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फ्लैग-दूसरों के घरों में उजाला फैलाने वाले अंधेरे में रह कर मनाते हैं दीपावलीओके::पारंपरिक दीया पर भारी पड़ रही चाइनिज लाइटें -मोमबती तथा टिमटिमाने वाले बल्ब के कारण कुम्हकारों को परेशानी-दीपावली में मात्र 10 दिन शेष है दीया बनाने में जुटे हैं कुम्हकार तसवीर-14 , 15 , 16 को कुम्हकारों की तस्वीर , सीताराम एवं […]
फ्लैग-दूसरों के घरों में उजाला फैलाने वाले अंधेरे में रह कर मनाते हैं दीपावलीओके::पारंपरिक दीया पर भारी पड़ रही चाइनिज लाइटें -मोमबती तथा टिमटिमाने वाले बल्ब के कारण कुम्हकारों को परेशानी-दीपावली में मात्र 10 दिन शेष है दीया बनाने में जुटे हैं कुम्हकार तसवीर-14 , 15 , 16 को कुम्हकारों की तस्वीर , सीताराम एवं अर्जुन पंडित संवाददाता, गोड्डादीपावली का त्योहार रोशनी का त्योहार है. इस त्योहार पर लोग अपने-अपने घरों को आकर्षक लाइटों से सजाते हैं. पहले जहां पारंपरिक साधन मिट्टी के दीये में घी या तेज डाल कर उपयोग किया जाता था. वहीं महंगाई व अन्य कारणों से अब लोग मोमबत्ती व चाइनिज लाइटों का प्रयोग कर रहे हैं. इन दिनों बाजारों में चाइनीज लाइटों की भरमार है. समय के साथ व्यवस्था बदली और मिट्टी के दीये तथा कुप्पी बनाने वाले कुम्हकारों के समक्ष बड़ी चुनौती खड़ी हो गयी है. मिट्टी के दीये को लेकर एक माह पहले से कुम्हकार अपनी चाक ताबड़तोड़ चलाते हैं. मगर कुम्हकारों के चाक की गति को अब चाइनिज लाइटों ने धीमा कर दिया है. पहले की अपेक्षा अब कुम्हकारों को होने वाले मुनाफे में कमी आयी है. हालांकि वस्तुओं के दर तथा बाजार में पेशे की घटती कीमत के कारण चंद पैसे में बिकने वाले दीये की कीमत बढ़ी है. मगर अन्य उत्पादनों से कम ही है.पोड़ैयाहाट के गुनधासा गांव के कुम्हकारों ने बताया कि पहले की अपेक्षा कम मुनाफा मिलता है. सीताराम पंडित तथा अर्जुन पंडित ऐसे दो परिवार है जो अपने 20 साल की उम्र से ही मिट्टी के दीये व अन्य बरतन बनाने का काम कर रहे हैं. इस पेशे से वे अपने पांच सदस्यीय परिवार का पालन-पोषण करते हैं. अपने रोजगार से संतुष्ट रहने वाले सीताराम व अर्जुन का कहना है कि आज के समय में परिवार को इस रोजगार के बल पर चलाना किसी चुनौती से कम नहीं है. ऐसे तो मुफलिसी कभी ख्त्म नहीं होती है. सालों भर काम करने के बाद पेट की आग बुझती है. सीताराम बताते हैं कि कम आय होने के कारण वे बच्चों को अच्छी तालिम नहीं दे पाये. जिस तरह व्यवसाय चल रहा है आगे बहुत कुछ कर पाना मुश्किल है. बाजार की चुनौती सीताराम बताते हैं कि पहले मिट्टी के दीये को दीपावली के समय 50 पैसे में फिर 10, फिर एक रूपये में 10 और अब एक रूपये में पांच बेचते हैं. मिट्टी की कुप्पी जिसकी कीमत आज डेढ़ से दो रुपये प्रति पीस है. जबकि पहले 50 पैसे में एक हुआ करता था. दीपावली में बच्चों के पैसे जमा करने के गुल्लक की कीमत दो से तीन रुपये हुआ करता था. लेकिन अब 10 रुपये प्रति बिक रहा है. बाजार में मुख्य रूप चाइनीज बल्वों के साथ एलइडी के साथ मोमबत्ती के कारण पहले की अपेक्षा बिक्री में कमी आयी है. हालत में उसके व्यवसाय में प्रभाव पड़ा है. सरकारी मदद नहीं सरकार भी कुम्हकारों के लिये कुछ नहीं सोच रही है. होना यह चाहिए था कि ऐसे कुटीर उद्योगों को सरकार आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिये सहयोग करे. ……………………………… चाइनिज बल्बों व झालरों से पटा बाजार इन दिनों बाजार चाइनीज लाइटों व झालरों से पटा पड़ा है. एक से बढ़ कर एक लाइटों की भरमार है. इनकी बिक्री भी अच्छी-खासी हो रही है. कारण यह कि ये लाइटें सस्ती कीमतों पर लोगों को उपलब्ध हो जाता है. जबकि पारंपरिक साधन दिन प्रतिदिन महंगे होते जा रहे हैं.
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