बदनसीबी पर रोता कभी का मिनी कलकत्ता

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 11 Mar 2016 8:13 AM

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सरिया. भू-माफिया की कुदृष्टि से उजड़ गया भद्रजनों का इलाका, खत्म हो गयी रौनक जिले में भद्रजनों के इलाके के रूप में विख्यात सरिया बाजार व इसके अासपास का क्षेत्र आज अपनी पहचान खो चुका है. व्यावसायिक गतिविधियों के कारण कभी इस क्षेत्र को लोग मिनी कलकत्ता कहा कहते थे. बड़ी-बड़ी कोठियां, इनमें लगे बगीचे […]

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सरिया. भू-माफिया की कुदृष्टि से उजड़ गया भद्रजनों का इलाका, खत्म हो गयी रौनक
जिले में भद्रजनों के इलाके के रूप में विख्यात सरिया बाजार व इसके अासपास का क्षेत्र आज अपनी पहचान खो चुका है. व्यावसायिक गतिविधियों के कारण कभी इस क्षेत्र को लोग मिनी कलकत्ता कहा कहते थे. बड़ी-बड़ी कोठियां, इनमें लगे बगीचे और इन कोठियों की वास्तुकला बरबस ही लोगों का ध्यान खींच लेती थीं, लेकिन भू-माफियाओं की कुदृष्टि से भद्रजनों का यह इलाका उजड़ गया है.
बगोदर/हजारीबाग रोड : पर्व-त्याेहारों और छुट्टियों के समय तो यह इलाका बंगाली परिवारों से गुलजार रहता था़ यहां की संस्कृति से उन्हें खास लगाव था़ कई कार्यक्रमों का आयोजन होता था़ जिसमें स्थानीय लोग भी हिस्सा लेते थे़ इनमें से कई कोठियां देश की आजादी से तीन दशक पूर्व से ही नामी-गिरामी हस्तियों ने बनवायी थी़ गीता विला, चारू विल्ला, बेला रिना, नर्सी निकेतन, देव शोभा, निर्मलाया, बंसत पुरी, पाल विला, स्वास्तिका, रास मंदिर, शांति कुंज जैसे अनगिनत बंगाली कोठियों की शान देखते ही बनती थी़ सरिया रेलवे फाटक के समीप अक्षय झील कोठी व बसंत पुरी में 70 के दशक में बंगला फिल्म एखाने पिंजर की शूटिंग भी हुई थी. सुप्रसिद्ध कलाकार उत्तम कुमार व अर्पणा सेन ने इसमें अभिनय भी किया था.
कभी गुलजार था इलाका:
बदलते समय के साथ कुछ दबंग और भू माफिया की कुदृष्टि इन कोठियों पर पड़ी़ स्वभावत: शांत बंगाली बाबू इनका विशेष प्रतिरोध नहीं कर पाये और धीरे-धीरे उनका यहां आना कम हो गया. विवश होकर कुछ तो अपनी कोठियां बेचकर चले गये और कुछ पर अवैध कब्जा हो गया़
365 फलदार पेड़ थे कभी : कभी यहां 365 आम और अन्य फलदार वृक्ष समेत अन्य कई प्रकार के वृक्ष थे़ यह कोठी प्रकृति और वास्तु कला का अद्भुत नजारा पेश करती थी़ आज माफिया यहां के पेड़ों को भी काटने की तैयारी में है़
नेताजी की भतीजी के नाम से है एक कोठी, आज खत्म हो चुका है अस्तित्व
इनमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस की भतीजी के नाम प्रभाती कोठी भी शामिल हैं. नेताजी स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व यहां कई बार आये थे़ दुर्भाग्य से यह कोठी अब बिक चुकी है़ इसकी जमीन कई टुकड़ों में बंट गयी है़ इसका अस्तित्व समाप्त हाे चुका है, उस मकान को नया स्वरूप दे दिया गया है. स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा वहां कुछ भी नहीं बचा है. वहीं बागोडीह मोड़ स्थित लगभग आठ एकड़ में फैली श्रीनिवासी कोठी भी अब बिक चुकी है.
अस्तिव बचाने काे हो रहा संघर्ष
आज गिनी-चुनी कोठियां ही बची हैं. इनके मालिक भी कोठियों का अस्तिव बचाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. इनमें से एक राजधनवार रोड में स्थित मायापुरी कोठी भी है़ 1916 ई़ में बनी यह कोठी भी माफिया की नजर से अछूती नहीं है़ कोठी के मालिक बिहारी लाल मल्लिक पुराने दिनों की याद ताजा करते हैं. बताते हैं वर्षों पूर्व यहां के लोग भोले-भाले व मिलनसार थे़
इस कारण यहां हर बसंत ऋृत, दुर्गा पूजा व गुड फ्राइडे पर बंगाली परिवार यहां छुटि्टयां मनाने आते थे़ महीनों यहां रहकर इलाके के लोगों से मिलते जुलते थे. धीरे-धीरे क्षेत्र में दबंग किस्म के लोग व माफिया के भय दिखाने के कारण यहां बंगाली परिवारों का आना धीरे-धीरे बंद होने लगा. आज वह पुरानी पहचान खो चुका है
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