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पितरों की तृप्ति के लिए 14 से शुरू होगा पितृपक्ष

Updated at : 12 Sep 2019 3:58 AM (IST)
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पितरों की तृप्ति के लिए 14 से शुरू होगा पितृपक्ष

सीवान : पितृ पक्ष भादों के पूर्णिमा 14 सितंबर से शुरू होकर 28 सितबंर तक 15 दिनों को पूरा पक्ष होगा. पितरों के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिंड और दान को ही श्राद्ध कहते है. पितरों को मुक्ति व उन्हें ऊर्जा देने के लिए श्राद्ध कर्म किये जाते है. पितृ नाराज हो जाये […]

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सीवान : पितृ पक्ष भादों के पूर्णिमा 14 सितंबर से शुरू होकर 28 सितबंर तक 15 दिनों को पूरा पक्ष होगा. पितरों के लिए श्रद्धा से किया गया तर्पण, पिंड और दान को ही श्राद्ध कहते है. पितरों को मुक्ति व उन्हें ऊर्जा देने के लिए श्राद्ध कर्म किये जाते है. पितृ नाराज हो जाये तो घर के सदस्यों की तरक्की रूक जाती है.

श्राद्ध पूर्णिमा के साथ शुरू होकर 16 दिनों के बाद सर्व पितृ अमावस्या के दिन समाप्त होगा है. हिंदू अपने पूर्वजों (अर्थात पितरों) को विशेष रूप से भोजन प्रसाद के माध्यम से सम्मान, धन्यवाद व श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. श्राद्ध के समय, पूर्वजों को अपने रिश्तेदारों को आशीर्वाद देने के लिए पृथ्वी पर आते हैं. नारायणी नदी के तट पर किया गया तपर्ण भी श्रेष्ठ माना गया है.
सर्वपितृ अमावस्या : पितृ पक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में जाना जाता है. महालया अमावस्या पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन है. जिन व्यक्तियों को अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि की सही तारीख / दिन नहीं पता होता, वे लोग इस दिन उन्हें श्रद्धांजलि और भोजन समर्पित करके याद करते हैं. द्वादशी को सन्यासियों का श्राद्ध, चतुर्दशी को शस्त्र, विष, दुर्घटना से मृतों का श्राद्ध होता है चाहे उनकी मृत्यु किसी अन्य तिथि में हुई हो. अमावश का श्राद्ध, अज्ञात तिथि वालों का श्राद्ध, सर्वपितृ श्राद्ध.
पितृ पक्ष में पूर्वजों का श्राद्ध कैसे करें? : जिस पूर्वज, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि अगर याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली उसी तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिए.
यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जा सकता है, जिसे सर्वपितृ अमावस्या को महालय अमावस्या भी कहा जाता है. समय से पहले यानि कि किसी दुर्घटना अथवा आत्मदाह आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है.
तीन पीढ़ियों का करे श्राद्ध : धर्म- शास्त्र विशेषज्ञ पंडित अजय दास की माने तो श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक करने का विधान बताया गया है. यमराज हर वर्ष श्राद्ध पक्ष में सभी जीवों को मुक्त कर देते हैं, जिससे वह अपने स्वजनों के पास जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें. तीन पूर्वज में पिता को वसु के समान, रुद्र देवता को दादा के समान और आदित्य देवता को परदादा के समान माना जाता है. श्राद्ध के समय यही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं.
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