मधुश्रावणी व्रत का हुआ शुभारंभ, नवविवाहिताएं कर रहीं पारिवारिक सुख-शांति की कामना

Updated at : 15 Jul 2025 11:53 PM (IST)
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मधुश्रावणी व्रत का हुआ शुभारंभ, नवविवाहिताएं कर रहीं पारिवारिक सुख-शांति की कामना

मिथिला परंपरा पर आधारित 13 दिवसीय अनुष्ठान में कथा, पूजन और मंगल गीतों से गूंजा वातावरण

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महागामा प्रखंड क्षेत्र में पारंपरिक मधुश्रावणी व्रत का विधिवत शुभारंभ हुआ. यह व्रत नवविवाहित महिलाएं 13 दिनों तक निरंतर करती हैं, जिसमें वे अपने पति की दीर्घायु, पारिवारिक सुख-शांति और समृद्धि की कामना करती हैं. यह व्रत विशेष रूप से मिथिलांचल की सांस्कृतिक परंपरा को दर्शाता है. सरभंगा निवासी एवं पैक्स लैम्पस जिला अध्यक्ष राजेन्द्र कृष्ण ठाकुर की सुपुत्री नवविवाहिता निशा रानी ने अपने मायके में पारंपरिक विधियों से इस व्रत की शुरुआत की. व्रत के प्रारंभ में नाग-नागिन, भगवान शिव-पार्वती, पंचदेव एवं षष्ठी देवी की पूजा की गयी. पूजा की सारी आवश्यक सामग्री ससुराल पक्ष द्वारा भेजी गई, जो इस अनुष्ठान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.

पारंपरिक कथा श्रवण और मंगल गीतों से भक्तिमय हुआ वातावरण

पूजन के दौरान व्रती महिला नियमित रूप से व्रत, पूजा और कथा श्रवण करती हैं. निशा रानी को मधुश्रावणी व्रत की पौराणिक कथा उनकी दादी गिरिजा देवी और समाज की अन्य वरिष्ठ महिलाओं द्वारा सुनायी गयी. कथा श्रवण इस व्रत का अभिन्न अंग है, जो आध्यात्मिक और पारिवारिक ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. पूजन स्थल पर महिलाओं द्वारा भक्ति गीत, पारंपरिक भजन और मंगल गान प्रस्तुत किये गये. भगवान शंकर और माता पार्वती की स्तुति से वातावरण पूर्ण रूप से भक्तिमय हो गया. व्रत के अंतिम दिन व्रती महिला को उसका भाई आसन से उठाता है, जो भाई-बहन के रिश्ते की सुदृढ़ता और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक होता है. इस विशेष परंपरा के माध्यम से बहन के जीवन में भाई का संबल बना रहे, यह कामना की जाती है. इस अवसर पर वर्षा कुमारी, शबनम कुमारी, कनकलता देवी, आरती देवी, रूबी देवी, सुगंधा देवी, पूजा देवी समेत दर्जनों महिलाओं ने भाग लिया और व्रती के साथ शुभकामनाएं साझा कीं.

धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक बंधन को भी सुदृढ़ करता है यह पर्व

मधुश्रावणी व्रत न केवल धार्मिक आस्था और परंपरा का परिचायक है, बल्कि यह पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक संबंधों को भी सशक्त करता है. मिथिला क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने में यह व्रत आज भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है.

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