Bokaro News : बोकारो के जंगलों में दो माह में हुईं अगलगी की 300 से अधिक घटनाएं

Bokaro News : फरवरी और मार्च महीने में बोकारो जिला के जंगलों में आग लगने की 300 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं.
मार्च माह में ही तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. अचानक से बारिश भी हो रही है. मौसम में आये बदलाब का असर बोकारो की जंगलों में दिख रहा है. फरवरी और मार्च महीने में बोकारो जिला के जंगलों में आग लगने की 300 से अधिक घटनाएं हो चुकी हैं. हालांकि, इनमें से अधिकतर घटनाएं छोटी हैं. 75 घटनाओं पर वन विभाग को त्वरित एक्शन लेने की जरूरत पड़ी है. अन्य घटनाओं में स्थानीय लोगों ने ही आग पर काबू पा लिया. सिर्फ झुमरा क्षेत्र में ही एकमात्र घटना हुई, जिसमें आग पर काबू पाने में 24 घंटा से अधिक का समय लगा. अन्य जगह लगी आग को कुछ घंटा में ही काबू पा लिया गया. जंगलों में अगलगी की घटनाओं पर काबू पाने के लिए वन विभाग की नौ टीमें काम कर रही हैं. वर्तमान में हाथियों के विचरण पर ध्यान रखने वाली टीम भी अगलगी रोकने के लिए काम कर रही है. विभागीय कर्मियों के पास ब्लोअर समेत आधुनिक मशीन उपलब्ध है. इससे आग पर फौरन काबू पाया जा रहा है. जिला के जंगलों में अगलगी की घटनाएं वर्ष 2023-24 में 242 और वर्ष 2022-23 में 458 थीं.
सिर्फ महुआ ही नहीं है आग लगने का कारण
फरवरी व मार्च माह में जंगल में लगने वाली आग को सीधे तौर पर महुआ चुनने वालों से जोड़ दिया जाता है. कहा जाता है कि महुआ चुनने को लेकर स्थानीय लोग पत्तियों की सफाई के लिए जंगल में सुरक्षात्मक आग लगाते हैं. कई बार यही आग बड़े क्षेत्र को चपेट में ले लेती है. लेकिन, अगलगी की घटनाएं उन जगहों पर भी लगी है, जहां महुआ का पेड़ नहीं है. सड़क किनारे की झाड़ियों में भी आग लगायी गयी है.
कहीं जानवर तो नहीं निशाने पर
सोनाडाली जंगल की चोटी पर लगी आग के कारण की जांच में पता चला कि पहाड़ के एक साइड में आग लगा कर जानवरों का शिकार भी किया जाता है. कई बार शिकार स्थानीय लोग करते हैं, तो कई बार बाहर से भी लोग आते हैं. बताते चलें कि इन क्षेत्र में गोह पाया जाता है. मोर व जंगली सुअर भी रहते हैं. बताते चले कि 2024 में वन विभाग की टीम ने बोकारो जिला में अभियान चला कर हाथी व सियार की हड्डी, 120 गोह के अंग, विभिन्न प्राणी की खाल जब्त किये थे.
खुले वन क्षेत्र में हुई है वृद्धि
जानकारों की माने तो वर्ष 2021 से 2023 के बीच बोकारो जिला में मध्यम घने वन (एमडीएफ) में 47.92 वर्ग किमी की कमी आयी है. हालांकि, बहुत घने वन (वीडीएफ) क्षेत्रों में 34.3 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हुई है. खुले वन क्षेत्र में भी 58.26 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि देखी गयी. मध्यम घने वन में आयी कमी के कारण जंगल में हवा का प्रवाह तेज हुआ है. साथ ही धूप गिरी हुई पत्तियों को सुखाने में कम समय ले रहा है. ऐसे में हवा की घर्षण से सूखे पत्तियों व जंगली बांस की पत्तियों में आग पकड़ लेता है. कई लोगों का मानना है कि सड़क किनारे कुछ असामाजिक लोग की ओर से जलता बीड़ी- सिगरेट फेंकने के कारण भी आग फैलता है.
जंगल में आग लगने से होता है ये नुकसान
जंगल में आग लगने से सबसे अधिक प्रभाव हवा की गुणवत्ता पर पड़ती है, जो सीधे तौर पर इंसानों के लिए खतरनाक है. इसके अलावा प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र पर भी असर होता है. बोकारो के जंगल प्राकृतिक रूप से कई खाद्य पदार्थ का दाता है. आग इस तंत्र को कमजोर करता है. मिट्टी से उर्वरा शक्ति कम होती है, आर्गेनिक कार्बन, नाइट्रोजन का ह्रास होता है. जिला में छह ऑक्सीजन जोन है. गोमिया प्रखंड का झुमरा व लुगु पहाड़, चंद्रपुरा प्रखंड का सोनाडाली पहाड़ी, नावाडीह का उपरघाट वन क्षेत्र, पेटरवार का चरगी वन क्षेत्र, कसमार का हिसिम केदला व जरीडीह प्रखंड का भस्की वन क्षेत्र को जिला का ऑक्सीजन जोन माना जाता है. अगलगी की घटनाएं इसे प्रभावित कर रही है.
महुआ चुनने के लिए आग नहीं लगाना चाहिए : वन पदाधिकारी
वन पदाधिकारी संदीप शिंदे ने बताया कि जंगलों में आग लगने की घटना से निपटने के लिए वन विभाग द्वारा पांच स्तर पर तैयारी की गयी है. जंगल में कहीं भी आग लगती है, तो सैटेलाइट से सूचना मिल जाती है. इसके बाद आग बुझाने का कार्य शुरू कर दिया जाता है. इसमें स्थानीय लोगों व समिति का सहयोग भी लिया जाता है. महुआ चुनने के लिए आग नहीं लगाना चाहिए. महुआ पेड़ के नीचे से सूखे पत्तों को हटा कर या पेड़ के चारों ओर जाल लगा कर भी महुआ चुना जा सकता है. लुगु पहाड़ के क्षेत्र में हाथियों का विचरण होता है. इन क्षेत्र में अगलगी का हाथियों पर नकारात्मक असर होगा.
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