.. आखिर रात तो गुजारनी है

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.. आखिर रात तो गुजारनी है फोटो नंबर-2, रेलवे स्टेशन परिसर पर बच्चों के साथ बैठी साजो, 3, मुरही-घुघनी खाकर पेट भरने का प्रयास करते बच्चे सर्द रात में भला कैसे होगी उनकी सुबह शायद कुछ इसी तरह रेलवे स्टेशन पर जैसे-तैसे रात गुजारने को विवश हैं साजो, वे रात भर ठंड में परिवार के […]

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.. आखिर रात तो गुजारनी है फोटो नंबर-2, रेलवे स्टेशन परिसर पर बच्चों के साथ बैठी साजो, 3, मुरही-घुघनी खाकर पेट भरने का प्रयास करते बच्चे सर्द रात में भला कैसे होगी उनकी सुबह शायद कुछ इसी तरह रेलवे स्टेशन पर जैसे-तैसे रात गुजारने को विवश हैं साजो, वे रात भर ठंड में परिवार के साथ समय तो गुजार लेते हैं. लेकिन रात गुजारने से ही उनका समय नहीं कटता है, सुबह होते ही बच्चों की पेट चिंता भी उन्हें सताने लगती है. वे भीख मांग कर चार बच्चों का भरण-पोषण करतीं हैं. यतीम की तरह जिंदगी गुजार रहे साजो के चार बच्चेकभी भीख तो कभी कूड़ा चुन कर पालती हैं पेटरेलवे स्टेशन पर खुले आसमान के नीचे गुजरती हैं रातसीतामढ़ी. पारा लुढ़कते ही रात में कनकनी बढ़ गई हैं. लोग ठंड से बचने का उपाय कर रहे हैं. ऊनी वस्त्रों के साथ-साथ गरम कपड़े व विद्युत यंत्र की खरीदारी जोरों पर हैं. लेकिन समाज का एक ऐसा वर्ग भी हैं, जो चाह कर ठंड के प्रकोप से अपने आप को बचाने में असफल साबित होते हैं. कुछ इसी तरह की आर्थिक तंगी के कारण ठंड से बचाने में असक्षम साबित हो रहे लोगों के दर्द को जानने के लिए प्रभात खबर की टीम शुक्रवार की देर रात स्थानीय रेलवे स्टेशन पहुंची. जहां 32 वर्षीय साजो खातून नामक एक महिला रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार पर चटाइ बिछा कर अपने चार मासूम बच्चों को ठंड से बचाने का प्रयास कर रही थी. जिसमें उसे सफलता नहीं मिल रही थी. क्योंकि, एक तो मां समेत चार बच्चों के शरीर पर गर्म कपड़े नहीं थे. वहीं ठंड से बचाने के लिए साजो के पास एक मात्र कंबल था. वह भी फटा-पुराना. कौन सुनेगा, किसको सुनाये…अपने मासूम बच्चों की हालत को देख कर साजो की आंख भी नम हो रही थी. बार-बार बच्चों को कंबल में समेटने का प्रयास कर रही थी लेकिन पूरी तरह सफलता नहीं मिल पा रही थी. पूछने पर साजो ने बताया कि वह हुसैना गांव की रहने वाली हैं. चार साल पहले उसके पति ने जमीन बेचने के बाद उसे बच्चों समेत घर से निकाल दिया. बच्चों का पेट पालने के लिए वह रेलवे स्टेशन परिसर में कूड़ा चुन कर भरण-पोषण कर रही हैं. कभी-कभी भीख मांग कर पेट भरना पड़ता है. महिना में 15 दिन ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि भूखे पेट सोना पड़ता है. सरकारी योजना व सामाजिक संगठन की कहानी तो सुनती हूं, लेकिन अब तक कोई मसीहा बन कर उनके पास नहीं आया है. बच्चों को पढ़ाने की ख्वाहिश है, लेकिन सभी इच्छा आर्थिक तंगी के कारण दम तोड़ चुकी है.

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