नीरज का पालन पोषण किया. अभी नीरज की उम्र 16 माह है. वह पूरी तरह तंदरुस्त है. माता-पिता के आग्रह पर बच्चे को उन्हें सौंप दिया गया है.
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