एसपी काॅलेज परिसर में मनाया आदिवासी समुदाय का बाहा पर्व

Updated at : 13 Mar 2025 11:15 PM (IST)
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एसपी काॅलेज परिसर में मनाया आदिवासी समुदाय का बाहा पर्व

संथाल आदिवासी समुदाय का प्रकृति पर्व बाहा एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो संताल बोंगा बुरू विशेष समुदायों के लोगों द्वारा मनाया जाता है.

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दुमका नगर. संताल परगना महाविद्यालय परिसर में बड़े ही धूमधाम के साथ गुरुवार को बाहा पर्व मनाया गया. इस अवसर पर मांझी बाबा द्वारा सुबह से ही पूजा-पाठ कराया गया. मौके पर छात्र नेता श्यामदेव हेंब्रम ने कहा कि संथाल आदिवासी समुदाय का प्रकृति पर्व बाहा एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जो संताल बोंगा बुरू विशेष समुदायों के लोगों द्वारा मनाया जाता है. यह त्योहार फाल्गुन माह की पूर्णिमा के शुभ दिन में मनाया जाता है और इसमें पारंपरिक सांस्कृतिक रीति-रिवाज का पालन किया जाता है. इस त्योहार के दौरान गांव के सभी लोग उम (स्नान) करते हैं और गांव के लेखा होड़ के साथ-साथ गांव में कुंवारे लड़के मिलकर जाहेर थान को पुआल से एक छामड़ा (छावनी) बनाते हैं. इसके बाद मांझी थान में भी ऐसी छावनी बनायी जाती है. इसके साथ-साथ गांव में विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. दिसोम बाहा पोरोब के दूसरे दिन के कार्यक्रम बहुत ही रंगीन और आनंदमयी होते हैं. इस दिन गांव के पुरुष वर्ग मांझी बाबा के नेतृत्व में जाहेर थान पहुंचते हैं और उस स्थान पर नायकी बाबा द्वारा पूजा-अर्चना कर मुर्गी-मुर्गा की बलि दी जाती है. इसके बाद नायकी बाबा साखुआ एवं महुआ के नये फूलों की कलियां एक सूप में सजाकर गांव की ओर प्रस्थान करते हैं. गांव पहुंचते ही बहन-बहू-बेटियां नायकी बाबा का पैर धोती हैं और उन्हें सखुआ का फूल विधि-विधान से दिया जाता है. इस कार्यक्रम के दौरान एक कुंवारा लड़का मिट्टी के नये घड़े में पवित्र जल लेकर आता है और वह पानी सबको थोड़ा-थोड़ा बांट दिया जाता है. इसके बाद गांव के लोग सादा पानी से बहुत ही हर्षोल्लास के साथ बाहा पर्व को मनाते हैं और इस त्योहार में पारंपरिक बाहा गीत गाते हैं. साथ ही मांदर और नगाड़ा बजाकर खूब खुशियां मनाते हैं. बाहा पर्व के दौरान आदिवासी समुदाय के लोग पेड़-पौधों, नदियों और पहाड़ों की पूजा करते हैं और वे प्रकृति के प्रति अपना सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं. इस पर्व के दौरान आदिवासी समुदाय के लोग अपने पारंपरिक नृत्य, संगीत और भोजन का आनंद लेते हैं. अपनी धार्मिक, सांस्कृतिक परंपराओं को बचाए रखना सभी आदिवासियों का मूल कर्तव्य है. मुख्य अतिथि के रूप में सुलेमान हांसदा, सोनेलाल हेंब्रम, राजीव बास्की, राजेन्द्र मुर्मू, आमोद बास्की, रीतेश मुर्मू, रूसिक हांसदा और बाबूधन टुडू, मंगल सोरेन, मुन्ना, रोहित मुर्मू, संजीव टुडू, शिबू मुर्मू, शिवकुमार हेंब्रम, राजेश सोरेन, लक्ष्मी राम बास्की, रीमा किस्कू, पिंकी सोरेन, मिनी सोरेन, मंगल सोरेन, निशा मुर्मू, गुलाबी हेंब्रम, अनीता मारंडी, सीमा हांसदा, बीरेंद्र किस्कू तथा हजारों की संख्या में लोग उपस्थित थे.

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