दीया पर भारी पड़ रही चाइनिज लाइटें

Published at :03 Nov 2015 6:46 AM (IST)
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दीया पर भारी पड़ रही चाइनिज लाइटें

गोड्डा : दीपावली का त्योहार रोशनी का त्योहार है. इस त्योहार पर लोग अपने-अपने घरों को आकर्षक लाइटों से सजाते हैं. पहले जहां पारंपरिक साधन मिट्टी के दीये में घी या तेज डाल कर उपयोग किया जाता था. वहीं महंगाई व अन्य कारणों से अब लोग मोमबत्ती व चाइनिज लाइटों का प्रयोग कर रहे हैं. […]

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गोड्डा : दीपावली का त्योहार रोशनी का त्योहार है. इस त्योहार पर लोग अपने-अपने घरों को आकर्षक लाइटों से सजाते हैं. पहले जहां पारंपरिक साधन मिट्टी के दीये में घी या तेज डाल कर उपयोग किया जाता था.

वहीं महंगाई व अन्य कारणों से अब लोग मोमबत्ती व चाइनिज लाइटों का प्रयोग कर रहे हैं. इन दिनों बाजारों में चाइनीज लाइटों की भरमार है. समय के साथ व्यवस्था बदली और मिट्टी के दीये तथा कुप्पी बनाने वाले कुम्हकारों के समक्ष बड़ी चुनौती खड़ी हो गयी है. मिट्टी के दीये को लेकर एक माह पहले से कुम्हकार अपनी चाक ताबड़तोड़ चलाते हैं.

मगर कुम्हकारों के चाक की गति को अब चाइनिज लाइटों ने धीमा कर दिया है. पहले की अपेक्षा अब कुम्हकारों को होने वाले मुनाफे में कमी आयी है. हालांकि वस्तुओं के दर तथा बाजार में पेशे की घटती कीमत के कारण चंद पैसे में बिकने वाले दीये की कीमत बढ़ी है. मगर अन्य उत्पादनों से कम ही है.

पोड़ैयाहाट के गुनधासा गांव के कुम्हकारों ने बताया कि पहले की अपेक्षा कम मुनाफा मिलता है. सीताराम पंडित तथा अर्जुन पंडित ऐसे दो परिवार है जो अपने 20 साल की उम्र से ही मिट्टी के दीये व अन्य बरतन बनाने का काम कर रहे हैं. इस पेशे से वे अपने पांच सदस्यीय परिवार का पालन-पोषण करते हैं.
अपने रोजगार से संतुष्ट रहने वाले सीताराम व अर्जुन का कहना है कि आज के समय में परिवार को इस रोजगार के बल पर चलाना किसी चुनौती से कम नहीं है. ऐसे तो मुफलिसी कभी ख्त्म नहीं होती है. सालों भर काम करने के बाद पेट की आग बुझती है.
सीताराम बताते हैं कि कम आय होने के कारण वे बच्चों को अच्छी तालिम नहीं दे पाये. जिस तरह व्यवसाय चल रहा है आगे बहुत कुछ कर पाना मुश्किल है.
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