शक्ति के चौथे स्वरूप माता कूष्माण्डा की हुई आराधना

Published at :25 Sep 2017 10:55 AM (IST)
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शक्ति के चौथे स्वरूप माता कूष्माण्डा की हुई आराधना

सुपौल : जिलेभर के श्रद्धालुओं ने नवरात्र के चौथे दिन माता कूष्माण्डा की पूजा की. रविवार को या देवि सर्वभू‍तेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता-नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: के मंत्रोच्चार से आसपास का वातावरण भक्तिमय बना रहा. ज्ञात हो कि संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ कहा गया है. इस वजह से माता को कुम्हड़ […]

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सुपौल : जिलेभर के श्रद्धालुओं ने नवरात्र के चौथे दिन माता कूष्माण्डा की पूजा की. रविवार को या देवि सर्वभू‍तेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता-नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: के मंत्रोच्चार से आसपास का वातावरण भक्तिमय बना रहा. ज्ञात हो कि संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ कहा गया है. इस वजह से माता को कुम्हड़ की बलि सर्वाधिक प्रिय है.
मान्यता है कि जब दुनिया नहीं थी, तब इसी देवी ने अपने हास्य से ब्रह्मांड की रचना की. इधर नवरात्र के पूजन सामग्री पर जीएसटी का भी प्रतिकूल असर दिख रहा है. हालांकि धार्मिक अनुष्ठान को विधान पूर्वक किये जाने के लिए श्रद्धालुओं द्वारा सामग्री की खरीदारी की जा रही है. गत वर्ष की खरीदारी के अनुसार इस वर्ष के सामग्रियों की खरीदारी में खासा असर बना हुआ है.
मां ने की ब्रह्मांड की रचना
मां दुर्गा की चौथे स्वरूप कूष्माण्डा के बारे में माना जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब देवी माता कूष्माण्डा ने ब्रह्मांड की रचना की थी. इस कारण इन्हें सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति माना जाता है.
इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में माना गया है. यहां तक कि सूर्यमंडल के भीतर निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति माता की इन्हीं स्वरूपों में माना गया है. इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं. इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं. ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है. माता की आठ भुजाएं हैं.
ये अष्ट भुजा देवी के नाम से भी विख्यात है. इनके सात हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है. आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है.
उपासना से मिलती है सिद्धि
सदर प्रखंड के सुखपुर निवासी तंत्राचार्य अरुण कुमार मुन्ना ने बताया कि माता कूष्माण्डा की पूजा अर्चना श्रद्धालुओं को शांत-संयत होकर, भक्‍ति भाव से करनी चाहिए. बताया कि इनकी उपासना से भक्तों को सभी सिद्धियां व निधियां मिलती हैं. भक्त नीरोग होते हैं और उनके आयु व यश में बढ़ोतरी होती है.
इस दिन माता को मालपुआ को प्रसाद लगाने पर श्रद्धालुओं के बुद्धि का विकास होता है. उन्होंने बताया कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी. अतः ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति है. तंत्राचार्य श्री मुन्ना ने बताया कि इनके तेज और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं.
ब्रह्मांड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में अवस्थित तेज इन्हीं की छाया है. उन्होंने यह भी बताया कि मां कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं. यदि मनुष्य सच्चे हृदय से इनका शरणागत बन जाये तो फिर उसे अत्यंत सुगमता से परम पद की प्राप्ति हो सकती है.
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