डोभा में मछली तक मर जाये, खेती क्या होगी?, सूख रहे खेत, किसान परेशान

Updated at : 01 Sep 2018 6:35 AM (IST)
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डोभा में मछली तक मर जाये, खेती क्या होगी?, सूख रहे खेत, किसान परेशान

बोकारो : वर्षा जल संग्रहण व सिंचाई की व्यवस्था के लिए झारखंड सरकार ने डोभा निर्माण योजना बनायी थी. लक्ष्य निर्धारित कर युद्ध स्तर पर डोभा निर्माण कराया गया. निर्माण मनरेगा व भूमि संरक्षण के जरिये किया गया. बोकारो में 7519 डोभा बनाये गये. आंकड़ा तो जिला के पक्ष में गवाही देता है, लेकिन योजना […]

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बोकारो : वर्षा जल संग्रहण व सिंचाई की व्यवस्था के लिए झारखंड सरकार ने डोभा निर्माण योजना बनायी थी. लक्ष्य निर्धारित कर युद्ध स्तर पर डोभा निर्माण कराया गया. निर्माण मनरेगा व भूमि संरक्षण के जरिये किया गया. बोकारो में 7519 डोभा बनाये गये. आंकड़ा तो जिला के पक्ष में गवाही देता है, लेकिन योजना धरातल पर कितनी उतरी यह इसी से समझा जा सकता है कि माॅनसून में बारिश की कमी से त्रस्त किसान को डोभा मदद नहीं पहुंचा सकी. हालत ये है कि डोभा में मछली मर जाये, खेती क्या होगी. रिपोर्ट सीपी सिंह की.
सिर्फ 62% हुई रोपनी, नहीं मिला डोभा का लाभ
बोकारो जिला में 33 हजार हेक्टेयर भूमि पर धान की खेती होती है. लेकिन माॅनसून अवधि का आधा समय बीत जाने के बाद भी रोपनी का काम पूरा नहीं हो पाया है. सिर्फ 62 प्रतिशत यानी 20460 हेक्टेयर भूमि पर ही रोपनी का काम हुआ है. शेष स्थानों पर पानी की कमी के कारण रोपनी नहीं हो पायी है. ऐसे में साफ है कि डोभा निर्माण का फायदा किसानों को नहीं मिल रहा है. गौरतलब है कि जिला में इस साल 23 मार्च तक 60.86 मिलीमीटर बारिश हुई है. जबकि इस समय तक 329.3 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी.
जिला में खेती की स्थिति गंभीर है. औसत तौर पर ढलान वाले खेत व डीजल पंप के जरिये रोपनी हुई है. हाल के दिनों में बारिश के बाद भी जैनामोड़, तुपकाडीह, गोमिया, पेटरवार, चंदनकियारी समेत अन्य जगहों पर रोपनी जरूर हुई है, लेकिन बारिश के रूकते ही किसानों के भाव तन जा रहे हैं. किसानों की माने तो इस बार उत्पादन कम रहेगा. साथ ही अन्य साधन से खेती करने पर मुनाफा में कमी आयेगी. किसानों की माने तो खेती करना इस बार नुकसानदेह ही होगा.
कई डोभा में पानी ही नहीं
डोभा का निर्माण समतल या अपेक्षाकृत ढलान वाले स्थान में करना था. ताकि बारिश का ज्यादा से ज्यादा पानी डोभा में जमा हो सके. लेकिन, निर्माण स्थल का चयन की गंभीरता इसी से समझा जा सकता है कि दर्जनों डोभा में पानी जमा नहीं हो पाया है. स्थानीय लोगों की माने तो ज्यादातर डोभा में एक पटवन से अधिक का पानी नहीं है. कई डोभा तो बनने के बाद ही भर गये हैं. इस पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है. इससे डोभा निर्माण का सही लक्ष्य आसानी से समझा जा सकता है.
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